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- -विश्व युवा कौशल विकास दिवस- विशेष लेख • लक्ष्मीकांत कोसरिया, उप संचालक"कौशल ही आज के समय की सबसे बड़ी पूंजी है। जिस युवा के पास हुनर है, उसके लिए अवसरों की कोई कमी नहीं है।" इसी सोच को साकार करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के माध्यम से प्रदेश के युवाओं को रोजगारोन्मुखी एवं उद्योगों की मांग के अनुरूप आधुनिक कौशल प्रशिक्षण प्रदान कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की विशा में लगातार कार्य कर रही है।विश्व युवा कौशल विकास दिवस के अवसर पर यह कहना सार्थक होगा कि छत्तीसगढ़ ने कौशल विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। राज्य में युवाओं को केवल प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण के साथ रोजगार सुनिश्चित करने की दिशा में भी प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं।मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के प्रारंभ से अब तक प्रदेश के 4 लाख 94 हजार 330 युवाओं को विभिन्न रोजगारपरक ट्रेडों में कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। इनमें से 2 लाख 74 हजार 934 युवाओं को रोजगार से जोड़ा जा चुका है। वर्तमान में योजना के अंतर्गत राज्यभर में 375 व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रवाता (199 शासकीय एवं 176 अशासकीय) के माध्यम से राष्ट्रीय कौशल अर्हता फ्रेमवर्क (NSQF) के अनुरूप उच्च गुणवत्ता वाले प्रशिक्षण संचालित किए जा रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक 9 हजार 418 युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया है, जिनमें से 7 हजार 528 युवाओं को रोजगार प्राप्त हो चुका है, जबकि 6 हजार 679 युवा वर्तमान में विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।राज्य सरकार ने युवाओं को भविष्य की तकनीकों से जोड़ने के लिए कौशल प्रशिक्षण में व्यापक बदलाव किए हैं। अब पारंपरिक ट्रेडों के साथ-साथ इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) मेंटेनेंस, ड्रोन ऑपरेटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं मशीन लर्निंग (AI-ML), साइबर सुरक्षा, सूर्यमित्र (सौर ऊर्जा) जैसे 21 वीं सदी के अत्याधुनिक पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इस वर्ष विशेष रूप से जल वितरण संचालक (Water Distribution Operator) कोर्स प्रारंभ किया गया है, जिसके अंतर्गत 2,770 युवाओं को मल्टी-स्किल प्रशिक्षण देकर सीधे रोजगार से जोड़ने की कार्ययोजना बनाई गई है।गुणवत्ता पर विशेष जोरछत्तीसगढ़ में कौशल विकास केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। अब प्रत्येक प्रशिक्षक के लिए शैक्षणिक योग्यता एवं अनुभव के साथ प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण (Training of Trainers-TOT) प्रमाणन अनिवार्य किया गया है। इससे प्रशिक्षण की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आया है। प्रत्येक प्रशिक्षणार्थी के लिए मूल्यांकन से पहले कम से कम सात दिवस का ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग (OJT) अनिवार्य किया गया है, जिससे उन्हें उद्योगों की वास्तविक कार्यप्रणाली का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो सके। प्रशिक्षण केंद्रों में फेस आधारित ऑनलाइन बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू की गई है। साथ ही सभी प्रशिक्षण केंद्रों में आई.पी. आधारित सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिनके माध्यम से प्रशिक्षण गतिविधियों की सतत निगरानी की जा रही है। इन व्यवस्थाओं से पारदर्शिता बढ़ी है तथा प्रशिक्षण की गुणवत्ता और अनुशासन में सुधार हुआ है।प्रशिक्षण के साथ रोजगार की भी गारंटीमुख्यमंत्री कौशल विकास योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रशिक्षण के बाद युवाओं के रोजगार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। प्रशिक्षण संचालन की अनुमति देने से पहले प्रत्येक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदाता द्वारा रोजगार उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं का परीक्षण किया जाता है। परीक्षण के बाद ही प्रशिक्षण संचालन की अनुमति प्रदान की जाती है। इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण केंद्रों को मिलने वाली राशि का 60 प्रतिशत भुगतान तभी किया जाता है, जब प्रशिक्षित युवाओं का नियोजन सुनिश्चित हो जाता है। यह व्यवस्था प्रशिक्षण संस्थानों को रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण देने के लिए प्रेरित करती है।बस्तर के युवाओं तक पहुंच रहा कौशल विकासप्रदेश के दूरस्थ एवं आदिवासी क्षेत्रों के युवाओं तक कौशल विकास पहुंचाने के लिए बस्तर संभाग के प्रत्येक विकासखंड में स्किल डेवलपमेंट सेंटर (SDC) स्थापित करने की कार्यवाही की जा रही है। जिला बीजापुर में असिस्टेंट मेसन कोर्स प्रारंभ किया जा चुका है। वहीं बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, सुकमा, कांकेर एवं बीजापुर सहित छह पुनर्वास केंद्रों का व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदाता के रूप में पंजीयन किया गया है तथा अन्य केंद्रों को भी शीघ्र जोड़ा जा रहा है।उद्योगों के साथ साझेवारी से बढ़ रही रोजगार क्षमताराज्य सरकार ने उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के लिए प्रतिष्ठित संस्थाओं के साथ महत्वपूर्ण समझौते किए हैं।महिंद्रा एंड महिंद्रा के साथ ट्रैक्टर मैकेनिक प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया है, जिसके अंतर्गत अब तक 101 युवा प्रशिक्षित हो चुके हैं तथा 60 युवा प्रशिक्षणरत हैं।साइरोनिक्स टेक्नोलॉजी प्रा. लि. के सहयोग से रायपुर के लाईवलीहुड कॉलेज में इलेक्ट्रिक व्हीकल टेक्नोलॉजी के पांच जॉब रोल में प्रशिक्षण संचालित किया जा रहा है।नांदी फाउंडेशन के सहयोग से सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित महिलाओं को एम्प्लॉयबिलिटी स्किल्स का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 1,142 युवा प्रशिक्षित हो चुके हैं।पर्यटन एवं हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में व लॉन्ड्री बैग के साथ साझेदारी कर लॉन्ड्री सुपरवाइजर एवं अन्य रोजगारपरक प्रशिक्षण प्रारंभ किए गए हैं।स्वास्थ्य क्षेत्र में श्री सत्य साई हेल्थ एवं एजुकेशन ट्रस्ट के सहयोग से कार्डियक एवं स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित उन्नत कौशल प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित किए जा रहे हैं।लाईवलीहुड कॉलेज बने कौशल विकास के सशक्त केंद्रप्रदेश के जिलों में संचालित लाईवलीहुड कॉलेज आज युवाओं के लिए कौशल विकास का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। वर्ष 2013 से अब तक इन कॉलेजों में 68 हजार 552 युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। इनमें से 28 हजार 820 युवाओं को रोजगार तथा 10 हजार 632 युवाओं को स्वरोजगार प्राप्त हुआ है। इस प्रकार कुल 39 हजार 452 युवा आजीविका से जुड़ चुके हैं। वर्तमान में 2 हजार 413 युवा प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इसी प्रकार पीएम विश्वकर्मा योजना के अंतर्गत वर्ष 2024 से अब तक 13 हजार 188 युवाओं को लाईवलीहुड कॉलेजों के माध्यम से प्रशिक्षण दिया गया है।आधुनिक अधोसंरचना का विस्तारराज्य के 26 जिलों में लाईवलीहुड कॉलेज भवन पूर्ण होकर संचालित हैं। नवीन जिलों में भी भवन निर्माण एवं भूमि आबंटन की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है। प्रदेश में 26 बालिका छात्रावास तथा 20 बालक छात्रावास पूर्ण होकर संचालित हैं। शेष छात्रावासों का निर्माण एवं भूमि आबंटन कार्य प्रगति पर है।नवा रायपुर में बनेगा सेंटर ऑफ एक्सीलेंसछत्तीसगढ़ सरकार युवाओं को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठा रही है।नवा रायपुर में लाईवलीहुड सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना की जाएगी, जहां अत्याधुनिक मशीनों, आधुनिक प्रयोगशालाओं, विशेष कार्यशालाओं तथा उद्योगों की मांग के अनुरूप इंजीनियरिंग एवं गैर-इंजीनियरिंग क्षेत्रों में विश्वस्तरीय कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाएगा। वित्तीय वर्ष 2026-27 में इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए भूमि लीज अनुबंध हेतु 2 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया है।कौशल विकास से आत्मनिर्भरता की नई विशाविश्व युवा कौशल विकास दिवस पर छत्तीसगढ़ का अनुभव यह दर्शाता है कि कौशल विकास केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि युवाओं को आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर और रोजगारयुक्त बनाने का सशक्त अभियान है। नई तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण, उद्योगों के साथ साझेदारी, रोजगार सुनिश्चित करने की व्यवस्था तथा आधुनिक अधोसंरचना के माध्यम से छत्तीसगढ़ वेश में कौशल विकास का एक प्रभावी मॉडल बनकर उभर रहा है। आने वाले वर्षों में यह पहल न केवल लाखों युवाओं के जीवन में परिवर्तन लाएगी, बल्कि विकसित छत्तीसगढ़ और विकसित भारत के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ की पहचानप्रदेश के युवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर मिल रहा है। वर्ष 2025-26 में 19 कौशल ट्रेडों में आयोजित जिला एवं राज्य स्तरीय इंडिया स्किल प्रतियोगिता में 3,327 युवाओं ने भाग लिया, जिनमें से 381 प्रतिभागी राज्य स्तर तक पहुंचे। ईस्ट जोन क्षेत्रीय प्रतियोगिता, भुवनेश्वर में छत्तीसगढ़ के 38 प्रतिभागियों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए 01 स्वर्ण, 02 रजत, 05 कांस्य एवं 04 मेडल ऑफ एक्सीलेंस सहित कुल 12 पदक अर्जित किए।वहीं राष्ट्रीय स्तर की इंडिया स्किल प्रतियोगिता में राज्य के 03 प्रतिभागियों ने प्रतिनिधित्व किया, जिनमें से 01 प्रतिभागी ने मेडल ऑफ एक्सीलेंस प्राप्त किया। उत्कृष्ट प्रदर्शन एवं सफल आयोजन के लिए भारत सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ को प्रशस्ति पत्र से भी सम्मानित किया गया।
- -362 सहायक प्राध्यापक बने प्रोफेसर, 152 प्रोफ़ेसर हुए प्राचार्य पदोन्नति, शैक्षणिक नेतृत्व को मिली नई मजबूती-595 पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू, 700 नए पदों की मंजूरी, युवाओं के लिए सरकारी सेवा के बड़े अवसर-72 सहायक प्राध्यापकों को 37.23 करोड़ रुपये एरियर्स, 935 की परिवीक्षा अवधि समाप्त-सेवा सुरक्षा को मिला मजबूत आधार, 34 अनुकंपा नियुक्तियां, 118 कर्मचारियों को उच्चतर समयमान वेतनमान, कर्मचारी कल्याण को मिली संवेदनशील दिशाविशेष लेख - विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालककिसी भी राज्य की प्रगति का वास्तविक पैमाना उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है और इसकी गुणवत्ता केंद्र में खड़े शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारियों की सक्षमता, सुरक्षा और सम्मान पर निर्भर करती है। जब उच्च शिक्षा व्यवस्था में कार्यरत मानव संसाधन को पदोन्नति, सेवा सुरक्षा, वित्तीय सम्मान और शोध के अवसर एक साथ मिलते हैं, तब शिक्षा राज्य के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की सबसे मजबूत धुरी बन जाती है। छत्तीसगढ़ का उच्च शिक्षा विभाग इन दिनों इसी व्यापक और समग्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।राज्य सरकार ने उच्च शिक्षा विभाग को केवल भवनों, पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं तक सीमित न रखकर उसे अकादमिक गुणवत्ता, प्रशासनिक दक्षता, रोजगार सृजन, शोध संवर्धन और कर्मचारी कल्याण से जोड़ा है। हाल के महीनों में लिए गए निर्णय इस बात के प्रमाण हैं कि सरकार उच्च शिक्षा संस्थानों को भविष्य के ज्ञान-केंद्रों के रूप में विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। पदोन्नतियों की लंबित फाइलों को गति देना, नई भर्तियां, वेतनमान व एरियर्स का निराकरण, तकनीकी स्टाफ की नियुक्ति, शोध को प्रोत्साहन और अनुकंपा नियुक्ति जैसे कदमों से विभाग ने हर मोर्चे पर ठोस और संवेदनशील पहल की है।उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता का एक बड़ा आधार उनका नेतृत्व होता है। जब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में योग्य और अनुभवी शिक्षकों को समय पर पदोन्नति मिलती है, तो उसका सीधा असर संस्थान की कार्यसंस्कृति और प्रशासनिक क्षमता पर दिखाई देता है। लंबित पदोन्नति प्रक्रियाओं को गति देकर राज्य सरकार ने एक निर्णायक पहल की है।वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 362 सहायक प्राध्यापकों को पदोन्नत कर प्राध्यापक (प्रोफेसर) बनाया गया है। इसके साथ ही 152 पदोन्नत प्राध्यापकों को स्नातक प्राचार्य तथा 07 स्नातक प्राचार्यों को स्नातकोत्तर (PG) प्राचार्य के पद पर पदोंन्नत किया गया है। इन निर्णयों से महाविद्यालयों की कमान अनुभवी हाथों में पहुँची है, जिससे संस्थागत निर्णय क्षमता, शैक्षणिक अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत होगी।गुणवत्तापूर्ण शिक्षण व्यवस्था के लिए संस्थानों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक और विशेषज्ञ अनिवार्य हैं। राज्य सरकार ने रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू कर युवाओं के लिए सरकारी सेवा में प्रवेश के बड़े अवसर निर्मित किए हैं। शासकीय महाविद्यालयों में प्राध्यापकों के 595 पदों पर सीधी भर्ती की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से प्रारंभ हो चुकी है।इसके अतिरिक्त, विभागीय संरचना को सशक्त बनाने के लिए कुल 700 पदों पर सीधी भर्ती को मंजूरी दी गई है। इनमें 625 पद सहायक प्राध्यापक, 50 पद ग्रंथपाल और 25 पद क्रीड़ाधिकारी के शामिल हैं। सहायक प्राध्यापकों की भर्ती से विषयवार अध्यापन की गुणवत्ता बेहतर होगी, ग्रंथपालों से पुस्तकालय अकादमिक संसाधनों के प्रभावी केंद्र बनेंगे और क्रीड़ाधिकारियों से विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास होगा। यह अभियान प्रदेश के योग्य युवाओं को सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराने का सशक्त माध्यम बनने जा रहा है।राज्य में सहायक प्राध्यापक बनने की आकांक्षा रखने वाले हजारों युवाओं के लिए राज्य पात्रता परीक्षा (CG-SET) एक महत्वपूर्ण अवसर है। विभाग द्वारा CG-SET का आयोजन 04 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित है l सरकार नई पीढ़ी की प्रतिभाओं को अकादमिक करियर में आगे बढ़ाने के लिए गंभीर है। यह परीक्षा छत्तीसगढ़ के युवाओं को प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक परिदृश्य और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनाने का अवसर देती है।विज्ञान, प्रौद्योगिकी और व्यावसायिक विषयों के लिए प्रयोगशालाएं, उपकरण और प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ उतने ही आवश्यक हैं जितने कक्षा और कक्ष। वर्ष 2025-26 के दौरान प्रयोगशाला तकनीशियन के 260 रिक्त पदों के विरुद्ध 247 अभ्यर्थियों तथा प्रयोगशाला परिचारक के 429 रिक्त पदों के विरुद्ध 399 अभ्यर्थियों को नियुक्ति आदेश जारी किए जा चुके हैं। तकनीकी स्टाफ की उपलब्धता से प्रयोगशालाओं का नियमित संचालन और विद्यार्थियों को व्यवहारिक प्रशिक्षण देने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी।विभागीय मजबूती का सबसे बड़ा आधार कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा, न्यायपूर्ण वेतन संरचना और लंबित मामलों का समयबद्ध समाधान है। आपातकालीन रूप से अचयनित रहे 72 सहायक प्राध्यापकों को उनकी प्रथम नियुक्ति तिथि से वरिष्ठ, प्रवर श्रेणी और पे-बैंड-4 की स्वीकृति देकर 37.23 करोड़ रुपये की एरियर्स राशि उनके खातों में अंतरित की गई है, जो संस्थागत न्याय का प्रतीक है।इसी तरह, वर्ष 2021 और 2022 में नियुक्त लगभग 1168 सहायक प्राध्यापकों में से रिकॉर्ड 935 नवनियुक्त प्राध्यापकों की परिवीक्षा अवधि समाप्त करने के आदेश जारी किए गए हैं। परिवीक्षा समाप्त होना कर्मचारियों के लिए स्थायित्व और पेशेवर सुरक्षा का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिससे विभाग के भीतर प्रतिबद्ध शैक्षणिक कार्यबल तैयार हुआ है।उच्च शिक्षा व्यवस्था में शोध और नवाचार की भूमिका को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा 577 सहायक प्राध्यापकों को पीएचडी करने की अनुमति देना एक दूरदर्शी निर्णय है। अधिक शिक्षक जब शोध से जुड़ेंगे, तो कक्षा में अद्यतन ज्ञान पहुंचेगा और महाविद्यालयों में बौद्धिक विमर्श का स्तर ऊपर उठेगा। शिक्षकों के साथ-साथ तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी भी व्यवस्था की रीढ़ हैं। दिसंबर 2023 से अब तक दिवंगत कर्मचारियों के 34 आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान की गई है, जो संकटग्रस्त परिवारों को जीवन संभालने का संबल देती है। इसके अतिरिक्त, 324 कर्मचारियों को उच्चतर समयमान वेतनमान प्रदान किया गया है और वर्ष 2024-25 की पदोन्नति संबंधी समस्त कार्यवाहियां समय सीमा में पूर्ण कर ली गई हैं।उच्च शिक्षा विभाग के ये फैसले मिलकर एक व्यापक परिवर्तनकारी मॉडल की रचना करते हैं, जहां नेतृत्व सुदृढ़ीकरण, नई भर्ती, सेवा सुरक्षा, कर्मचारी कल्याण, तकनीकी संसाधन और शोध संवर्धन एक साथ आगे बढ़ते हैं। छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जो परिवर्तन आज दिखाई दे रहे हैं, वे केवल विभागीय उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि एक ऐसी नीति-दृष्टि हैं जिसमें शिक्षा को राज्य के भविष्य निर्माण का केंद्रीय माध्यम माना गया है। आने वाले समय में ये प्रयास छत्तीसगढ़ के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को ज्ञान, शोध, नेतृत्व और सामाजिक परिवर्तन के सशक्त केंद्र के रूप में स्थापित करेंगे।
- - युगपुरुष पंडित ज्वाला प्रसाद उपाध्याय (शर्मा) की शताब्दी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि-गुुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी तीन बार रुके थे पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के महासमुंद स्थित निवास स्थान में-लेखक-प्रशांत शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)16 जुलाई का दिन छत्तीसगढ़ के लिए गौरव, स्मरण और प्रेरणा का दिन है। आज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, अखिल भारतीय गायत्री परिवार के सिद्ध योगी एवं समाज चेतना के प्रखर संवाहक पंडित ज्वाला प्रसाद उपाध्याय (शर्मा) की शताब्दी जयंती है। यदि वे आज हमारे बीच होते, तो उनका 100वाँ जन्मदिन पूरे प्रदेश में बड़े उत्साह, श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाता। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि जो भी एक बार उनके संपर्क में आता, वह जीवन भर उनका सम्मान करता और उनके स्नेह का मुरीद हो जाता। उनकी कर्मभूमि महासमुंद ही नहीं, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ उनके कार्यों का साक्षी है। अखिल भारतीय गायत्री परिवार के माध्यम से उन्होंने विशेष रूप से महासमुंद सहित पूरे प्रदेश में आध्यात्मिक जागरण, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों की ऐसी अलख जगाई, जिसकी ज्योति आज भी असंख्य लोगों के जीवन को आलोकित कर रही है। मेरा उनसे केवल पारिवारिक रिश्ता नहीं था। वे मेरे बड़े पिताश्री थे, जिन्हें हम सभी स्नेहपूर्वक बड़ा जी कहकर पुकारते थे। बचपन से ही मुझे हमेशा यह अनुभव हुआ कि हमारा संबंध केवल इस जन्म का नहीं, बल्कि संस्कारों, श्रद्धा और आत्मीयता का था। मेरा पैतृक गांव टेकारी (जिला रायपुर) उनकी जन्मभूमि थी, इसलिए इस गाँव से उनका विशेष लगाव था। यह मेरा सौभाग्य रहा कि उनके सान्निध्य में मुझे अपने पैतृक गाँव टेकारी में तीन बार माँ गायत्री महायज्ञ आयोजित कराने का अवसर मिला। आयोजन की जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी, लेकिन मुझे पूरा विश्वास था कि उनके मार्गदर्शन में कोई बाधा नहीं आएगी। 25 गाँवों से हजारों श्रद्धालु तीन दिनों तक इस महायज्ञ में शामिल हुए। बड़ा जी के कुशल नेतृत्व और प्रेरणा से सभी लोगों ने अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ इतनी सहजता और समर्पण के साथ निभाईं कि पूरा आयोजन बिना किसी विघ्न के सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। आज उस घटना को लगभग 24 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जब भी उन दिनों को याद करता हूँ, तो आश्चर्य होता है कि इतना विशाल आयोजन कितनी सहजता, अनुशासन और सामूहिक सहयोग से सम्पन्न हुआ। मुझे संतोष है कि मैं अपने बड़ा जी की अपने पैतृक गाँव में गायत्री महायज्ञ कराने की इच्छा पूरी करने का माध्यम बन सका। साथ ही मैं यह भी भली-भाँति जानता हूँ कि यदि उनका आशीर्वाद, आत्मबल और अटूट विश्वास साथ न होता, तो यह कार्य संभव नहीं हो पाता। पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा जी केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के भी सच्चे योद्धा थे। उन्होंने दहेज प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए सामूहिक एवं दहेज-मुक्त विवाह की अभिनव परंपरा की शुरुआत की। समाज में समानता, भाईचारे और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्होंने सभी जातियों और वर्गों को साथ लेकर सामूहिक विवाह सम्मेलनों का आयोजन कराया। उनके द्वारा बोए गए समाज सुधार के बीज आज छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देशभर में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह जैसी योजनाओं के रूप में फलते-फूलते दिखाई देते हैं। पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के अत्यंत प्रिय शिष्यों में से एक थे। शांतिकुंज, हरिद्वार की युगनिर्माण विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज कल्याण, आध्यात्मिक जागरण और विश्वबंधुत्व के लिए समर्पित कर दिया। उनके अथक प्रयासों और छत्तीसगढ़ में विचार-क्रांति के संकल्प के परिणामस्वरूप युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का तीन बार महासमुंद आगमन हुआ। पहली बार 8 जनवरी 1969 को आचार्य श्री महासमुंद पहुँचे। इस अवसर पर उन्होंने पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के निवास स्थित साधना कक्ष में अखंड ज्योति की स्थापना की, जो आज भी निरंतर प्रज्ज्वलित होकर उनकी साधना, तपस्या और आध्यात्मिक विरासत की साक्षी बनी हुई है। इसके बाद लगातार दो वर्षों तक आचार्य श्री का महासमुंद आगमन होता रहा। पाँच कुंडीय गायत्री महायज्ञ से प्रारंभ हुआ यह अभियान आगे चलकर 1008 कुंडीय विराट गायत्री महायज्ञ के रूप में फलीभूत हुआ। इन आयोजनों की ख्याति केवल महासमुंद तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ इसका साक्षी बना। दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु इन महायज्ञों में भाग लेने महासमुंद पहुँचे। उन दिनों युगपुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का प्रवास राम मंदिर के समीप स्थित पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा के निवास पर ही होता था। उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी। इसलिए मैं न तो आचार्य श्री की महानता को पूरी तरह समझ पाता था और न ही बड़ा जी के तेजस्वी व्यक्तित्व की गहराई को। फिर भी आज तक आचार्य श्री का स्नेहिल स्पर्श मेरी स्मृतियों में जीवंत है। उस वक्त पता ही नहीं चलता था कि कब उनके सान्निध्य में, उसी बिस्तर पर, उनकी छत्रछाया में रहता था। आज वे पल मेरी सबसे अनमोल धरोहर हैं। जब भी पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा शांतिकुंज, हरिद्वार जाते थे, तब आचार्य श्री स्वयं उनका आत्मीय स्वागत करते थे। यह उनके प्रति आचार्य श्री के विशेष स्नेह, विश्वास और सम्मान का प्रमाण था। विश्वबंधुत्व, मानव कल्याण और समाज निर्माण की दिशा में बड़ा जी ने जो कार्य किए, वे आज भी प्रेरणादायी और अनुकरणीय हैं। इतना महान योगदान देने के बावजूद पंडित ज्वाला प्रसाद शर्मा जीवनभर आत्मप्रचार से दूर रहे। वे साधना, सेवा और तप में ही रमे रहे। संभवत: यही कारण है कि उनकी तपोभूमि, उनके साधना कक्ष में आचार्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति और उनके सामाजिक-आध्यात्मिक योगदान का जितना व्यापक प्रचार-प्रसार होना चाहिए था, उतना नहीं हो सका। उनकी शताब्दी जयंती पर हम सबका दायित्व है कि उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और समाज के प्रति उनके अमूल्य योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाएं तथा उनके बताए सेवा, साधना और संस्कार के मार्ग पर चलने का संकल्प लें। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 8 मार्च 2019 को उनका स्वर्गारोहण समाज और प्रदेश के लिए अपूरणीय क्षति थी। उनके निधन से एक ऐसा शून्य उत्पन्न हुआ, जिसकी भरपाई करना अत्यंत कठिन है।

- प्रकाश मेहरा की जयंती 13 जुलाई पर विशेषपचास हज़ार रुपये, एक फिएट कार, एक फ्लैट... बस हमारी फिल्म डायरेक्ट कर दीजिए।ये ऑफर एक निर्माता ने प्रकाश मेहरा को दिया था। उस समय तक प्रकाश मेहरा ने बतौर निर्देशक अपना सफर शुरू भी नहीं किया था, हालांकि वह अपनी पहली फिल्म की तैयारी में जुटे हुए थे।जिस निर्माता ने यह आकर्षक प्रस्ताव रखा था, वह 'अमर सिंह राठौड़' नाम की फिल्म बनाना चाहता था। फिल्म में निरूपा रॉय और पी. जयराज मुख्य भूमिकाओं में थे। जाहिर है, इतना बड़ा ऑफर किसी के भी कदम डगमगा सकता था।साल 1957 में, जब प्रकाश मेहरा महज़ 300 रुपये महीने की नौकरी कर रहे थे, तब 50 हजार रुपये, एक फिएट कार और एक फ्लैट का प्रस्ताव किसी सपने से कम नहीं था। लेकिन उन्होंने तुरंत हामी नहीं भरी। क्योंकि वे पहले ही तय कर चुके थे कि निर्देशन की शुरुआत अपनी पसंद की फिल्म से ही करेंगे।उन्होंने निर्माता से तीन-चार दिन का समय मांगा। उन दिनों प्रकाश मेहरा, निर्देशक मोहन सहगल के सहायक थे। वहीं एक असिस्टेंट कैमरामैन थे—सरदार बलदेव सिंह। प्रकाश मेहरा ने उनसे इस ऑफर का ज़िक्र किया।बलदेव सिंह जानते थे कि प्रकाश मेहरा सामाजिक विषयों पर फिल्में बनाना चाहते हैं। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा,"गलती से भी हां मत कहना। यह माइथोलॉजिकल फिल्म है। एक बार इस जॉनर में चले गए, तो फिर उसी में सीमित होकर रह जाओगे।"उन्होंने आगे कहा, "अगले साल तुम्हारी फिल्म 'हसीना मान जाएगी' शुरू होगी। थोड़ा सब्र करो।"प्रकाश मेहरा ने अपने साथी की सलाह पर भरोसा किया और इतना बड़ा ऑफर ठुकरा दिया।जब निर्माता को उनके इंकार की खबर मिली, तो वह बेहद नाराज़ हुआ। उसने कई लोगों से कहा,"बेवकूफ तो बहुत देखे हैं, लेकिन ऐसा बेवकूफ नहीं देखा। 300 रुपये महीने की नौकरी करने वाला आदमी 50 हजार रुपये, कार और फ्लैट का ऑफर ठुकरा रहा है!"लेकिन उस निर्माता को नहीं पता था कि प्रकाश मेहरा कोई छोटा फैसला नहीं ले रहे थे। उनका लक्ष्य सिर्फ एक फिल्म निर्देशित करना नहीं, बल्कि लंबी पारी खेलना था।आखिरकार, 1968 में रिलीज़ हुई 'हसीना मान जाएगी' से प्रकाश मेहरा ने निर्देशन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने एक से बढ़कर एक सफल फिल्में दीं और हिंदी सिनेमा के सबसे सफल और प्रभावशाली निर्देशकों में अपनी जगह बना ली।आज, 13 जुलाई को प्रकाश मेहरा की जयंती है। उनका जन्म 13 जुलाई 1939 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर स्थित अपने ननिहाल में हुआ था।मुंबई में मिली उनकी सफलता रातों-रात नहीं आई थी। इसके पीछे वर्षों का संघर्ष, धैर्य, सही फैसले लेने की क्षमता और अपने सपनों पर अटूट विश्वास था। यही वजह है कि प्रकाश मेहरा का सफर आज भी हर उस इंसान को प्रेरित करता है, जो अपने बड़े सपनों के लिए छोटे-छोटे लालच ठुकराने का साहस रखता है।
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- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
सुंदर महल बनाना हो तो, सुदृढ़ प्रथम आधार करो।
रक्षा कर निज स्वाभिमान की, पहले खुद से प्यार करो।।
कठिन परिश्रम सतत प्रयासित, एकलव्य को ज्ञान मिला।
धूप-ताप नित सह-सहकर ही, सरवर में जलजात खिला।
श्रम संयम ताने-बाने से, रूप नवल साकार करो।।
विनम्रता व्यक्तित्व सजाए, रसना मीठे बोल कहे।
ज्ञानवान गुणवान बनो पर, द्वेष-दंभ किंचित न रहे।
धीरज के आभूषण पहनो, शुचिता से शृंगार करो ।।
पर-हितकारी जन को मिलता, लोगों से सम्मान सदा।
सहज-सरल बनकर सहयोगी, वंचित को दो दान सदा।
मानव तन पाया है सुंदर, ईश्वर का आभार करो ।।
दीप ज्ञान का जला हृदय में, कपट-कलुष तम दूर भगा।
प्रेम दया से धोकर कटुता, मन में साहस-शौर्य जगा।
अच्छाई से रहे सुवासित, सुंदर यह संसार करो।। - आलेख- प्रशांत शर्माजन्मदिन पर विशेष--11 जुलाईफिल्मी परदे पर सबको हंसाने वाली प्यारी टुनटुन (जन्म-11 जुलाई 1923 - निधन 23 नवम्बर 2003) की आज बर्थ एनिवर्सिरी है। वे लोगों के दिलों में ऐसे छाई कि आज भी यदि कोई मोटी महिला दिख जाती है, तो लोग मजाक में उसे टुनटुन कह देते हैं। टुनटुन ने अपना कॅरिअर पाश्र्वगायिका के रूप में अपने मूल नाम उमा देवी खत्री से शुरू किया था। अफसाना लिख रही रही हूं... गीत उन्होंने ही गाया है।नूरजहां के प्रति दीवानगी और गायिकी के जुनून ने उन्हें मथुरा से मुंबई पहुंचाया। चाचा के घर में पली-बढ़ी उमा देवी की हैसियत परिवार में एक नौकर के समान थी। घरेलू काम के सिलसिले में उमादेवी का दिल्ली के दरियागंज इलाके में रहने वाले एक रिश्तेदार के घर अक्सर आना-जाना लगा रहता था। वहीं उनकी मुलाक़ात अख्तर अब्बास क़ाज़ी से हुई, जो दिल्ली में आबकारी विभाग में निरीक्षक थे। काज़ी साहब उमा देवी का सहारा बने, लेकिन वे लाहौर चले गए।इस बीच उमा देवी ने भी गायिका बनने का ख्वाब पूरा करने के लिए मुंबई जाने की योजना बना ली। दिल्ली में जॉब करने वाली उनकी एक सहेली की मुंबई में फि़ल्म इंडस्ट्रीज के कुछ लोगों से पहचान थी। एक बार जब वो गांव आई, तो उसने उमा देवी को निर्देशक नितिन बोस के सहायक जव्वाद हुसैन का पता दिया। वर्ष 1946 था और उमादेवी 23 बरस की थी। वे किसी तरह हिम्मत जुटाकर गांव से भागकर मुंबई आ गई। जव्वाद हुसैन ने उन्हें अपने घर पनाह दी। मुंबई में उमा देवी की दोस्ती अभिनेता और निर्देशक अरूण आहूजा और उनकी पत्नी गायिका निर्मला देवी से हुई, जो मशहूर अभिनेता गोविंदा के माता-पिता थे। इस दंपत्ति ने उमा देवी का परिचय कई प्रोड्यूसर और डायरेक्टर से करवाया। उस समय तक अख्तर अब्बास काज़ी साहब भी मुंबई आ गए थे। 1947 में उमा देवी और काज़ी साहब ने शादी कर ली।उसके बाद उमा देवी काम की तलाश करने लगी। उन्हें कहीं से पता चला कि डायरेक्टर अब्दुल रशीद करदार फि़ल्म दर्द बना रहे हैं. वे उनके स्टूडियो पहुंचकर उनके सामने खड़े हो गई। उन्होंने पहले कभी करदार साहब को नहीं देखा था। बेबाक तो वो बचपन से ही थी, उनसे ही सीधे पूछ बैठी, करदार साहब कहां मिलेंगे? मुझे उनकी फि़ल्म में गाना गाना है। शायद उनका ये बेबाक अंदाज़ करदार साहब को पसंद आ गया, इसलिए बिना देर किये उन्होंने संगीतकार नौशाद के सहायक गुलाम मोहम्मद को बुलाकर उमा देवी का टेस्ट लेने को कह दिया। उस टेस्ट में उमादेवी ने फिल्म जीनत में नूरजहां द्वारा गाया गीत आँधियां गम की यूं चली गाया। हालांकि उमा देवी एक प्रशिक्षित गायिका नहीं थी, लेकिन रेडियो पर गाने सुनकर और उन्हें दोहराकर वे अच्छा गाने लगी थी। बरहलाल, उनका गया गाना सबको पसंद आया और वो 500 रुपये की पगार पर नौकरी पर रख ली गई।जब उमा देवी की मुलाक़ात नौशाद से हुई, तो उनसे भी बेबकीपूर्ण अंदाज़ में उन्होंने कह दिया कि उन्हें अपनी फि़ल्म में गाना गाने का मौका दें, नहीं तो वे उनके घर के सामने समुद्र में डूबकर अपनी जान दे देंगी। नौशाद साहब भी उनकी बेबाकी पर हैरान थे। खैर, उन्होंने उमा देवी को गाने मौका दिया और दर्द फिल्म का गीत अफ़साना लिख रही हूं ...उनसे गवाया। यह गीत बहुत हिट हुआ और आज तक लोगों की ज़ेहन में बसा हुआ है। उस फि़ल्म के अन्य गीत आज मची है धूम, ये कौन चला, बेताब है दिल .. भी लोगों को बहुत पसंद आये।फिर क्या था , उमा देवी की गायिका के रूप में गाड़ी चल पड़ी। कई फि़ल्मी गीतों को उन्होंने अपनी सुरीली आवाज़ से सजाया। 1947 में ही बनी फि़ल्म नाटक में उन्हें गाने का मौका मिला और उन्होंने गीत दिलवाले जल कर मर ही जाना गाया। फिर 1948 की फि़ल्म अनोखी अदा में दो सोलो गीत काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाए, दिल को लगा के हमने कुछ भी न पाया और फि़ल्म चांदनी रात में शीर्षक गीत'चांदनी रात है, हाय क्या बात है, में भी उन्होंने अपनी आवाज़ दी। उमादेवी को गाने के मौके मिलते रहे और वो गाती रहीं। उन्होंने कई फि़ल्मों में गाने गए। उनके द्वारा गाये गए गीत लगभग 45 के आस-पास हैं।बच्चों के जन्म के साथ उनकी पारिवारिक जि़म्मेदारियां बढ़ रही थी। साथ ही लता मंगेशकर , आशा भोंसले जैसी संगीत की विधिवत् शिक्षा प्राप्त गायिकाओं का भी बॉलीवुड फि़ल्म इंडस्ट्रीज में पदार्पण हो चुका था। उमादेवी ने गायन का प्रशिक्षण नहीं लिया था। इसलिए धीरे-धीरे उनका गायन का काम सिमटता गया और एक दिन वह अपना गायन करिअर छोड़कर पूरी तरह अपने परिवार में रम गई। परिवार चलाना मुश्किल हुआ तो उमादेवी ने फिर से फि़ल्मों में काम करने का मन बनाया।वे अपने गुरू नौशाद साहब से मिली। उमादेवी फिर से फि़ल्मों में गाना चाहती थीं, लेकिन समय आगे निकल चुका था। स्थिति को देखते हुए नौशाद साहब ने उन्हें कहा, तुम अभिनय में हाथ क्यों नहीं आजमाती? उमादेवी ने अपने बेबाक अंदाज़ में उन्होंने कह दिया, मैं एक्टिंग करूंगी, लेकिन दिलीप कुमार के साथ। दिलीप कुमार उस समय के सुपरस्टार थे। इसलिए उमादेवी की बात सुनकर नौशाद साहब हंस पड़े, लेकिन इसे किस्मत ही कहा जाए कि अपने अभिनय करिअर की शुरूआत उमादेवी ने दिलीप कुमार के साथ ही की। फिल्म थी - बाबुल जिसमें हिरोइन थीं - नर्गिस। उस वक्त उमा देवी का वजन काफी बढ़ गया था। दिलीप कुमार ने ही मोटी उमा को देखकर टुनटुन नाम दिया और यह नाम हमेशा के लिए उनके साथ जुड़ गया। फि़ल्म रिलीज़ हुई और छोटे से रोल में भी उनका अभिनय काफ़ी सराहा गय। उसके बाद आई मशहूर निर्माता-निर्देशक और अभिनेता गुरु दत्त की फि़ल्म मिस्टर एंड मिस 55 में उन्होंने अपने अभिनय के वे जौहर दिखाए कि हर कोई उनका कायल हो गया.बाद में टुनटुन की ख्याति इतनी बढ़ गई थी कि फि़ल्मकार उनके लिए अपनी फि़ल्म में विशेष रूप से रोल लिखवाया करते थे और टुनटुन भी हर रोल को अपने शानदार अभिनय से यादगार बना देती थीं। 70 के दशक के बाद उन्होंने फि़ल्मों में काम करना कम कर दिया और अधिकांश समय अपने परिवार के साथ गुजारने लगी। उनकी अंतिम फिल्म 1990 में आई कसम धंधे की थी। 24 नवंबर 2003 में उन्होंने इस दुनिया से विदा ली, लेकिन आज भी वे हिन्दी फिल्मों की पहली और सबसे सफ़ल महिला कॉमेडियन के रूप में याद की जाती हैं।
- आलेख- प्रशांत शर्मापुण्यतिथि पर विशेष- 12 जुलाई 2013फिल्म अभिनेता प्राण, जन्म 12 फरवरी, 1920, निधन- 12 जुलाई 2013, उपलब्धियां- अनगिनत। एक अच्छे इंसान, एक अच्छे अभिनेता और एक शानदार शख्सियत। ज्यादातर लोग उन्हें एक खलनायक और चरित्र अभिनेता के रूप में ही जानते हैं। आज उनके जन्मदिन पर हम उनकी जिदंगी के कुछ अनछुए पहलुओं का जिक्र कर रहे हैं।प्राण साहब ने खलनायकी शुरू करने से पहले कुछ फिल्मों में बतौर हीरो काम भी किया। उस दौरान उनके ऊपर कई गाने भी फिल्माए गए। लेकिन वो गाने इतने लोकप्रिय नहीं हुए, कि लोग उन्हें याद रख सकें। लेकिन कई फिल्मों में खलनायक, सहायक कलाकार होने के बाद भी उन पर कई गाने फिल्माए गए हैं, जो यादगार हैं। आज उन्हीं गानों की चर्चा....प्राण साहब पर फिल्माए गए कुछ गाने मुझे जो याद आ रहे हैं, उनमें फिल्म उपकार का गाना - कश्मे वादे प्यार वफा, जंजीर- यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी, आके सीधी लगी दिल पे जैसे कटरिया... (फिल्म हाफ टिकट) इत्यादि। जहां तक मुझे याद है प्राण साहब पर कम से कम 25 गाने तो फिल्माए ही गए हैं। आज सिलसिलेवार उनकी ही चर्चा...नूरजहां के हीरो बनेवर्ष 1942 में प्राण साहब ने जब फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा तो वे हीरो बनकर आए। उन्होंने उस वक्त सोचा भी नहीं था कि वे एक दिन हीरो नहीं, बल्कि खलनायक के रूप में इतने मशहूर होंगे कि लोग अपने बच्चों का नाम भी उनके नाम पर रखना पसंद नहीं करेंगे। फिल्म 1942 में प्राण खानदान फिल्म में नूरजहां के साथ हीरो बनकर आए थे। इस फिल्म में प्राण रोमांटिक हीरो थे। हालांकि उस वक्त हीरो अपने लिए प्लेबैंक सिगिंग खुद किया करते थे, लेकिन प्राण साहब का संगीत की दुनिया से कोई वास्ता नहीं था। लिहाजा उन्होंने गाने से इंकार कर दिया और भविष्य में कभी कोशिश भी नहीं की। इस फिल्म में उनके लिए जिस गायक ने गाना गाए , उसका नाम भी उपलब्ध नहीं है। मेरा अनुमान है कि यह आवाज गुलाम हैदर की है। फिल्म में प्राण के किरदार का नाम भी प्राण ही रखा गया था। इस फिल्म में नूरजहां और प्राण पर एक रोमांटिक गाना था.... गाने के बोल उड़ जा पंछी....जिसे नूरजहां और संगीतकार गुलाम हैदर ने गाया था। फिल्म में प्राण को शहजादा जहांगीर के रूप में देखकर लगता ही नहीं, कि ये प्राण हैं। इसी गाने के बोल हैं - उड़ जा पंछी, इंसान को इंसान से आजाद कराएं , उड़ जा पंछी, जो प्राण साहब की जिंदगी के साथ आज सटीक उतरता नजर आ रहा है।शारदा के साथ रोमांटिक फिल्म कीफिल्म गृहस्थी में जो 1948 में रिलीज हुई थी, में भी प्राण पर एक गाना फिल्माया गया था जिसके बोल थे- तेरे नाज उठाने को जी चाहता है। यह गाना प्राण और शारदा पर फिल्माया गया था। फिल्म में प्राण साहब के लिए मुकेश ने गाने गाए थे। वहीं देवआनंद साहब की फिल्म मुनीम जी तक आते प्राण साहब को निगेटिव शेड्स में मजा आने लगा था। 1955 में यह फिल्म रिलीज हुई थी। फिल्म में देवआनंद और नलिनी जयवंत मुख्य भूमिकाओं में थे और प्राण खलनायक बने थे। फिल्म का एक गाना -दिल की उमंगे हैं जवान...में देवआनंद, नलिनी और प्राण पर फिल्माया गया था। जिसे हेमंत कुमार और गीता दत्त ने गाया था। फिल्म में यह गाना देवआनंद , प्राण और नलिनी जयवंत पर फिल्माया गया था, लेकिन यह पहला गाना था, जिसमें प्राण ने काफी बेसुरे तरीके से गाया था और यह आवाज किसकी है, इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता, यहां तक कि इसके कैसेट या रिकॉड्र्स में भी नहीं।है आग हमारे सीने मेंराजकपूर ने जब फिल्म जिस देश में गंगा बहती है, बनाई तो उन्होंने प्राण साहब को इसमें महत्वपूर्ण रोल दिया। इस फिल्म में एक गाना- है आग हमारे सीने में ... तुम भी हो हम भी हैं दोनों हैं आमने -सामने,, में राजकपूर और पद्मिनी के साथ प्राण भी नजर आते हैं। इस गाने में प्राण के लिए मन्ना डे साहब ने अपनी आवाज दी थी। यह फिल्म 1961 में रिलीज हुई थी।प्राण का डांस करने का खास अंदाजप्राण पर फिल्माए गए मजेदार गानों में फिल्म हाफ टिकट का एक मशहूर गाना है - आके सीधी लगी दिल पे तेरी कटरिया...शामिल है। फिल्म में यह गाना किशोर कुमार ने डबल आवाज में गाया है, यानी प्राण के लिए किशोर कुमार ने गाया और लड़की की आवाज में किशोर कुमार ने खुद ही आवाज बदली। फिल्म में प्राण का डांस का अंदाज आज भी लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट ला देता है। वहीं 1963 आई फिल्म दिल ही तो है, में राजकपूर और नूतन पर एक गाने का फिल्मांकन हुआ है- तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी... में प्राण केवल यही कहते नजर आते हैं... मुश्किल होगी, मुश्किल होगी, क्या मुश्किल होगी?कश्मे वादे प्यार वफा, सब बातें हैं बातों का क्या...प्राण साहब के यादगार गानों में 1967 में आई मनोज कुमार की फिल्म उपकार का नाम सबसे ऊपर रखा जा सकता है। इस फिल्म में प्राण ने मलंग चाचा का किरदार निभाया था। प्राण ने इस फिल्म की शूटिंग के लिए बड़ी मेहनत की। फिल्म की पूरी शूटिंग के दौरान उनका दायां पैर घुटने से बंधा रहता था। इसी फिल्म में एक अर्थपूर्ण गाना प्राण पर फिल्माया गया था जिसके बोल हैं- कश्मे वादे प्यार वफा, सब बातें हैं बातों का क्या...। इस फिल्म के बाद तो जैसे प्राण , मनोज कुमार की फिल्मों का एक अभिन्न हिस्सा ही बन गए। प्राण का कॅरिअर ग्राफ बीच में काफी नीचे पहुंच गया था, क्योंकि उस वक्त तक कई खलनायक उभर कर सामने आ रहे थे। ऐसे में मनोज कुमार ने उपकार में मलंग चाचा के रोल में प्राण को लेकर जैसे उनके कॅरिअर में फिर से जान डाल दी। फिल्म बेईमान (1972) में प्राण और मनोज कुमार पर एक गाना पिक्चाइज हुआ था- हम दो मस्त मलंग।वहीं 1969 में फिल्म नन्हा फरिश्ता में एक गाना था बच्चे में हैं भगवान.. इस गाने को तीन लोगों ने गाया था मोहम्मद रफी, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर। यह गाना प्राण, अनवर हुसैन और अजीत पर फिल्माया गया था। इसके अलावा फिल्म विक्टोरिया नंबर 203, प्राण साहब के काफी करीब थी, क्योंकि उन्होंने इसमें काफी हटकर किरदार निभाया था। इस फिल्म में वे अशोक कुमार के साथ गाना गाते नजर आते हैं- दो बेचारे बिना सहारे फिरते हैं मारे - मारे। इस गाने में गायक महेन्द्र कपूर ने प्राण के लिए प्लैबैक सिंगिग की थी।जंजीर फिल्म से चरित्र भूमिकाएं शुरू कीवर्ष 1973 में आई फिल्म जंजीर फिल्म ने अमिताभ बच्चन को एक एंग्री यंग मैन का दर्जा दे दिया तो उनके शेरखान दोस्त यानी प्राण के कॅरिअर में चरित्र भूमिकाओं का एक नया दौर शुरू हुआ। इस फिल्म के एक गाने यारी है ईमान मेरा, का फिल्मांकन जब हो रहा था, प्राण की पीठ में जबर्दस्त दर्द था। बावजूद इसके उन्होंने इस गाने पर शानदार डांस किया, जबकि डांस के मामले में वे हमेशा कच्चे समझे जाते थे। इस फिल्म के बाद तो जैसे प्र्राण और अमिताभ की जोड़ी हिट हो गई। दोनों ने साथ में 14 फिल्में कीं। जिस फिल्म जंजीर ने अमिताभ की किस्मत बदली, वह उन्हें प्राण की सिफारिश से ही मिली थी। फिल्म शराबी में प्राण, अमिताभ के पिता के रोल में थे। अमिताभ के साथ ही उन्होंने 1974 में कसौटी फिल्म की जिसका एक गाना प्राण गाते हैं, काफी रोचक तरीके से फिल्माया गया है- हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है....। फिल्म में प्राण नेपाली की भूमिका में थे और उनके संवाद बोलने का नेपाली अंदाज काफी लोकप्रिय हुआ था।वहीं अमिताभ की ही फिल्म मजबूर में प्राण ने हेलेन के साथ -फिर न कहना माइकल दारू पीके दंगा करता है.. में जमकर ठुमके लगाए।राज की बात कह दूं तोप्राण साहब पर एक कव्वाली भी फिल्माई गई है जो काफी मशहूर हुई थी। यह कव्वाली फिल्म धर्मा की है जिसके बोल हैं- राज की बात कह दूं तो जाने महफिल में क्या ...इस गाने में प्राण साहब बिन्दू के साथ तकरार करते नजर आते हैं। इस गाने को रफी साहब और आशा भोंसले ने गाया था। फिल्म में नवीन निश्चल और रेखा मुख्य भूमिकाओं में थे।ऐसे ही कई और गाने हैं, जिसका हिस्सा प्राण साहब रहे थे। आज जब भी ये गाने बजते हैं, लोगों को प्राण साहब का चेहरा जरूर याद आता है। (छत्तीसगढ़आजडॉटकॉम विशेष)
- -99.95 प्रतिशत ऑटो म्यूटेशन सफलता दर ने रचा रिकॉर्ड, ऑटो डायवर्सन में 83.71 प्रतिशत प्रकरणों का हुआ निराकरण-कोरिया बना नंबर-1, धमतरी ने टॉप-5 में दर्ज कराई दमदार मौजूदगी; जिलों के प्रदर्शन ने दिखाई जवाबदेह प्रशासन की तस्वीर--NGDRS इंटीग्रेशन, मल्टीपल खसरा और रिकवरी मॉड्यूल से राजस्व सेवाओं को मिलेगा नया डिजिटल ढांचा-आम नागरिक को दफ्तरों के चक्कर से राहत, पारदर्शिता और समयबद्ध निस्तारण के साथ सुशासन का मजबूत मॉडल बन रहा छत्तीसगढ़आलेख- विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालकरायपुर /सुशासन के नए डिजिटल युग में राजस्व प्रशासन अब फाइलों और लंबित प्रकरणों के पारंपरिक चक्रव्यूह से बाहर निकल चुका है। राज्य शासन के राजस्व, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग ने तकनीक को माध्यम बनाकर जमीन से जुड़ी सेवाओं का पूरी तरह कायाकल्प कर दिया है। 'ऑटो म्यूटेशन' (स्वतः नामांतरण) और 'ऑटो डायवर्सन' (स्वतः व्यवर्तन) जैसी जन-हितैषी व्यवस्थाओं ने विभाग को तेज, पारदर्शी और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त बनाया है। इससे आम नागरिकों को दफ्तरों के चक्कर, लंबे इंतजार और मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना से स्थायी मुक्ति मिली है।पहले रजिस्ट्री के बाद नामांतरण के लिए अलग से आवेदन और भौतिक सत्यापन की थकाऊ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति से अब यह स्वतः संपन्न हो रहा है। इसके साथ ही, भूमि उपयोग परिवर्तन (डायवर्सन) के लिए आवेदन, प्रीमियम निर्धारण और शुल्क गणना को भी आधुनिक तकनीक से त्रुटिहीन बनाया गया है। छत्तीसगढ़ का यह डिजिटल गवर्नेंस मॉडल आज देश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बनकर उभरा है।राजस्व विभाग द्वारा जारी प्रामाणिक आंकड़े इस ऐतिहासिक परिवर्तन की गवाही देते हैं। राज्य में अब तक कुल 1 लाख 40 हज़ार 607 पंजीकृत विलेखों में से रिकॉर्ड 1 लाख 40 हज़ार 536 मामलों का सफलतापूर्वक ऑटो म्यूटेशन किया जा चुका है। संपूर्ण प्रदेश में केवल 71 प्रकरण प्रक्रियाधीन हैं, जिससे विभाग ने 99.95 प्रतिशत की अभूतपूर्व सफलता दर हासिल की है।वहीं दूसरी ओर, 'ऑटो डायवर्सन' व्यवस्था के तहत कुल 5 हजार 661 आवेदन दर्ज किए गए, जिनमें से 4 हज़ार 739 मामलों का त्वरित निराकरण किया गया। इस प्रकार 83.71 प्रतिशत प्रकरणों का निस्तारण कर यह साबित कर दिया गया कि जटिल तकनीकी प्रक्रियाओं को भी डिजिटल माध्यम से सुगम और पारदर्शी बनाया जा सकता है। राजस्व सेवाएँ सीधे नागरिक के जीवन, संपत्ति और निवेश से जुड़ी होती हैं; अतः इनमें गति आने से राज्य की आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक गतिविधियों को नई रफ्तार मिली है।किसी भी संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद भू-अभिलेखों में नाम दर्ज होना एक अनिवार्य प्रक्रिया है। पुराने दौर में पटवारियों और तहसील कार्यालयों के चक्कर काटना, दस्तावेजों की जांच में महीनों गंवाना और अनिश्चितता का सामना करना आम बात थी, जिसने भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा दिया।आज छत्तीसगढ़ की तस्वीर बदल चुकी है। 1 लाख 40 हज़ार 607 पंजीकृत विलेखों में से 1 लाख 40 हज़ार 536 मामलों का स्वतः नामांतरण होना यह दर्शाता है कि अब नागरिक को अपने हक के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ रहा है। इस व्यवस्था से समय और धन की भारी बचत हो रही है और रिकॉर्ड रीयल-टाइम अपडेट होने से जमीनी धोखाधड़ी पर लगाम लगी है।इस सफलता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा एक सख्त तकनीकी लॉक सिस्टम विकसित किया गया है। इसके तहत, यदि किसी संपत्ति का एक भी पुराना ऑटो म्यूटेशन लंबित है, तो संबंधित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में उस संपत्ति की अगली रजिस्ट्री तब तक नहीं हो पाएगी जब तक पिछला म्यूटेशन क्लियर न हो जाए। यह कदम निचले स्तर के प्रशासनिक अमले को जवाबदेह बनाता है।कृषि भूमि को आवासीय, वाणिज्यिक या औद्योगिक उपयोग में बदलना (डायवर्सन) शहरीकरण, निवेश और रोजगार सृजन की रीढ़ है। पहले आवेदकों को शुल्क, आवश्यक दस्तावेजों और समय सीमा की स्पष्ट जानकारी नहीं होती थी। फरवरी से जून 2026 के बीच 5 हजार 661 आवेदनों में से 4 हजार 739 का त्वरित निस्तारण यह दिखाता है कि विभाग ने गाइडलाइन दरों के आधार पर प्रीमियम निर्धारण जैसी पेचीदा प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित कर दिया है। वर्तमान में जो 922 लंबित मामले हैं, उनके पीछे अपूर्ण दस्तावेज, चालान राशि में तकनीकी अंतर या नगर तथा ग्राम निवेश (TNCP) के मास्टर प्लान से भिन्न प्रयोजन होना जैसे व्यावहारिक कारण हैं। इन चुनौतियों को सार्वजनिक करना विभाग की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को दर्शाता है।ऑटो डायवर्सन के क्रियान्वयन में जिलों के बीच एक स्वस्थ और परिणाम-उन्मुख प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है, जो यह प्रमाणित करती है कि सुधार जमीनी स्तर पर लागू हो चुके हैं। कोरिया जिला कुल 59 प्रकरणों में से सभी 59 का शत-प्रतिशत निराकरण कर 100 प्रतिशत सफलता दर के साथ पूरे राज्य में प्रथम स्थान पर रहा।कोरबा जिला 98.46 प्रतिशत की सफलता दर के साथ अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। इसी तरह मुंगेली जिला 94.16 प्रतिशत मामलों का निपटारा कर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।बालोद जिला 93.72 प्रतिशत निस्तारण दर के साथ शीर्ष जिलों में शामिल रहा।धमतरी जिला कुल 165 प्रकरणों में से 153 का वैधानिक निराकरण कर 92.73 प्रतिशत सफलता दर के साथ राज्य में पाँचवाँ (शीर्ष-5) स्थान प्राप्त किया। धमतरी का यह प्रदर्शन नियमित समीक्षा और जवाबदेह कार्यशैली का परिणाम है।विभाग अपनी वर्तमान उपलब्धियों से आगे बढ़कर एक एकीकृत 'डिजिटल इकोसिस्टम' के निर्माण में जुटा है। NGDRS API Integration इसके माध्यम से सरकारी गाइडलाइन दरें सीधे पोर्टल से प्राप्त हो रही हैं, जिससे प्रीमियम का निर्धारण मानवीय हस्तक्षेप के बिना पूरी तरह स्वचालित और पारदर्शी हो गया है।यदि पहले से डायवर्टेड भूमि का आंतरिक उपयोग बदलना हो (जैसे आवासीय से वाणिज्यिक), तो इस मॉड्यूल के तहत निस्तारण के लिए 15 दिवस की समय सीमा तय की गई है।एक से अधिक खसरों वाली भूमि के लिए अब एक ही आवेदन में अनेक खसरों का चयन, स्वतः शुल्क गणना और ई-चालान की सुविधा मिलेगी। इसके लिए समय सीमा जुलाई 2026 रखा गया है। पुराने लंबित मामलों के निपटारे के लिए पूर्व भुगतानों की प्रविष्टि, शेष प्रीमियम की गणना, भू-राजस्व/उपकर की मांग और एक उच्च स्तरीय रिकवरी डैशबोर्ड की व्यवस्था की जाएगी।इसके लिए समय सीमा अगस्त 2026 निर्धारित किया गया है।यह ऐतिहासिक बदलाव सिर्फ तकनीकी आंकड़ों का नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के पौने तीन करोड़ नागरिकों के जीवन को सरल और सुरक्षित बनाने का माध्यम है। किसान, गृहस्वामी, व्यापारी और औद्योगिक निवेशक सभी को अब घर बैठे अपने मोबाइल पर पारदर्शी सेवाएँ मिल रही हैं।दिसंबर 2026 तक के लिए तय किए गए रोडमैप के अनुसार, राज्य के सभी क्षेत्रों की सैटेलाइट/ड्रोन मैपिंग, टीएनसीपी से एनओसी लिंकिंग और मुख्य भू-अभिलेख पोर्टल का वृहद् अपग्रेडेशन किया जाना है। ये कदम छत्तीसगढ़ को डिजिटल राजस्व प्रशासन के क्षेत्र में एक राष्ट्रीय बेंचमार्क के रूप में स्थापित करने के लिए पूरी तरह तैयार कर रहे हैं। तकनीक, संवेदनशीलता और जवाबदेही के इस बेजोड़ संगम से छत्तीसगढ़ ने जन-केंद्रित शासन की एक नई मिसाल पेश की है। file photo
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-श्रद्धांजलि
-डॉ. सुधीर शर्मा
-अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़
आज छत्तीसगढ़ ने अपनी वह स्वर-साधिका खो दी, जिसने अपनी बुलंद आवाज़, अद्भुत अभिनय और अप्रतिम लोक-प्रतिभा से न केवल पंडवानी को नया जीवन दिया, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को विश्व मंच पर स्थापित किया। पद्म विभूषण से सम्मानित लोकगायिका डॉ. तीजन बाई का निधन केवल एक कलाकार का अवसान नहीं है, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति के एक उज्ज्वल अध्याय का विराम है।
तीजन बाई का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि प्रतिभा किसी सुविधा की मोहताज नहीं होती। दुर्ग जिले के गनियारी ग्राम में जन्मी इस असाधारण लोक कलाकार ने अत्यंत साधारण परिस्थितियों से अपनी यात्रा आरम्भ की। बचपन में अपने नाना से महाभारत की कथाएँ सुनते-सुनते उनके भीतर पंडवानी का बीज अंकुरित हुआ। उन्होंने कठिन संघर्षों के बीच अपनी साधना जारी रखी और समाज की रूढ़ियों को चुनौती देते हुए पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देने वाली पहली महिला कलाकार बनीं। यह केवल कला का परिवर्तन नहीं था, बल्कि स्त्री अस्मिता और आत्मविश्वास की भी ऐतिहासिक घोषणा थी।
तीजन बाई ने महाभारत को केवल गाया नहीं, बल्कि उसे मंच पर जीवंत कर दिया। उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का रथ और कभी द्रौपदी की वेदना। उनकी वाणी में लोक का दर्द था, अभिनय में महाकाव्य का वैभव और प्रस्तुति में भारतीय संस्कृति की विराटता। दर्शक केवल श्रोता नहीं रहते थे; वे स्वयं महाभारत के पात्रों के साथ चलने लगते थे।
लोक रंगकर्मी हबीब तनवीर की दृष्टि जब तीजन बाई पर पड़ी, तब उनकी कला को राष्ट्रीय पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने देश ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक गरिमा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने सिद्ध किया कि लोककला किसी क्षेत्र की सीमा में बंधी नहीं होती; उसकी संवेदना सार्वभौमिक होती है।
उनकी कला-साधना को भारत सरकार ने पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण और अंततः पद्म विभूषण से सम्मानित किया। अनेक विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधियाँ प्रदान कीं। परंतु इन सम्मानों से कहीं अधिक बड़ा सम्मान वह प्रेम था, जो उन्हें करोड़ों श्रोताओं और दर्शकों से मिला।
तीजन बाई छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता की जीवित प्रतीक थीं। उन्होंने यह स्थापित किया कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, संस्कृति और आत्मा की वाहक होती है। उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी लोकपरंपराओं पर गर्व करना सिखाया और यह विश्वास जगाया कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी विश्व पटल पर सम्मान प्राप्त किया जा सकता है।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब उनका स्वर, उनकी शैली और उनकी सांस्कृतिक चेतना सदैव जीवित रहेगी। आने वाली पीढ़ियाँ जब भी पंडवानी का नाम लेंगी, तीजन बाई का स्मरण श्रद्धा और गर्व के साथ करेंगी। वे केवल एक कलाकार नहीं थीं; वे छत्तीसगढ़ की आत्मा की आवाज़ थीं।
छत्तीसगढ़ की धरती अपनी इस महान लोकनायिका को शत-शत नमन करती है। भारतीय लोकसंस्कृति सदैव उनकी ऋणी रहेगी। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करे तथा उनके परिजनों, शिष्यों और असंख्य प्रशंसकों को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे।
विनम्र श्रद्धांजलि!
"स्वर भले मौन हो गया हो, पर संस्कृति का वह आलोक कभी नहीं बुझेगा।
तीजन बाई का नाम भारतीय लोकपरंपरा के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।" -
- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
सावन मनभावन आया है, याद तुम्हारी आई प्रियतम।
पुलकित हर्षित है वसुंधरा, मैं ही हूँ मुरझाई प्रियतम ।।
ताल दे रहीं बूँदें छम-छम, मौन हुई है मेरी पायल।
प्रेमी युगल प्रणय क्रीड़ा रत, देख हुआ है अंतस् घायल।
छवि-दर्शन कर तस्वीरों में, आती मुझे रुलाई प्रियतम ।।
सावन मनभावन आया है, याद तुम्हारी आई प्रियतम।।
नेह-मेह स्वस्त्ययन कर रहे, उमड़-घुमड़ गरजें बादल।
झड़ी लगी चक्षुज-बूँदों की, अस्त-व्यस्त नयनों का काजल ।
खिलकर मधुमालती बुलाती, मन को नहीं लुभाई प्रियतम।।
सावन मनभावन आया है, याद तुम्हारी आई प्रियतम।।
प्रेम रंग में मन अनुरंजित, रंग नहीं अब देखे दूजा ।
शिव भक्तों पर करें अनुग्रह, करती रहती मन से पूजा।
निविड़ तमस कारा पीड़ा की, दिवस लगें दुखदाई प्रियतम।।
सावन मनभावन आया है, याद तुम्हारी आई प्रियतम।। - -किसान भईयों को कम लागत में होगी अधिक पैदावारीविशेष लेख :तेजबहादुर सिंह भुवाल, सहा. जनसंपर्क अधिकारीरायपुर। छत्तीसगढ़ को देश का धान का कटोरा कहा जाता है। यहां की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है और किसानों की समृद्धि राज्य के विकास से सीधे जुड़ी हुई है। बदलते समय के साथ खेती में नई तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है, जिनमें नैनो उर्वरक किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण नवाचार के रूप में उभरा है। कम लागत, अधिक प्रभाव और पर्यावरण संरक्षण जैसे गुणों के कारण नैनो उर्वरक आज किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा हैं।नैनो उर्वरक अत्यंत सूक्ष्म कणों से निर्मित होते हैं, जिन्हें पौधे तेजी से और अधिक मात्रा में अवशोषित कर लेते हैं। इसके कारण पौधों को आवश्यक पोषक तत्व सही समय पर उपलब्ध हो जाते हैं और फसलों का विकास बेहतर तरीके से होता है। पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में इनकी मात्रा कम लगती है, जिससे किसानों का खर्च घटता है और उत्पादन में वृद्धि होती है। छत्तीसगढ़ में धान, मक्का, चना, अरहर तथा सब्जी फसलों में नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का उपयोग किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहा है। प्रदेश में कई किसानों ने अनुभव किया है कि नैनो उर्वरकों के प्रयोग से फसल की पैदावार बेहतर होती है, पौधे अधिक हरे-भरे रहते हैं और उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार होता है।नैनो उर्वरकों का एक बड़ा लाभ यह भी है कि इनके उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव कम पड़ता है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से जहां भूमि की गुणवत्ता प्रभावित होती है, वहीं नैनो उर्वरक संतुलित पोषण प्रदान कर मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायता करते हैं। साथ ही जल स्रोतों में रासायनिक तत्वों के बहाव को भी कम करते हैं, जिससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।परिवहन और भंडारण की दृष्टि से भी नैनो उर्वरक काफी सुविधाजनक हैं। पारंपरिक उर्वरकों की भारी बोरियों की जगह छोटी बोतलों में उपलब्ध नैनो उर्वरक किसानों के लिए आसानी से ले जाने और उपयोग करने योग्य होते हैं। इससे समय और श्रम दोनों की बचत होती है।छत्तीसगढ़ सरकार किसानों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक कृषि तकनीकों से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। नैनो डीएपी और नैनो यूरिया जैसे उन्नत उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देकर खेती को अधिक उत्पादक, किफायती और टिकाऊ बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। आधुनिक तकनीक और नवाचार आधारित खेती ही भविष्य की कृषि का आधार है। नैनो उर्वरकों का उपयोग न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि व्यवस्था को भी बढ़ावा देगा।छत्तीसगढ़ सरकार तथा कृषि विभाग किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए लगातार प्रेरित कर रही हैं। इसी क्रम में माननीय मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय जी ने भी राज्य के किसानों से अपील की है कि वे वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और नवीन तकनीकों को अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी बनाएं। उन्होंने किसानों को नैनो उर्वरकों के उपयोग के प्रति जागरूक होने तथा कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार इनका प्रयोग करने का आग्रह किया है, ताकि उत्पादन बढ़े, लागत घटे और किसानों की आय में वृद्धि हो सके।वर्तमान में कृषि क्षेत्र में बढ़ती लागत और संसाधनों की सीमित उपलब्धता के बीच नैनो उर्वरक किसानों के लिए एक प्रभावी विकल्प बनकर सामने आए हैं। यह तकनीक कम खर्च में बेहतर उत्पादन, स्वस्थ मिट्टी और सुरक्षित पर्यावरण का मार्ग प्रशस्त करती है। यदि छत्तीसगढ़ के किसान वैज्ञानिक सलाह और संतुलित उपयोग के साथ नैनो उर्वरकों को अपनाते हैं, तो आने वाले समय में यह राज्य की कृषि उन्नति और किसानों की आर्थिक समृद्धि का मजबूत आधार बन सकता है। निस्संदेह, नैनो उर्वरक छत्तीसगढ़ के किसान भाइयों के लिए आधुनिक खेती का नया वरदान साबित हो सकता है।
- -जहां हरियाली, कल-कल बहता झरना और लोककथाओं का अद्भुत संगम पर्यटकों को करता है मंत्रमुग्धविशेष लेख : * सुनील त्रिपाठी, सहायक संचालक जनसंपर्क* नूतन सिदार, सहायक संचालक जनसंपर्करायपुर। छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला अपनी प्राकृतिक संपदा, घने वनों, पहाड़ियों और मनमोहक जलप्रपातों के लिए पूरे प्रदेश में विशेष पहचान रखता है। इन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में शामिल है रानीदाह जलप्रपात, जो अपनी अलौकिक सुंदरता, शांत वातावरण और ऐतिहासिक लोककथाओं के कारण पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन चुका है। जशपुर नगर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पर्यटन स्थल प्रकृति प्रेमियों, फोटोग्राफी के शौकीनों और रोमांच पसंद पर्यटकों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।रानीदाह तक पहुँचने का सफर भी अपने आप में यादगार अनुभव है। हरियाली से आच्छादित पहाड़ियों, घने साल के जंगलों और घुमावदार खूबसूरत सड़कों से गुजरते हुए जैसे ही पर्यटक इस स्थल पर पहुँचते हैं, सामने ऊँची चट्टानों से गिरती दूधिया जलधारा, चारों ओर फैली हरियाली और पक्षियों का मधुर कलरव मन को सुकून से भर देता है। विशेषकर वर्षा ऋतु में यह जलप्रपात अपने पूरे वैभव में दिखाई देता है, जब पानी अनेक धाराओं में विभाजित होकर ऊँचाई से नीचे गिरता है और अद्भुत प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करता है।रानीदाह केवल प्राकृतिक सौंदर्य का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यह स्थानीय लोककथाओं और जनश्रुतियों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, बहुत समय पहले ओडिशा की राजकुमारी रानी शिरोमणि इन पहाड़ियों तक पहुँची थीं। जब उनके पिता और पाँच भाई उनका पीछा करते हुए यहाँ आए, तब रानी ने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए इसी गहरी खाई में छलांग लगाकर अपने प्राण त्याग दिए। तभी से इस स्थान का नाम रानीदाह पड़ा, जिसका अर्थ है ‘रानी का जलप्रपात‘। झरने के समीप स्थित कुछ चट्टानों को आज भी स्थानीय लोग ‘पाँच भैया‘ के नाम से जानते हैं, जिन्हें रानी के पाँच भाइयों का प्रतीक माना जाता है। यह लोककथा आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।रानीदाह जलप्रपात अपने शांत वातावरण, स्वच्छ प्राकृतिक परिवेश और मनोहारी दृश्यों के कारण परिवारों, युवाओं और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक आदर्श पिकनिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ आने वाले पर्यटक प्रकृति के बीच सुकून के पल बिताने के साथ-साथ यादगार फोटोग्राफी और ट्रैकिंग का भी आनंद लेते हैं। सप्ताहांत और वर्षा ऋतु में यहाँ बड़ी संख्या में पर्यटक पहुँचते हैं।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक एवं धार्मिक पर्यटन स्थलों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जशपुर जिले के रानीदाह जैसे प्राकृतिक पर्यटन स्थल प्रदेश की पर्यटन पहचान को नई ऊँचाइयाँ दे रहे हैं। यदि आप प्रकृति की अनुपम छटा, शांत वातावरण और लोक संस्कृति का अनूठा अनुभव एक साथ लेना चाहते हैं, तो जशपुर का रानीदाह जलप्रपात निश्चित रूप से आपकी यात्रा सूची में शामिल होना चाहिए।
- - लघुकथास्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)स्वाति आज पहली बार सीमा के साथ बाजार गई थी । उसने देखा सीमा कुछ चुनिंदा दुकानदारों से ही खरीदारी कर रही थी । उसके कई काम की चीजें उनके पास न होने पर वह किसी और से वह सामान नहीं खरीद रही थी बल्कि उन्हें ही अगली बार मँगाकर रखने के लिए कह रही थी । स्वाति ने सीमा को किसी भी दूसरे दुकानदार से वह सामान खरीदने को कहा तो उसने मना कर दिया यह कहकर कि वे ईमानदार नहीं हैं ।" थोड़ी देर में किसी का चेहरा देखकर तुम कैसे कह सकती हो कि यह ईमानदार है या बेईमान ?" स्वाति ने अपनी शंका प्रकट करते हुए कहा । " मैं जान - बूझकर कई बार उन्हें दो - चार रुपये अधिक दे देती हूँ जो ईमानदार होते हैं वे सच बताते हुए पैसे वापस कर देते हैं , खोटी नीयत वाले चंद रुपयों के लाभ का मोह नहीं छोड़ पाते और ग्राहकों का विश्वास खो देते हैं । बस , यही है मेरा ईमानदारी परखने का थर्मामीटर "।स्वाति को भी भा गया था यह थर्मामीटर ।
- विशेष लेख : - तेजबहादुर सिंह भुवाल, सहा. जनसंपर्क अधिकारीरायपुर। किसान परिवार से निकलकर छत्तीसगढ़ प्रदेश के सर्वाेच्च नेतृत्व तक पहुंचने वाले मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने अपने सरल व्यक्तित्व, विनम्र व्यवहार और जनसेवा की भावना से जनता के बीच एक अलग पहचान बनाई है। मुख्यमंत्री श्री साय का सार्वजनिक जीवन सादगी, जनसेवा और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। लंबे समय तक जनप्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों, वनवासियों, युवाओं, महिलाओं और वंचित वर्गों की समस्याओं को निकट से समझा और उनके समाधान के लिए निरंतर प्रयास किए हैं। सत्ता के शीर्ष पद पर होने के बावजूद उनकी सादगी और सहजता आज भी उनकी सबसे बड़ी ताकत है।मुख्यमंत्री श्री साय आम जनता से सीधे संवाद को लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति मानते हैं। जनदर्शन, सुशासन तिहार और विभिन्न जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से वे स्वयं लोगों की समस्याएं सुनते हैं और उनके समाधान के लिए त्वरित पहल करते हैं। बुजुर्गों के प्रति सम्मान, बच्चों के प्रति स्नेह तथा जरूरतमंदों की सहायता के लिए तत्परता उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान है।आदिवासी समाज से आने वाले मुख्यमंत्री श्री साय अपनी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों से गहराई से जुड़े हुए हैं। गांवों में बैठकर लोगों से चर्चा करना, उनकी समस्याओं को समझना और विकास योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है।पिछले ढाई वर्षों में छत्तीसगढ़ सरकार ने जनकल्याण, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, अधोसंरचना, निवेश और सुशासन के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। सरकार का लक्ष्य केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना रहा है।राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी महतारी वंदन योजना के माध्यम से लाखों महिलाओं को 1000 रुपए प्रतिमाह आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। इस वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने 8,200 करोड़ रूपये का बजट महतारी वंदन योजना के लिए आवंटित किया है। महतारी वंदन योजना छत्तीसगढ़ में महिलाओं के स्वावलंबन, स्वास्थ्य और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है, जो लाखों महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार ला रही है।छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसान हैं। राज्य सरकार ने धान खरीदी को प्राथमिकता देते हुए किसानों से 3100 रूपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी सुनिश्चित की तथा लाखों किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाया।प्रदेश में गरीब और जरूरतमंद परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराने की दिशा में सरकार ने बड़ी पहल करते हुए लाखों आवासों को स्वीकृति प्रदान की। इससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आवासीय सुविधाओं का विस्तार हुआ है। प्रधानमंत्री आवास योजना के क्रियान्वयन में छत्तीसगढ़ ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। तेज गति से चल रहे निर्माण कार्यों के चलते प्रदेश में लाखों जरूरतमंद परिवारों का पक्के घर का सपना साकार हो रहा है।बस्तर के जंगलों में उत्पादित होने वाले तेंदूपत्ता, आदिवासी समाज की जिंदगी का अहम हिस्सा है। इसी तेंदूपत्ता के सहारे हजारों गांवों में गर्मियों के महीनों में रोज़गार मिलता है। इस काम में बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल होती हैं, जिससे परिवार की कुल आय में संतुलन बनता है। यही वजह है कि तेंदूपत्ता संग्रहण को सरकार ग्रामीण रोजगार का मजबूत जरिया मानती है। राज्य सरकार ने तेन्दूपत्ता संग्राहकों को बड़ी रहत देते हुए तेंदूपत्ता संग्रहण दर में अहम बदलाव किया है। पूर्व में मिलने वाली राशि को 4,000 रुपये से बढ़ाकर 5,500 रुपये किया है। यह बढ़ोतरी सीधे-सीधे संग्राहकों लाभ पहुंचा रही है। जानकारों के अनुसार पहले बढ़ती महंगाई के मुकाबले संग्रहण की दर कम पड़ रही थी, लेकिन नई दर से मजदूरी और मेहनत का बेहतर मूल्य मिल सकेगा।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार सुरक्षा के साथ-साथ संवेदनशील पुनर्वास और विकास पर भी समान रूप से कार्य कर रही है। नक्सली सरेंडर, विक्टिम रिलीफ एंड रिहैबिलिटेशन पॉलिसी-2025 के तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों को वित्तीय सहायता, कौशल विकास प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर तथा आवास जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराकर उन्हें सम्मानजनक और मुख्यधारा से जुड़ा जीवन प्रदान किया जा रहा है।एक नवंबर 2024 से लागू छत्तीसगढ़ सरकार की नई औद्योगिक नीति 2024-30 राज्य को निवेश और उद्योगों के लिए नई पहचान दे रही है। न्यूनतम शासन, अधिकतम प्रोत्साहन के सिद्धांत पर आधारित यह नीति उद्योग स्थापना की प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और निवेशक-अनुकूल बनाती है।व्यवसाय शुरू करने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम 2.0, पूरी तरह ऑनलाइन आवेदन, समयबद्ध स्वीकृति और त्वरित प्रोसेसिंग जैसी आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं। इससे उद्यमियों को कम समय में आवश्यक अनुमतियाँ प्राप्त हो रही हैं और कारोबार करने में सुगमता बढ़ी है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में मजबूत और आधुनिक परिवहन नेटवर्क के निर्माण पर विशेष जोर दिया गया है। राज्य में रेल, सड़क और हवाई संपर्क का तेजी से विस्तार हो रहा है, जिससे उद्योग, व्यापार, पर्यटन और आम नागरिकों की आवाजाही पहले से अधिक सुगम हुई है।छत्तीसगढ़ सरकार राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों का निरंतर उन्नयन, नई सड़कों और पुलों का निर्माण तथा दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्य मार्गों से जोड़ने के प्रयासों ने प्रदेश की कनेक्टिविटी को नई गति दी है। इससे माल परिवहन की लागत और समय में कमी आई है, जिससे उद्योगों और निवेशकों को सीधा लाभ मिल रहा है।राज्य शासन की पहल से रेल नेटवर्क के विस्तार और नई रेल परियोजनाओं के माध्यम से औद्योगिक क्षेत्रों, खनिज संपदा वाले इलाकों और प्रमुख शहरों को बेहतर रेल संपर्क उपलब्ध कराया जा रहा है। वहीं, हवाई सेवाओं के विस्तार, नए एयर रूट और बेहतर विमानन सुविधाओं से राज्य की राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच और भी मजबूत हुई है। बेहतर परिवहन अवसंरचना के कारण छत्तीसगढ़ आज निवेश, व्यापार और पर्यटन के लिए अधिक आकर्षक बन रहा है। यह मजबूत कनेक्टिविटी राज्य के समग्र आर्थिक विकास को नई दिशा देने के साथ-साथ रोजगार और क्षेत्रीय विकास के नए अवसर भी सृजित कर रही है।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर रुख अपनाते हुए प्रशासनिक जवाबदेही को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी है। योजनाओं में लापरवाही और अनियमितताओं पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को शासन की आधारशिला बनाया है। भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत प्रशासन को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जन-केंद्रित बनाने के लिए प्रभावी कदम उठाए गए हैं।सरकार ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित जांच, दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कड़ी विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई, तथा अनियमितताओं में शामिल व्यक्तियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों की निगरानी को तकनीक आधारित बनाया गया है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों मजबूत हुई हैं। इसके लिए ई-ऑफिस, सिंगल विंडो सिस्टम 2.0, ई-गवर्नेंस और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से प्रशासन को अधिक पारदर्शी, सरल और जवाबदेह बनाया गया है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रशासनिक कार्यप्रणाली को अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और जनोन्मुखी बनाने के लिए सुशासन तिहार के माध्यम से प्रदेश में कही भी औचक निरीक्षण की व्यवस्था को प्रभावी रूप से लागू किया है। मुख्यमंत्री, मंत्रीगण, वरिष्ठ अधिकारी एवं जिला प्रशासन द्वारा नियमित औचक निरीक्षणों के माध्यम से जिलों के सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, विद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों, राशन दुकानों और विभिन्न विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति का प्रत्यक्ष आकलन किया जा रहा है।इन निरीक्षणों के दौरान लापरवाही, अनियमितता और भ्रष्टाचार के मामलों में तत्काल कार्रवाई, जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई तथा आवश्यक सुधार के निर्देश दिए जा रहे हैं। इससे प्रशासनिक तंत्र में अनुशासन बढ़ा है और अधिकारियों की जवाबदेही पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है।औचक निरीक्षणों के परिणामस्वरूप सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में गुणवत्ता, समयबद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित हुई है। आम नागरिकों को मिलने वाली सेवाओं में सुधार आया है तथा जनता का शासन व्यवस्था पर विश्वास और अधिक सुदृढ़ हुआ है।सुशासन की इसी कार्य पद्धति के माध्यम से छत्तीसगढ़ सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करे तथा शासन की प्रत्येक योजना का लाभ समय पर और प्रभावी ढंग से आमजन तक पहुंचे।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ विकास, सुशासन और जनकल्याण के नए युग की ओर तेजी से अग्रसर है। सरकार का लक्ष्य केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से प्रत्येक नागरिक तक विकास का लाभ पहुँचाना है। सुशासन, पारदर्शिता, निवेश, अधोसंरचना, कृषि, महिला सशक्तिकरण, युवाओं के रोजगार और औद्योगिक विकास को केंद्र में रखकर राज्य में व्यापक परिवर्तन की दिशा में कार्य किया जा रहा है। नई औद्योगिक नीति, बेहतर सड़क, रेल और हवाई संपर्क, डिजिटल शासन, भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस, किसानों और महिलाओं के हित में लागू योजनाएँ तथा बुनियादी सुविधाओं का विस्तार विकसित छत्तीसगढ़ की मजबूत नींव तैयार कर रहे हैं।राज्य सरकार का संकल्प है कि सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के मंत्र को आत्मसात करते हुए छत्तीसगढ़ को देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में स्थापित किया जाए। विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना और प्रत्येक क्षेत्र में संतुलित एवं समावेशी प्रगति सुनिश्चित करना सरकार की सर्वाेच्च प्राथमिकता है।विकसित छत्तीसगढ़ का यह अभियान केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, सुशासन और आधुनिक अधोसंरचना के माध्यम से एक समृद्ध, आत्मनिर्भर, सशक्त और खुशहाल छत्तीसगढ़ के निर्माण का संकल्प है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य निरंतर नए अवसरों, नई उपलब्धियों और नई संभावनाओं के साथ विकास की नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा है।सरल व्यक्तित्व, संवेदनशील हृदय और सशक्त नेतृत्व यही मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की पहचान है, जो छत्तीसगढ़ को विकास और समृद्धि की नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर कर रही है।
- -भौगोलिक दूरियां होंगी खत्म: वनांचलों से लेकर शहरों तक पहुंच रही आधुनिक शिक्षाआलेख- विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालकरायपुर। छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा जगत में एक नए युग का सूत्रपात हो चुका है। वर्ष 2014 से 2026 के बीच केंद्र सरकार से मिली प्रमुख स्वीकृतियों और सौगातों की शृंखला में 'प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान' (PM-USHA) राज्य के लिए वरदान साबित हो रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के प्रभावी क्रियान्वयन, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की नैशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल (NAAC) ग्रेडिंग में सुधार, और अनुसंधान (Research) के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा भारी-भरकम वित्तीय अनुदान की स्वीकृति दी गई है। यह योजना पूर्ववर्ती राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) का ही एक परिष्कृत और अधिक उन्नत रूप है।इस योजना के तहत देश भर के लिए कुल 12,926.10 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। इस विशाल बजट का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा छत्तीसगढ़ के हिस्से आया है। योजना के तहत छत्तीसगढ़ राज्य में चयनित पात्र शासकीय विश्वविद्यालयों को मल्टी-डिसिप्लिनरी एजुकेशन एंड रिसर्च यूनिवर्सिटीज़ (MERU) के अंतर्गत प्रति संस्थान 20 करोड़ से लेकर 100 करोड़ रुपए तक का भारी-भरकम अनुदान मिल रहा है। वहीं, चिन्हित शासकीय महाविद्यालयों को बुनियादी ढांचे के सुदृढ़ीकरण (Grants to Strengthen Colleges) के लिए 5 करोड़ रुपए तक का प्रोजेक्ट-बेस्ड अनुदान स्वीकृत किया जा रहा है। इस वित्तीय भार का वहन केंद्र और राज्य सरकार द्वारा 60:40 के अनुपात (60% केंद्रांश और 40% राज्यांश) में किया जा रहा है।छत्तीसगढ़ में यह योजना केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर तेजी से प्रगति कर रही है। छत्तीसगढ़ शासन के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा केंद्र सरकार के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) निष्पादित किया जा चुका है। वर्तमान में, चयनित कॉलेजों द्वारा विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर पोर्टल पर अपलोड की जा रही है। इसके साथ ही, राज्य के शिक्षण संस्थानों में स्मार्ट क्लासरूम, आधुनिक लैब, और कंप्यूटर सेंटर जैसे अत्याधुनिक अधोसंरचना निर्माण का कार्य युद्धस्तर पर जारी है।PM-USHA योजना का सबसे खूबसूरत पहलू इसका समावेशी होना है। इस परियोजना का लाभ छत्तीसगढ़ के समस्त 33 जिलों को मिल रहा है। योजना के तहत विशेष रूप से राज्य के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों और दूरस्थ अंचलों जैसे बस्तर संभाग और सरगुजा संभाग,कम सकल नामांकन अनुपात (GER) वाले क्षेत्रों,आकांक्षी जिलों जैसे धमतरी, गरियाबंद, महासमुंद आदि के शासकीय कॉलेजों को प्राथमिकता के आधार पर शामिल किया गया है, ताकि विकास की दौड़ में पीछे छूटे क्षेत्रों को मुख्यधारा में लाया जा सके।इस दूरदर्शी परियोजना से राज्य के विभिन्न शासकीय शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत लगभग 5 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं सीधे लाभान्वित हो रहे हैं। इस योजना का सबसे बड़ा फायदा ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों, अनुसूचित जनजाति (ST), अनुसूचित जाति (SC) और महिला वर्ग के छात्र-छात्राओं को मिल रहा है। अब छत्तीसगढ़ के वनांचलों और दूरदराज के गांवों के युवाओं को भी वैश्विक स्तर की आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान की सुविधाएं अपने ही राज्य में सुलभ हो रही हैं, जो उनके सुनहरे भविष्य की मजबूत नींव रख रही हैं।
- -आलेख -श्री सी.पी. राधाकृष्णन,(लेखक भारत के उपराष्ट्रपति हैं)सदियों से, भारत की एक अनूठी पहचान रही है। उसकी यह पहचान ‘वसुधैव कुटुंबकम’ – यानी पूरी दुनिया को एक इकाई और सभी जीव-जंतुओं को एक मानने - की महान सोच में निहित रही है। भारत के इस आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित, योग एक ऐसी प्राचीन विद्या है जो शरीर, मन और आत्मा के बीच एक संतुलन स्थापित करती है। योग के मूल तत्वों में आसन (शारीरिक मुद्राएं), प्राणायाम (सांस लेने की तकनीकें) और ध्यान शामिल हैं। इन तत्वों का मेल शारीरिक स्वस्थता, मानसिक स्पष्टता और भावनात्मक संतुलन को बेहतर बनाता है।दिनांक 27 सितंबर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए, माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने दुनिया को रहने योग्य और स्थिर बनाने के उद्देश्य से लोगों की जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने कहा कि योग मन एवं शरीर, सोच एवं कर्म, संयम एवं संतुष्टि के बीच एकता, इंसान एवं प्रकृति के बीच सामंजस्य और सेहत एवं कल्याण से संबंधित एक समग्र दृष्टिकोण का संगम है। माननीय प्रधानमंत्री के आग्रह पर, 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित करने से संबंधित 174 से अधिक देशों के सम्मिलित प्रस्ताव को मंजूरी दी। वर्ष 2015 से, दुनिया भर में लाखों लोग सार्वजनिक जगहों पर इकट्ठा होकर एक साथ योग करते हैं और इस प्रकार हमारे प्राचीन ज्ञान को एक वैश्विक आंदोलन का रूप देते हैं।इस वर्ष 21 जून को प्रधानमंत्री श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी जहां कोलकाता में योग दिवस की अगुवाई करेंगे, वहीं मैं इस समारोह में भाग लेने के लिए लद्दाख में रहूंगा। व्यक्तिगत रूप से, पिछले कई वर्षों से मैंने भी योग एवं पंचकर्म के नियमित अभ्यास के लाभों को महसूस किया है। इन दोनों को अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी विधाएं (सिस्टर साइंसेज) कहा जाता है। इन्हीं बेहद समृद्ध करने वाले व्यक्तिगत अनुभवों ने मुझे योग और मानव कल्याण पर इसके गहरे प्रभाव के बारे में अपने विचार साझा करने के लिए प्रेरित किया है।योग: भारत की एक शाश्वत विरासतमाना जाता है कि शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कल्याण से संबंधित ‘योग’ के कालजयी अभ्यास की शुरुआत हमारी सभ्यता के उदय के साथ ही हुई थी। योग की परंपरा में भगवान शिव को जहां सबसे पहला योगी या ‘आदि योगी’ और सबसे पहला गुरु या ‘आदि गुरु’ माना जाता है, वहीं योग के सिद्धांतों को ‘योग सूत्र’ में व्यवस्थित रूप से संकलित के कारण महर्षि पतंजलि को ‘शास्त्रीय योग का जनक’ माना जाता है। महर्षि पतंजलि का तमिलनाडु के साथ गहरा आध्यात्मिक नाता है। ऐसा माना जाता है कि उनकी भौतिक जीव समाधि भी तिरुपत्तूर में स्थित है।हमारे श्रद्धेय ऋषियों और मुनियों ने दुनिया को योग का अमूल्य खजाना दिया। वर्षों के ध्यान, तपस्या और आध्यात्मिक साधना के बाद, इन ऋषियों और मुनियों ने एक ऐसी समग्र प्रणाली विकसित की जो शरीर, मन और आत्मा को जोड़ती है। श्री रामकृष्ण परमहंस ने योग के तीन महान मार्गों की व्याख्या की है- ज्ञान योग, जो बुद्धि एवं ज्ञान का मार्ग है; कर्म योग, जो निस्वार्थ सेवा एवं सही कर्म का मार्ग है; और भक्ति योग, जो शुद्ध प्रेम और भक्ति का मार्ग है। उन्होंने सिखाया कि ये तीनों मार्ग अंततः परम सत्य की अनुभूति में एकाकार हो जाते हैं।आज योग भौगोलिक, सांस्कृतिक और धार्मिक सीमाओं के बंधन से आगे निकल गया है। यह भारत के ऋषियों के शाश्वत ज्ञान और मानवता के कल्याण में उनके चिरस्थायी योगदान का जीवंत प्रमाण है।स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योगहर वर्ष हमारे देश में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पूरे उत्साह और एक सार्थक विषय के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष के विषय ‘स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग’ का खास महत्व है। स्वास्थ्य सेवा और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में हुई उल्लेखनीय प्रगति और मृत्यु दर में आई कमी के कारण दुनिया भर में लोगों की औसत आयु बढ़ी है। भारत भी आबादी में हो रहे इस बड़े बदलाव का साक्षी बन रहा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की ‘इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023’ के अनुसार, 2050 तक भारत में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से अधिक होगी।लंबी आयु के इस अनमोल उपहार का उत्सव मनाते हुए, समाज पर यह सुनिश्चित करने की एक महती जिम्मेदारी भी है कि जिंदगी में मिले इन अतिरिक्त वर्षों का मतलब केवल आयु में बढ़ोतरी ही न हो, बल्कि उन वर्षों में जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर हो। इसी संदर्भ में, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (आईडीवाई) 2026 का विषय – “स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग” - एक बहत ही सामयिक संदेश के रूप में सामने आया है।आबादी में आए इस बदलाव के कारण भारत में ‘सिल्वर इकॉनमी’ का विस्तार हुआ है, जो मुख्य रूप से स्वास्थ्य सेवा और वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों से जुड़े सामानों एवं सेवाओं पर केंद्रित है। उद्योग जगत के विशेषज्ञों का अनुमान है कि अभी इसका आकार लगभग 73,000 करोड़ रुपये का है। आने वाले वर्षों में इस सेक्टर के काफी बढ़ने की उम्मीद है।आज के दौर में आयु बढ़ने से जुड़ी हकीकतों ने इस तथ्य को उजागर किया है कि बुजुर्ग लोग कैसे विभिन्न प्रकार की मुश्किलों एवं कमजोरियों के जटिल जाल से जूझ रहे हैं। इस संदर्भ में, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी दुनिया भर में बुजुर्गों के बीच गैर-संचारी रोगों, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और सामाजिक अलगाव के बढ़ते बोझ को बार-बार रेखांकित किया है।मेरा भी यह मानना है कि आज वक्त की यह मांग है कि लोगों को कम आयु से ही योग से जोड़ा जाए। योग का अभ्यास जितनी जल्दी शुरू किया जाए, जीवन भर उसके उतने ही अधिक लाभ मिलते हैं। मुझे यह जानकर बेहद खुशी हुई है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में योग को स्वास्थ्य, कल्याण और मूल्यों पर आधारित शिक्षा के एक अहम हिस्से के तौर पर महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। युवाओं को योग से जोड़ने की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम है। इससे निश्चित रूप से विद्यार्थियों में अनुशासन, एकाग्रता, भावनात्मक संतुलन और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा मिलेगा।इस प्रकार, हम पाते हैं कि दुनिया भर में बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के बीच भारत दुनिया को सफलतापूर्वक आगे बढ़ने का एक अनूठा मॉडल प्रदान कर रहा है - एक ऐसा मॉडल जो प्राचीन सभ्यतागत ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के बीच सामंजस्यपूर्ण तालमेल बिठाता है - और वह है योग।योग - आज के दौर में बुढ़ापे से जुड़ी समस्याओं का समाधानआज, आधुनिक विज्ञान हमारे उन ऋषियों एवं योगियों की शाश्वत बातों की पुष्टि कर रहा है, जिन्होंने अनुशासित जीवन, योग और आध्यात्मिक साधना के जरिए असाधारण लंबी आयु, जीवन-शक्ति और मानसिक स्पष्टता हासिल की थी। हाल के वर्षों में योग के उपचारात्मक पहलुओं में अकादमिक और क्लिनिकल अभिरुचि तेजी से बढ़ी है।नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (एनआईएच) एवं हार्वर्ड मेडिकल स्कूल जैसे बड़े संस्थानों और ‘लैंसेट’ जैसी कई प्रतिष्ठित शोध-पत्रिकाओं ने अपने शोधों में इस तथ्य को दर्शाया है कि नियमित रूप से योग करने से बुजुर्गों में संतुलन, लचीलापन और चलने-फिरने की क्षमता सुरक्षित रूप से बेहतर होती है। इससे उनके गिरने का डर और जोखिम काफी कम हो जाता है। शोधों से यह भी पता चला है कि योग से हड्डियों की मजबूती (बोन डेंसिटी) बढ़ती है, गठिया का दर्द कम होता है, सांस लेने की क्षमता बेहतर होती है, रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) स्थिर रहता है और मानसिक सेहत अच्छी रहती है। साथ ही, ध्यान और सांस लेने के व्यायाम से बुजुर्गों की नींद की गुणवत्ता, कठिन परिस्थितियों का सामना करने की मानसिक क्षमता और सोचने-समझने की शक्ति (कॉग्निटिव फंक्शनिंग) में भी सुधार देखा गया है।लेकिन मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि योग की असली ताकत उसके समग्र स्वरूप में निहित है। शारीरिक सुधार से कहीं आगे बढ़कर, योग भावनात्मक संतुलन और सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देता है। मैंने देखा है कि आज बुजुर्गों के बीच अकेलेपन का बढ़ता अहसास एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। योग धीरे-धीरे इस अकेलेपन को सामूहिक जुड़ाव की भावना में बदल देता है। यह लोगों को “मैं-केंद्रित” सोच से हटाकर सहानुभूति, आपसी जुड़ाव एवं आंतरिक शांति पर आधारित “हम-केंद्रित” सोच की ओर ले जाता है।मेरे अपने अनुभव के अनुसार, अहम बात यह है कि ‘स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग’ में बहुत अधिक शारीरिक मेहनत की जरूरत नहीं होती। पारंपरिक योग क्रियाओं को काफी सोच-समझकर ऐसे सरल एवं सुलभ तरीकों में ढाला गया है जो बुजुर्गों के लिए उपयुक्त हैं। इनमें योगिक सूक्ष्म व्यायाम (जोड़ों की हल्की हरकतें), कुर्सी की मदद से किए जाने वाले आसन, सांस लेने की निर्देशित तकनीकें और ध्यान जैसी क्रियाएं शामिल हैं। ये सब बढ़ती आयु के शरीर पर बिना कोई दबाव डाले न्यूरोएंडोक्राइन प्रणाली और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं।साथ ही, योग उन देखभाल करने वालों और परिवार के सदस्यों के लिए भी हौसले एवं सहनशक्ति का स्रोत है, जो बुजुर्गों की देखभाल की भावनात्मक तथा शारीरिक जिम्मेदारियां उठाते हैं। इन व्यापक लाभों को देखते हुए, आयुष मंत्रालय ने “गैर-संचारी रोगों और लक्षित समूहों के लिए योग की 10 विधाओं” से जुड़ी एक अहम पहल शुरू की है। इसमें बुजुर्गों की सेहत के लिए खास तौर पर साक्ष्यों पर आधारित योग मॉड्यूल भी शामिल है। इसके अलावा, 100 दिनों का मुफ्त निर्देशित ऑनलाइन योग कार्यक्रम प्रदान करने वाले ‘योग 365’ पहल नाम के एक देशव्यापी अभियान को कुछ इस तरह से तैयार किया गया है ताकि योग सभी आयु के नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी का एक सहज एवं स्थायी साथी बन सके।दो हजार से भी अधिक वर्ष पहले, महान तमिल विद्वान एवं संत तिरुवल्लुवर ने ‘कुरल’ (949) के जरिए सेहत से संबंधित एक व्यक्ति-केंद्रित दृष्टिकोण की हिमायत की थी। उन्होंने कहा था, “उपचार शुरू करने से पहले मरीज की हालत, बीमारी की प्रकृति और उपयुक्त समय पर विचार करें।” यह शाश्वत समझ स्वस्थ बुढ़ापे के लिए योग के आधुनिक सिद्धांतों से मेल खाती है, जहां व्यक्ति की उम्र, सेहत और जरूरतों के हिसाब से अभ्यास को सावधानी से अपनाया जाता है ताकि लोग बुढ़ापे में भी अधिक स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानजनक जीवन जी पाएं।अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर मैं हर नागरिक, शिक्षण संस्थान, नागरिक समाज संगठन, स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े पेशेवर और समुदायों के नेता से आग्रह करता हूं कि वे योग को केवल कभी-कभार की जाने वाली कसरत के रूप में नहीं, बल्कि जीवन भर चलने वाली सांस्कृतिक एवं सेहत से जुड़ी एक आदत के तौर पर अपनाएं। किसी समाज की असल पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों का कितना ख्याल रखता है। इसलिए, आइए हम एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने की कोशिश करें जहां हमारे बुजुर्ग डर, निर्भरता या अकेलेपन के बीच नहीं, बल्कि सम्मान, जोश, सार्थक उद्देश्य और शांति के साथ जीवन जी सकें। योग को जीवन का एक लय बनाकर, हम सब मिलकर यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारे नागरिकों के जीवन के सुनहरे वर्ष सचमुच सेहत, सामंजस्य और संतुष्टि से भरे हों!
- -योग फॉर हेल्दी एजिंग: स्वस्थ और सक्रिय जीवन की दिशा में एक कदमविशेष लेख- डॉ. दानेश्वरी सम्भाकर , उप संचालक, जनसंपर्करायपुर। भारत में प्राचीन काल से ही योग हमारी जीवनशैली और संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। ऋषि-मुनियों, योगियों और संतों ने योग के माध्यम से स्वस्थ शरीर, शांत मन और आध्यात्मिक चेतना का मार्ग दिखाया। भारतीय ज्ञान परंपरा की यह अमूल्य धरोहर आज विश्वभर में स्वास्थ्य और कल्याण का पर्याय बन चुकी है। इसी विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की पहल पर वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की, जो आज विश्वव्यापी जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है।वर्ष 2026 के अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम “योग फॉर हेल्दी एजिंग” (स्वस्थ एवं सक्रिय वृद्धावस्था के लिए योग) रखी गई है। यह थीम योग के माध्यम से जीवन के प्रत्येक चरण में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का संदेश देती है। योग न केवल रोगों से बचाव का प्रभावी माध्यम है, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय जीवनशैली की आधारशिला भी है।प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में योग आज विश्व के करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका है। प्रधानमंत्री का मानना है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाली जीवन पद्धति है। योग व्यक्ति को स्वस्थ बनाकर परिवार समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने का माध्यम बनता है इस वर्ष राष्ट्रीय स्तर का मुख्य आयोजन कोलकाता में आयोजित किया जा रहा है जहां प्रधानमंत्री स्वयं योगाभ्यास का नेतृत्व करेंगे।छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का राज्य स्तरीय मुख्य समारोह अंबिकापुर में आयोजित किया जा रहा है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय स्वयं योगाभ्यास में सहभागिता करेंगे और प्रदेशवासियों को नियमित योग अपनाकर स्वस्थ जीवनशैली अपनाने का संदेश देंगे। राज्य सरकार द्वारा योग को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विभिन्न विभागों, शैक्षणिक संस्थानों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों के सहयोग से व्यापक स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।मुख्यमंत्री श्री साय का मानना है कि स्वस्थ नागरिक ही विकसित छत्तीसगढ़ और विकसित भारत के निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति हैं। योग शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है। यही कारण है कि राज्य सरकार स्वास्थ्य संवर्धन और जनजागरूकता अभियानों में योग को विशेष महत्व दे रही है।प्राकृतिक संसाधनों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में योग का संदेश लोगों के जीवन से सहज रूप से जुड़ता है। प्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली योग के मूल सिद्धांतों को प्रतिबिंबित करती है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, आंगनबाड़ी केंद्रों और शासकीय संस्थानों में नियमित योग गतिविधियों के माध्यम से स्वस्थ समाज निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं।वर्तमान समय में बढ़ते तनाव, अनियमित जीवनशैली और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के बीच योग एक सरल, सुलभ और प्रभावी समाधान के रूप में उभरा है। नियमित योगाभ्यास शरीर को निरोग, मन को शांत और जीवन को संतुलित बनाता है। यह व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करता है।अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि योग को केवल एक दिवस का आयोजन न मानकर दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए योग को अपनाना समय की आवश्यकता है। आइए, योग के माध्यम से स्वस्थ छत्तीसगढ़, विकसित भारत और समृद्ध विश्व के निर्माण में अपना योगदान दें।
- -आपकी रगों में बहता हुआ खून किसी के बुझते हुए घर के चिराग को दोबारा रोशन कर सकता है-जीवन का उपहार: रक्तदानआलेख -धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, जनसंपर्क"रक्तदान महादान" — यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि मानवता की सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब आप रक्तदान करते हैं, तो आप केवल खून की कुछ बूंदें नहीं दे रहे होते, बल्कि किसी को मुस्कुराने का, जीने का और अपने परिवार के साथ रहने का एक और मौका दे रहे होते हैं। हर साल 14 जून को पूरी दुनिया में 'विश्व रक्तदान दिवस' मनाया जाता है। आपकी रगों में बहता हुआ खून किसी के बुझते हुए घर के चिराग को दोबारा रोशन कर सकता है। इस बार सिर्फ स्टेटस न लगाएं, आगे आएं और रक्तदान करें!दुनिया में कई तरह के दान किए जाते हैं— अन्नदान, वस्त्रदान, धनदान और विद्यादान। ये सभी दान सम्मानीय हैं, लेकिन रक्तदान इन सबसे ऊपर है। इसका कारण यह है कि बाकी सभी दान व्यक्ति की सुख-सुविधाओं को पूरा करते हैं, जबकि रक्तदान किसी मरते हुए व्यक्ति को जीवनदान देता है। जब कोई व्यक्ति दुर्घटना का शिकार होता है, किसी बड़ी सर्जरी से गुजरता है, या थैलेसीमिया और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहा होता है, तब उसके पास जिंदगी और मौत के बीच बहुत कम समय होता है। उस वक्त आपकी दी हुई खून की एक यूनिट (लगभग 350-450 मिलीलीटर) किसी का बुझता हुआ घर का चिराग दोबारा रोशन कर सकती है।अत्याधुनिक युग में भी, विज्ञान आज तक प्रयोगशाला में कृत्रिम खून (Artificial Blood) नहीं बना पाया है। इसका सीधा और कड़वा सच यह है कि किसी इंसान की रगों में बहता खून ही किसी दूसरे इंसान की जान बचा सकता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति और समाज में रक्तदान को 'महादान' का दर्जा दिया गया है।जब आप एक बार रक्तदान करते हैं, तो आप केवल एक नहीं, बल्कि तीन लोगों की जान बचा सकते हैं।ब्लड बैंक में आपके द्वारा दिए गए रक्त को तीन मुख्य घटकों (Components) में अलग किया जाता है:1. लाल रक्त कणिकाएं (Red Blood Cells - RBC): एनीमिया या अत्यधिक खून बह जाने पर काम आती हैं।2. प्लाज्मा (Plasma): जलने के मामलों या लीवर की गंभीर बीमारियों में उपयोग होता है।3. प्लेटलेट्स (Platelets): डेंगू, कैंसर या कीमोथेरेपी के मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित होती हैं।रक्तदान का लाभ:-रक्तदान करने से शरीर हार्ट अटैक का खतरा कम: रक्तदान करने से शरीर में आयरन की मात्रा संतुलित रहती है, जिससे खून का थक्का जमने की संभावना कम होती है और दिल का दौरा पड़ने का खतरा काफी घट जाता है। कैंसर से बचाव: शरीर में आयरन का स्तर नियंत्रित रहने से कुछ प्रकार के कैंसर (जैसे लीवर, फेफड़े और कोलन कैंसर) का जोखिम कम होता है।नई ऊर्जा का संचार: रक्तदान के बाद शरीर 48 घंटों के भीतर तरल पदार्थ की कमी पूरी कर लेता है और अगले कुछ हफ्तों में नई रक्त कोशिकाएं (New Blood Cells) बनाता है, जिससे शरीर में स्फूर्ति आती है।फ्री मिनी-हेल्थ चेकअप: रक्तदान से पहले डोनर के हीमोग्लोबिन, ब्लड प्रेशर, पल्स और वजन की जांच की जाती है। साथ ही रक्त की HIV, हेपेटाइटिस बी और सी, तथा मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों के लिए मुफ्त जांच होती है।रक्तदान क्यों है बेहद ज़रूरी?चिकित्सा विज्ञान ने आज आसमान छू लिया है, हम कृत्रिम अंग बना सकते हैं, जटिल से जटिल सर्जरी कर सकते हैं, लेकिन आज तक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में कृत्रिम खून (Artificial Blood) नहीं बना पाए हैं। इसका मतलब साफ है कि इंसान की जान बचाने के लिए केवल इंसान का खून ही काम आ सकता है।इन परिस्थितियों में होती है रक्त की सबसे ज्यादा जरूरत:• दुर्घटनाएं और इमरजेंसी: सड़क हादसों या अन्य दुर्घटनाओं में अत्यधिक खून बह जाने पर।• गंभीर बीमारियाँ: थैलेसीमिया, कैंसर, और हीमोफिलिया जैसी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को नियमित रूप से खून की जरूरत होती है।• प्रसव के दौरान: कई बार डिलीवरी के वक्त महिलाओं को अत्यधिक रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage) के कारण खून चढ़ाना पड़ता है।• बड़ी सर्जरी: दिल का ऑपरेशन, ऑर्गन ट्रांसप्लांट आदि में।"अगर आप किसी के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहते हैं, तो पहले अपनी बाहें आगे बढ़ाएं।"रक्तदान केवल एक सामाजिक या नैतिक कर्तव्य नहीं है, यह विशुद्ध रूप से मानवता का उत्सव है। धर्म, जाति, रंग और ऊंच-नीच की दीवारों को तोड़कर जब एक इंसान का खून दूसरे इंसान की रगों में दौड़ता है, तो वही सच्ची इंसानियत होती है। आइए, इस महादान का हिस्सा बनें। स्वयं भी रक्तदान करें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। याद रखें, आपका थोड़ा सा रक्त किसी के लिए पूरा जीवन बन सकता है।
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विशेष लेख- कमलेश साहू, सहायक संचालक जनसंपर्क
रोज सुबह उठते ही घर में नल से साफ पानी आते देखने की खुशी क्या होती है, इसे कमली से पूछिए। उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव को अपने आंगन में लगे नल से आ रहे पानी की धार को दिखाते खुशी से उनकी आंखें डबडबा गईं। जल जीवन मिशन ने कमली जैसी हजारों महिलाओं को अमूल्य खुशियां दी हैं। कभी पीने और निस्तारी के पानी के लिए दिनभर चिंतित रहने वाली इन महिलाओं का जीवन घर में लगे नल ने बदल दिया है। उप मुख्यमंत्री तथा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री श्री अरुण साव अपने चार दिनों के बस्तर प्रवास के दौरान जल जीवन मिशन का काम देखने कमली के भी गांव पहुंचे। कमली के गांव बस्तर जिले के तोकापाल विकासखण्ड के दुगनपाल में उन्होंने कुछ और घरों में भी जाकर नल से पानी आते देखा। जल जीवन मिशन से घर में पानी पहुंचने की खुशी सभी महिलाओं के चेहरे पर दिख रही थी।जल जीवन मिशन दूरस्थ गांवों और वनांचलों की महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव ला रहा है। आधी आबादी के एक बड़े हिस्से को पीने के पानी के लिए रोज जूझना पड़ता था। खासतौर से गर्मियों के दिनों में जब हर साल सिर पर पानी के बर्तन का सफर कुछ सौ मीटरों से कुछ किलोमीटरों में बदल जाता था। जीवन के लिए अनिवार्य जरुरत पानी की व्यवस्था गर्मियों में महिलाओं का जीवन दुष्कर बना देती थी। दुगनपाल में भी महिलाओं को रोज गांव के हैंडपंप या कुआं पर जाकर घर के सभी लोगों के लिए पानी का इंतजाम करना पड़ता था। घर में नल लग जाने से अब इस समस्या से निजात मिल गई है। जल जीवन मिशन के काम जैसे-जैसे पूरे होते जा रहे हैं, महिलाओं की बाहर से पानी लाने की चिंता और तकलीफ दूर होते जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में अब तक साढ़े आठ हजार से अधिक योजनाओं को पूर्ण कर संचालन के लिए पंचायतों को सौंपा जा चुका है। जल जीवन मिशन महज हर घर तक पेयजल पहुंचाने की योजना नहीं है। यह महिलाओं की दिनचर्या और जीवन में भी बड़ा बदलाव ला रहा है। गांवों में परंपरागत रूप से घर में पेयजल और अन्य जरूरतों के लिए पानी के इंतजाम का जिम्मा महिलाओं पर ही है। घर तक पानी की पहुंच न होने के कारण उन्हें हैंडपंपो, सार्वजनिक नलों, कुंओं या अन्य स्रोतों से रोज पूरे परिवार के लिए जल संग्रहण करना पड़ता है।रोजाना का यह श्रमसाध्य और समयसाध्य काम बारिश तथा भीषण गर्मी के दिनों में और कठिन हो जाता है। कई इलाकों में गर्मियों में जलस्रोतों के सूख जाने के कारण दूर-दूर से पानी लाने की मजबूरी रहती है। परिवार के लिए पानी की व्यवस्था हर दिन का संघर्ष बन जाता है। महिलाओं के दिन के कई घंटे इसी काम में निकल जाते हैं। जल जीवन मिशन हर घर तक नल से जल पहुंचाने के साथ ही महिलाओं को कई समस्याओं से निजात दिला रहा है। घर तक स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल पहुंचने से वे कई चिंताओं से मुक्त हो गई हैं। अब रोज-रोज पानी के लिए बहुत सारा श्रम और समय नहीं लगाना पड़ता। इससे उन्हें घर के दूसरे कामों, बच्चों की परवरिश, खेती-बाड़ी एवं आजीविका के अन्य कार्यों के लिए अधिक समय मिल रहा है और वे इन कार्यों पर अपना ज्यादा ध्यान व समय दे पा रही हैं।जल जीवन मिशन से बारहों महीने घर पर ही जलापूर्ति से लगातार बारिश तथा गर्मी के दिनों में बाहर से पानी लाने की मुसीबत दूर हो गई है। गर्मियों में जलस्तर के नीचे चले जाने से तथा बरसात में लगातार बारिश से जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। गुणवत्ताहीन पेयजल से पेट तथा निस्तारी के लिए खराब जल के उपयोग से त्वचा संबंधी रोगों का खतरा रहता है। जल जीवन मिशन ने सेहत के इन खतरों को भी दूर कर दिया है। - --स्वरचित - डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)जागो हे भारत की बेटियों ,आत्म विश्वास का वरण करो ।दबना नहीं डरना किसी से ,लज्जा ,संकोच का हरण करो ।कमजोर बनाते जो तुमको ,रूढ़ियों से मुक्त बंधन करो ।बुरी नजर जो डाले तुम पर ,दुष्ट दानवों का दमन करो ।कुचल डालो विषधर का फन ,अत्याचारियों का शमन करो ।उड़ो हौसलों के पर लेकर ,लक्ष्य को विस्तृत गगन करो ।शिक्षा की उजास जीवन में ,भर लो साहस को नमन करो ।धैर्य शक्ति की मिसाल बनना ,सरस्वती सा आचरण करो ।रौद्र रूप काली का धरकर ,अन्यायी का संहरण करो ।ज्ञान - विज्ञान की वेदी पर ,अज्ञानता का हवन करो ।अपने अधिकारों की खातिर ,जुल्मों से युद्ध आमरण करो ।
- -डिजिटल क्रांति से बदल रही है राजस्व न्याय व्यवस्थाविशेष लेख - विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालकभारत तेजी से डिजिटल प्रशासन की ओर बढ़ रहा है और इसी दिशा में छत्तीसगढ़ ने राजस्व प्रशासन को आधुनिक, पारदर्शी और आमजन के लिए सहज बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की है। राज्य सरकार द्वारा लागू की गई “राजस्व ई-कोर्ट परियोजना” अब केवल एक तकनीकी व्यवस्था नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रामीण और शहरी नागरिकों के लिए न्याय प्राप्ति की प्रक्रिया को सरल, त्वरित और भरोसेमंद बनाने वाला प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है।वर्षों तक राजस्व मामलों में आम लोगों को तहसील, एसडीएम कार्यालय और कलेक्टर कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे। नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, फौती प्रकरण, खाता सुधार या भूमि विवाद जैसे मामलों में पेशी की तारीख जानने, आदेश की प्रति लेने या केस की स्थिति समझने में समय, धन और ऊर्जा तीनों की भारी खपत होती थी। कई बार बिचौलियों और भ्रष्टाचार का सामना भी करना पड़ता था। लेकिन अब वही पूरी प्रक्रिया डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आ चुकी है। छत्तीसगढ़ की ई-कोर्ट परियोजना ने राजस्व न्यायालयों की पारंपरिक कार्यप्रणाली को बदलकर उसे “पेपरलेस”, “स्मार्ट” और “जनकेंद्रित” बना दिया है। नायब तहसीलदार से लेकर कलेक्टर और राजस्व मंडल तक की न्यायिक प्रक्रिया अब ऑनलाइन संचालित हो रही है। इससे न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि आम नागरिकों का भरोसा भी मजबूत हुआ है।ई-कोर्ट व्यवस्था एक प्रभावी समाधान-मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव सायमुख्यमंत्री ने राजस्व ई-कोर्ट परियोजना को सुशासन और डिजिटल प्रशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा है कि राज्य सरकार का उद्देश्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और जनता के लिए सुलभ बनाना है। उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसका सीधा लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।राजस्व मामलों में वर्षों से चली आ रही जटिलताओं को समाप्त करने के लिए ई-कोर्ट व्यवस्था एक प्रभावी समाधान बनकर सामने आई है। अब नागरिकों को छोटी-छोटी जानकारियों के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। सरकार न्याय प्रक्रिया को लोगों के मोबाइल तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ने से भ्रष्टाचार और बिचौलियों की भूमिका स्वतः समाप्त होगी तथा आम लोगों का शासन-प्रशासन पर विश्वास और मजबूत होगा। मुख्यमंत्री के अनुसार, “ई-गवर्नेंस केवल तकनीक नहीं, बल्कि जनता को सम्मानपूर्वक और समयबद्ध सेवाएं देने का माध्यम है।पारदर्शिता और जवाबदेही की नई व्यवस्थाई-कोर्ट प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आवेदन प्राप्त होते ही उसका ऑनलाइन पंजीकरण किया जाता है और तत्काल डिजिटल पावती जारी होती है। इससे आवेदक को यह भरोसा मिल जाता है कि उसका आवेदन रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है और अब उसे किसी कर्मचारी या दलाल के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा।इसके बाद की पूरी प्रक्रिया—जैसे नोटिस जारी करना, इश्तहार प्रकाशित करना, पक्षकारों को सूचना भेजना, सुनवाई की तारीख तय करना और अंतिम आदेश पारित करना सभी ऑनलाइन दर्ज होते हैं।प्रत्येक कार्रवाई डिजिटल रिकॉर्ड में सुरक्षित रहती है, जिससे किसी भी स्तर पर हेरफेर की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।ई-कोर्ट पोर्टल के माध्यम से नागरिक अपने मोबाइल या कंप्यूटर से घर बैठे यह देख सकते हैं कि उनके मामले में पिछली तारीख पर क्या कार्यवाही हुई, अगली पेशी कब है और आदेश जारी हुआ है या नहीं। इससे न्यायालयों के बाहर लगने वाली भीड़ और अनावश्यक भागदौड़ में उल्लेखनीय कमी आई है।किसानों और ग्रामीण नागरिकों के लिए बड़ी राहतराजस्व मामलों का सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों और भू-स्वामियों पर पड़ता है। पहले किसानों को एक छोटी सी जानकारी के लिए भी पूरे दिन का समय निकालकर तहसील मुख्यालय जाना पड़ता था। कई बार केवल अगली तारीख जानने में ही मजदूरी और किराए का नुकसान हो जाता था।अब ई-कोर्ट व्यवस्था ने यह परेशानी काफी हद तक समाप्त कर दी है। किसान अपने गांव के लोक सेवा केंद्र, चॉइस सेंटर या मोबाइल फोन के माध्यम से ही अपने प्रकरण की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे समय और धन दोनों की बचत हो रही है तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती मिल रही है।डिजिटल न्याय व्यवस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन के प्रति विश्वास को भी बढ़ाया है। जब लोगों को अपने आवेदन की ऑनलाइन पावती और हर कार्रवाई की जानकारी समय पर मिलने लगती है, तो पारदर्शिता स्वतः स्थापित होती है।विवादित जमीनों की जानकारी अब सार्वजनिकई-कोर्ट परियोजना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि विचाराधीन भूमि विवादों की जानकारी अब ऑनलाइन उपलब्ध रहती है। इससे जमीन खरीदने वाले लोग पहले ही जांच कर सकते हैं कि संबंधित खसरा नंबर पर कोई विवाद या न्यायालयीन प्रकरण लंबित तो नहीं है । यह व्यवस्था फर्जीवाड़े, अवैध बिक्री और धोखाधड़ी रोकने में अत्यंत प्रभावी साबित हो रही है। पहले कई लोग विवादित भूमि खरीदकर वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर काटते रहते थे, लेकिन अब पारदर्शी ऑनलाइन रिकॉर्ड के कारण ऐसी घटनाओं में कमी आई है।तकनीक के सहारे मजबूत हुआ प्रशासनराजस्व ई-कोर्ट प्रणाली के सफल संचालन के लिए प्रदेश के राजस्व न्यायालयों में कंप्यूटर, डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली और हाई-स्पीड इंटरनेट की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। इससे न्यायालयों के कार्य निष्पादन की गति बढ़ी है और अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हुई है। डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित सर्वर में संग्रहीत होने से अब फाइलों के गुम होने, फटने या रिकॉर्ड में छेड़छाड़ जैसी समस्याएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। प्रशासनिक निगरानी भी आसान हुई है क्योंकि उच्च अधिकारी किसी भी न्यायालय की कार्यवाही ऑनलाइन मॉनिटर कर सकते हैं।“मोबाइल में कोर्ट” की दिशा में बड़ा कदमछत्तीसगढ़ की यह पहल वास्तव में “मोबाइल में कोर्ट” की अवधारणा को साकार करती दिखाई देती है। अब नागरिकों को केवल जानकारी लेने के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। आदेश की कॉपी डाउनलोड करने से लेकर केस की स्थिति जानने तक अधिकांश सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं।ई-कोर्ट व्यवस्था ने यह साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और तकनीक का सही समन्वय हो, तो शासन को वास्तव में जनसुलभ बनाया जा सकता है। यह पहल “ई-गवर्नेंस” को “स्मार्ट गवर्नेंस” में बदलने का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरी है।सुशासन की दिशा में प्रभावी पहलछत्तीसगढ़ सरकार की राजस्व ई-कोर्ट परियोजना केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि आम जनता को न्याय व्यवस्था से सीधे जोड़ने का अभिनव प्रयास है। इसने प्रशासन और नागरिकों के बीच की दूरी कम की है तथा न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, त्वरित और भरोसेमंद बनाया है।डिजिटल इंडिया के इस दौर में छत्तीसगढ़ की यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है। यह परियोजना दर्शाती है कि तकनीक का उपयोग केवल सुविधाएं बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि शासन को अधिक उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए भी किया जा सकता है। राजस्व न्यायालयों की यह डिजिटल यात्रा वास्तव में “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़” के सपने को मजबूत आधार प्रदान कर रही है।जहां न्याय, पारदर्शिता और सुविधा अब लोगों की उंगलियों पर उपलब्ध है।
- 2 जून पुण्यतिथि पर विशेषआलेख- प्रशांत शर्माभारतीय सिनेमा जगत के शो मैन कहे जाने वाले राजकपूर ने आज से 38 साल पहले इस दुनिया को अलविदा कहा था। 2 मई, 1988 को नई दिल्ली में वे दादासाहेब फाल्के पुरस्कार लेने के लिए समारोह में पहुंचे थे, इसी दौरान उन्हें अस्थमा का तीव्र दौरा पड़ा और वे गिर पड़े। एक महीने बाद 2 जून 1988 को उनके निधन की मनहूस खबर आई।राज कपूर अपनी निडर फिल्म निर्माण शैली और विवादास्पद या संवेदनशील विषयों को उठाने के लिए जाने जाते थे। उनके फिल्म निर्माण करिअर के शुरुआती दौर की उनकी अधिकांश क्लासिक फिल्में सामाजिक नाटक थीं जो आम आदमी या समाज के कमजोर वर्ग की जीत का जश्न मनाती थीं। इनमें से कई फिल्में अपने कथानक के कारण समय से आगे की मानी जाती हैं। श्री 420 फिल्म के एक गाने के बोल —और उसमें नायक और नायिका के छाते के नीचे शरण लेने का दृश्य—कपूर की फिल्मों की प्रगतिशील प्रकृति का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।राजकपूर की निजी जिंदगीे से बात करें, तो पांच बच्चों का उनका परिवार आज काफी बड़ा हो चुका है। पत्नी कृष्णा से उनकी पांच संतानें हुर्ई। उनके परिवार में बेटियों रितु नंदा और रीमा जैन के अलावा तीन बेटेें रणधीर, ऋषि और राजीव कपूर हुए। तीनों बेटों ने अभिनय जगत को अपनाया। रणधीर ने अभिनेत्री बबीता से शादी की। आज रणधीर 78 साल के हो चुके हैं, लेकिन बरसों से वे बबीता से अलग रह रहे हैं। रणधीर की दोनों बेटियों करिश्मा और करीना ने भी अभिनय जगत में खूब नाम कमाया। करिश्मा ने अभिषेक बच्चन से सगाई टूटने के बाद बिजनेसमैन संजय कपूर (अब दिवंगत) से शादी की , लेकिन यह शादी लंबी नहीं चली और उनका तलाक हो गया। संजय से करिश्मा को दो बच्चे हैं- बेटी समायरा कपूर और कियान राज कपूर। वहीं करीना अभिनेता सैफ अली खान से निकाह किया। उनके भी दो बेटे हैं-तैमूर अली खान और जेह अली खान।राजकपूर के दूसरे बेटे ऋषि कपूर को अभिनय जगत में लोकप्रियता हासिल हुई। ऋषि ने अपनी को -स्टार नीतू सिंह से विवाह किया। ऋषि कैंसर से पीडि़त थे और वर्ष 2000 में 67 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। ऋषि कपूर और नीतू कपूर की लाडली बेटी रिद्धिमा ने इसी साल 45 साल की उम्र में अभिनय जगत में कदम रखा। उन्होंने अपनी मां के साथ फिल्म दादी की शादी में अहम किरदार निभाया। लोगों को उनका काम भी पसंद आया। रिद्धिमा पेशे से एक ज्वेलरी डिजाइनर हैं और उन्होंने बिजनेसमैन भरत साहनी से विवाह किया है। उनकी एक बेटी है समारा। ऋषि के बेटे रणबीर कपूर ने फिल्म जगत में अच्छी- खासी सफलता अर्जित की है। उन्होंने अभिनेत्री आलिया भट्ट से विवाह किया है और उनकी एक बेटी का नाम है-राहा।वहीं तीसरे और सबसे छोटे बेटे राजीव कपूर अपने अभिनय कॅरिअर में सफल नहीं हो पाए और गुमनामी में खो गए। वर्ष 2001 में, उन्होंने आर्किटेक्ट आरती सभरवाल से शादी की, जो कनाडा के वॉन में एक लॉ फर्म में पैरालीगल के रूप में काम कर रही थीं। 2003 में उनका तलाक हो गया। फिर वे भाई रणबीर के साथ रहने लगे। 2021 को उनका दिल का दौरा पडऩे के कारण 58 साल की उम्र में निधन हो गया।राजकपूर की बड़ी बेटी रितु नंदा एक एंटरप्रेन्योर थीं। उनकी शादी एस्कॉट्र्स लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर राजन नंदा से हुई थी। राजकपूर को घर की बेटियों का फिल्मों में काम करना पसंद नहीं था। इसलिए रितु ने बिजनेस में किस्मत आजमाया। अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता बच्चन की शादी रितु के बेटे निखिल से हुई है। उनके दो बच्चे अगस्त्य नंदा और नव्या नवेली नंदा हैं, जो आज काफी लोकप्रिय हैं। रितु लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन से जुड़ी हुई थीं। बेहद टैलेंटेड रितु के नाम एक दिन में 17 हजार पेंशन पॉलिसी बेचने का भी रिकॉर्ड है, जो गिनीज बुक रिकॉर्ड में भी दर्ज है। रितु को कैंसर था और 71 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।रही बात रीमा की तो राजकपूर उनकी शादी अभिनेता कुमार गौरव से करना चाहते थे। कुमार गौरव के पिता राजेन्द्र कुमार और राजकपूर अच्छे दोस्त थे। सगाई भी हो गई थी, लेकिन एक दिन कुमार गौरव ने यह सगाई तोड़ दी और सुनील दत्त- नरगिस की बेटी नम्रता से शादी कर ली। बाद में रीमा की शादी बिजनेसमैन मनोज जैन से हुई और उनके दो बेटे हैं- अरमान और आदर जैन। अरमान ने कुछ फिल्में की हैं, पर अब तक सफल नहीं हो पाए हैं। रीमा 73 साल की हो चुकी हैं, लेकिन आज भी उनकी खूबसूरती और उनका स्टाइलिश लुक लोगों को आकर्षित करता है।हाल में पूरा परिवार उस वक्त साथ नजर आया, जब वे राजकपूर की जन्म शताब्दी पर होने वाले समारोह का निमंत्रण देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने पहुंचे। पूरे परिवार ने प्रधानमंत्री के साथ फोटो क्लिक की। सोशल मीडिया यह काफी वायरल भी हुआ।
- -विष्णुपद छंद गीत-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)राही जीवन-पथ के सुन ले,राह नई गढ़ना ।फूल मिले या शूल तुम्हें नित ,आगे ही बढ़ना ।यत्न सतत कर लक्ष्य-प्राप्ति हो,तब तक तुम चलना ।करनी होगी कठिन साधना ,साधक तुम बनना ।अपने कदम जमा धरती पर ,ऊपर तुम चढ़ना ।।सिक्के के दोनों पहलू कोदेखो और कहो ।सुख-दुख जीवन की सच्चाई ,जीवन सार गहो ।अंतस् के कोरे कागज पर ,फूल खुशी कढ़ना ।।सत्य-झूठ की धूप-छाँव में ,सही राह चुनना ।दुविधा में जब मन डोले तो,मन की तुम सुनना ।ढाई आखर की पोथी को ,सीखो तुम पढ़ना ।।
- हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेषआलेख- डॉ. कमलेश गोगिया ( वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद)सिटी ऑफ जॉय यानी कोलकाता जिसे पूर्व में कलकत्ता (औपनिवेशिक) और कालिकता कहा जाता था, की संस्कृति में टोला, तल्ला और लेन सामाजिक पहचान की नींव है। टोला शब्द किसी खास समुदाय या पेशे की बस्ती को दर्शाता है जबकि लेन का आशय तंग गलियों और तल्ला का अर्थ छायादार वृक्ष के नीचे के स्थान से है। कोलकाता का कालू टोला मोहल्ला, 37 अमरतल्ला लेन, वही ऐतिहासिक स्थान है जहाँ से देश में हिन्दी पत्रकारिता की नींव पड़ी। 30 मई, 1826 को पं. जुगल किशोर शुक्ल ने हिन्दी के प्रथम समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड की शुरुआत की थी। यह वह दौर था जब भारत स्वतंत्र नहीं था और अंग्रेजी, उर्दू, बंगाली तथा फारसी भाषा के समाचार पत्र प्रकाशित हुआ करते थे, उस दौर में हिन्दी भाषा का सामाचार पत्र प्रकाशित करने के साहस के लिए शब्द नहीं मिलते। उदन्त मार्तण्ड जिसका अर्थ उगता हुआ सूर्य होता है, डेढ़ साल तक ही प्रकाशित हो सका। आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हुए यह पत्र दिसंबर 1827 को बंद हो गया। कारण, अंग्रेजी शासन की नीतियाँ और आर्थिक कठिनाइयाँ, फिर हिन्दी के दम पर सरकार से टकराना उस दौर में तो और भी कठिन था। हिन्दी पत्रकारिता रूकी नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल में ही देश के विभिन्न क्षेत्रों से हिन्दी के अनेक समाचार पत्र दैनिक, साप्ताहिक और मासिक स्वरूप में प्रकाशित होने लगे। चाहें राजा राममोहन राय के बंगदूत की बात कर लें या फिर आधुनिक हिन्दी पत्रकारिता के जनक भारतेंदू हरिशंचद्र के कवि वचन सुधा, हरिशंद्र मैग्जीन और हिन्दी के प्रथम दैनिक समाचार सुधावर्षण की। देश के लिए मर-मिटने के जुनून के साथ पत्रकारिता स्वतंत्रता संग्राम का अहम हथियार थी। आजादी के बाद पत्रकारिता मिशन से व्यवसाय बन गई। फिर तकनीकी क्रांति और डिजिडलीकरण ने हिन्दी पत्रकारिता को पूरी तरह बदल कर रख दिया। समय के साथ-साथ सब कुछ बदल गया। अब तो उदन्त मार्तण्ड का कोई निशां भी बाकी नहीं रहा, जैसा कि लगभग पाँच वर्ष पूर्व राजीव कुमार झा की जागरण की रिपोर्ट से पता चलता है। रिपोर्ट के अऩुसार, “अमरतल्ला लेन आज भी मौजूद हैं, पर 37 नंबर मकान नहीं है। अमरतल्ला लेन एक से शुरू होकर 27 पर खत्म हो जाता है। वहीं, इसी से सटा अमरतल्ला स्ट्रीट एक से शुरू होकर 29 नंबर पर समाप्त हो जाता है। 37 नंबर अमरतल्ला लेन जिस जगह से यह अखबार शुरू हुआ था उस मकान के बारे में वर्तमान समय में रहने वाले वाले लोगों को भी पता नहीं है। इसी लेन व स्ट्रीट में 40-50 सालों से रहने वाले बिहार-उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी लोगों को भी नहीं पता है कि कभी इस स्थान से हिंदी का पहला अखबार प्रकाशित हुआ था।“ कोशिश होनी चाहिए थी हिन्दी पत्रकारिता की स्थापना के इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित कर हिन्दी पत्रकारिता दिवस को हर साल भव्य रूप प्रदान करने की।परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है, लेकिन जो परिवर्तन हिन्दी पत्रकारिता में देखने को मिलता है, उसकी अपेक्षा शायद ही कभी की गई होगी। प्रिंटिंग प्रेस और टाइपराइटर से शुरू हुई हिन्दी पत्रकारिता आज वेब पोर्टल्स, यू ट्यूब और सोशल मीडिया तक पहुँच गई है। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म ने हर नागरिक को पत्रकार बना दिया। बाजारवाद और पूंजीकरण के फलस्वरूप मिशन उद्योग बन गया। पत्रकारिता की गंभीरता भी नदारद होती चली गई। भाषा और शैली भी पूरी तरह परिवर्तित हो गई। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि हिन्दी पत्राकरिता से हिन्दी मिसिंग है, हिंग्लिश ऑन एयर है। हिन्दी के समाचार पत्र हों या न्यूज चैनल अथवा पोर्टल, हिन्दी और अंग्रेजी के मिश्रण का तड़का अनिवार्य है। दीक्षांत समारोह जैसे शब्द की जह कन्वोकेशन ने ले ली है तो न्यूज रूम में एंकर को परिस्थिति की जगह सिचुएशन बोलना ज्यादा सरल लगता है। किसी कार्पोरेट कंपनी के मिनिट्स की तरह खबरों की हेडलाइन देखी जा सकती है। जैसे हेडलाइन देखिए —“सीएम का मास्टरस्ट्रोक!”“ऑपरेशन क्लीनअप ऑन!”“पॉलिटिकल टेम्परेचर हाई!”“इश्यू का डीप एनालिसिस”हालांकि इसका सकारात्मक पहलू यह है कि हिन्दी के समाचार पत्र हिन्दी भाषा को बोलचाल के अधिक करीब लाने के उद्देश्य से हिन्दी व्याकरण के साथ अंग्रेजी शब्दों को जोड़कर वाक्यों का निर्माण करते हैं जिससे क्लिष्टता कम हो जाए। फिर डिजिटल युग में सोशल मीडिया और सॉफ्टवेयर से जुड़ी खबरें छपने के कारण अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अनिवार्य सा हो गया है। जैसे, हैशटैग, ट्रोल, डाउनलोड, ड्रापडाउन, अपडेट आदि। लेकिन प्रायः क्लिष्टता को कम करने का उद्देश्य अपना मार्ग भटक जाता है। अनेक अवसरों पर जानबूझकर हेडलाइन के साथ पूरे समाचार में हिंग्लिश का प्रयोग किया जाता है, विशेष रूप से पेज-थ्री पत्रकारिता के पुलआउट पृष्ठों में। घोटाले की जगह स्कैम लिखना ज्यादा गौरवपूर्ण समझा जाता है। हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष अंग्रेजी का प्रभाव और वर्चस्व किसी चुनौती से कम नहीं। बावजूद इसके हिन्दी के डिजिटल पाठकों की संख्या में निरंतर विस्तार हो रहा है क्योंकि दूरस्थ इलाकों में बसे लोगों तक इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुँच बढ़ गई है। हिन्दी पत्राकारिता की समृद्धि में अहम योगदान ग्रामीण पत्रकारों का है। ग्रामीण पत्रकार मुद्दे को इश्यू नहीं लिखते और न ही स्पर्धा या प्रतियोगिता को कॉम्पटिशन। वे इस तरह के वाक्यों का भी प्रयोग नहीं करते - “रेन अटैक: सिटी लाइफ आउट ऑफ कंट्रोल!” या फिर “हिन्दी हमारी प्राइड है”, “लेट्स प्रमोट हिंदी”, “हिंदी इज़ द फ्यूचर”। वे प्रायः सरल, सहज और बोलचाल की हिन्दी का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में स्थानीय शब्द, लोकजीवन और क्षेत्रीय संवेदनाएँ शामिल होती हैं। इससे हिन्दी पत्रकारिता केवल शहरी अभिजात भाषा नहीं रहती, बल्कि जनसाधारण की भाषा बनी रहती है।हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र भले ही डेढ़ साल तक ही साँसें ले पाया, लेकिन हिन्दी पत्रकारिता रूपी जिस ज्योत को शुक्ल जी ने प्रज्जवलित किया, उसकी लौ बीते 200 वर्षों से हिन्दी के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज चैनलों और वेब पोर्टल के माध्यम से आज भी जगमगा रही है। देश की स्वतंत्रता में अहम योगदान देने वाली हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध बनाए रखना हम सभी का कर्तव्य है। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के 200 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएं...
- -स्वाद, गुणवत्ता और बढ़ती मांग ने बदली हजारों किसानों की तकदीर- 7800 किसान जुड़े काजू उत्पादन से, देश के कई राज्यों तक पहुंच रही जशपुर की मिठास~आलेख-सुनील त्रिपाठी, सहायक संचालक , नूतन सिदार, सहायक संचालकरायपुर। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में जशपुर जिला खेती और बागवानी के क्षेत्र में लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। पारंपरिक खेती के साथ अब किसान नगदी एवं फल फसलों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। सेब, नाशपाती, स्ट्रॉबेरी और काजू जैसी फसलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे रही हैं। इनमें काजू उत्पादन किसानों के लिए आय का मजबूत और भरोसेमंद साधन बनकर उभरा है।जिला प्रशासन, उद्यान विभाग, रीड्स और नाबार्ड के संयुक्त प्रयासों से जिले में काजू उत्पादन का दायरा तेजी से बढ़ा है। वर्तमान में जिले के लगभग 7800 किसान करीब 7800 एकड़ भूमि पर काजू की खेती कर रहे हैं। अधिकांश किसान अपने एक-एक एकड़ खेत में काजू की खेती कर बेहतर आय अर्जित कर रहे हैं।काजू उत्पादन ने न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाई है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए अवसर भी पैदा किए हैं।जशपुर में उत्पादित काजू अपनी मिठास, गुणवत्ता और बेहतरीन स्वाद के कारण खास पहचान बना चुका है। यही वजह है कि इसकी मांग छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों के साथ-साथ झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में लगातार बढ़ रही है। व्यापारियों और उपभोक्ताओं के बीच जशपुर काजू की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। गुणवत्ता के मामले में जशपुर का काजू बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुका है।काजू किसानों के लिए एक अत्यंत लाभदायक नगदी फसल साबित हो रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ग्राफ्टेड पौधों से जल्दी फल प्राप्त होते हैं और उत्पादन भी अधिक मिलता है।रोपण के लिए अनुकूल समय और विधिवर्षा ऋतु में पौध रोपण सबसे उपयुक्त माना जाता है।पौधों के बीच लगभग 7 से 8 मीटर की दूरी रखी जाती है।गड्ढों में गोबर खाद और मिट्टी मिलाकर पौधे लगाए जाते हैं।बेहतर उत्पादन के लिए आवश्यक देखभालशुरुआती वर्षों में नियमित सिंचाई जरूरी होती है।खरपतवार नियंत्रण और समय-समय पर छंटाई से उत्पादन बेहतर होता है।पौधे 3 से 4 वर्ष बाद फल देना शुरू करते हैं।8 से 10 वर्षों में पूर्ण उत्पादन प्राप्त होता है।एक विकसित पेड़ से औसतन 8 से 15 किलोग्राम तक काजू प्राप्त किया जा सकता है।काजू से मिल रहे अनेक आर्थिक लाभकाजू का उपयोग मिठाई, नमकीन और ड्राई फ्रूट के रूप में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसके साथ ही काजू के छिलकों से औद्योगिक तेल भी तैयार किया जाता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है। काजू के व्यापार और निर्यात से किसानों की आर्थिक स्थिति लगातार मजबूत हो रही है।बागवानी के क्षेत्र में नई पहचान बना रहा जशपुरजशपुर में काजू उत्पादन की यह सफलता किसानों की मेहनत, आधुनिक खेती तकनीकों और शासन की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का परिणाम है। जिले में फल एवं नगदी फसलों की बढ़ती खेती अब किसानों के जीवन में समृद्धि ला रही है और जशपुर को कृषि एवं बागवानी के क्षेत्र में नई पहचान दिला रही है।


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