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- -डिजिटल क्रांति से बदल रही है राजस्व न्याय व्यवस्थाविशेष लेख - विष्णु प्रसाद वर्मा, सहायक संचालकभारत तेजी से डिजिटल प्रशासन की ओर बढ़ रहा है और इसी दिशा में छत्तीसगढ़ ने राजस्व प्रशासन को आधुनिक, पारदर्शी और आमजन के लिए सहज बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की है। राज्य सरकार द्वारा लागू की गई “राजस्व ई-कोर्ट परियोजना” अब केवल एक तकनीकी व्यवस्था नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रामीण और शहरी नागरिकों के लिए न्याय प्राप्ति की प्रक्रिया को सरल, त्वरित और भरोसेमंद बनाने वाला प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है।वर्षों तक राजस्व मामलों में आम लोगों को तहसील, एसडीएम कार्यालय और कलेक्टर कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे। नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, फौती प्रकरण, खाता सुधार या भूमि विवाद जैसे मामलों में पेशी की तारीख जानने, आदेश की प्रति लेने या केस की स्थिति समझने में समय, धन और ऊर्जा तीनों की भारी खपत होती थी। कई बार बिचौलियों और भ्रष्टाचार का सामना भी करना पड़ता था। लेकिन अब वही पूरी प्रक्रिया डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आ चुकी है। छत्तीसगढ़ की ई-कोर्ट परियोजना ने राजस्व न्यायालयों की पारंपरिक कार्यप्रणाली को बदलकर उसे “पेपरलेस”, “स्मार्ट” और “जनकेंद्रित” बना दिया है। नायब तहसीलदार से लेकर कलेक्टर और राजस्व मंडल तक की न्यायिक प्रक्रिया अब ऑनलाइन संचालित हो रही है। इससे न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि आम नागरिकों का भरोसा भी मजबूत हुआ है।ई-कोर्ट व्यवस्था एक प्रभावी समाधान-मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव सायमुख्यमंत्री ने राजस्व ई-कोर्ट परियोजना को सुशासन और डिजिटल प्रशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा है कि राज्य सरकार का उद्देश्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और जनता के लिए सुलभ बनाना है। उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसका सीधा लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।राजस्व मामलों में वर्षों से चली आ रही जटिलताओं को समाप्त करने के लिए ई-कोर्ट व्यवस्था एक प्रभावी समाधान बनकर सामने आई है। अब नागरिकों को छोटी-छोटी जानकारियों के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। सरकार न्याय प्रक्रिया को लोगों के मोबाइल तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ने से भ्रष्टाचार और बिचौलियों की भूमिका स्वतः समाप्त होगी तथा आम लोगों का शासन-प्रशासन पर विश्वास और मजबूत होगा। मुख्यमंत्री के अनुसार, “ई-गवर्नेंस केवल तकनीक नहीं, बल्कि जनता को सम्मानपूर्वक और समयबद्ध सेवाएं देने का माध्यम है।पारदर्शिता और जवाबदेही की नई व्यवस्थाई-कोर्ट प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आवेदन प्राप्त होते ही उसका ऑनलाइन पंजीकरण किया जाता है और तत्काल डिजिटल पावती जारी होती है। इससे आवेदक को यह भरोसा मिल जाता है कि उसका आवेदन रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है और अब उसे किसी कर्मचारी या दलाल के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा।इसके बाद की पूरी प्रक्रिया—जैसे नोटिस जारी करना, इश्तहार प्रकाशित करना, पक्षकारों को सूचना भेजना, सुनवाई की तारीख तय करना और अंतिम आदेश पारित करना सभी ऑनलाइन दर्ज होते हैं।प्रत्येक कार्रवाई डिजिटल रिकॉर्ड में सुरक्षित रहती है, जिससे किसी भी स्तर पर हेरफेर की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।ई-कोर्ट पोर्टल के माध्यम से नागरिक अपने मोबाइल या कंप्यूटर से घर बैठे यह देख सकते हैं कि उनके मामले में पिछली तारीख पर क्या कार्यवाही हुई, अगली पेशी कब है और आदेश जारी हुआ है या नहीं। इससे न्यायालयों के बाहर लगने वाली भीड़ और अनावश्यक भागदौड़ में उल्लेखनीय कमी आई है।किसानों और ग्रामीण नागरिकों के लिए बड़ी राहतराजस्व मामलों का सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों और भू-स्वामियों पर पड़ता है। पहले किसानों को एक छोटी सी जानकारी के लिए भी पूरे दिन का समय निकालकर तहसील मुख्यालय जाना पड़ता था। कई बार केवल अगली तारीख जानने में ही मजदूरी और किराए का नुकसान हो जाता था।अब ई-कोर्ट व्यवस्था ने यह परेशानी काफी हद तक समाप्त कर दी है। किसान अपने गांव के लोक सेवा केंद्र, चॉइस सेंटर या मोबाइल फोन के माध्यम से ही अपने प्रकरण की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इससे समय और धन दोनों की बचत हो रही है तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती मिल रही है।डिजिटल न्याय व्यवस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन के प्रति विश्वास को भी बढ़ाया है। जब लोगों को अपने आवेदन की ऑनलाइन पावती और हर कार्रवाई की जानकारी समय पर मिलने लगती है, तो पारदर्शिता स्वतः स्थापित होती है।विवादित जमीनों की जानकारी अब सार्वजनिकई-कोर्ट परियोजना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि विचाराधीन भूमि विवादों की जानकारी अब ऑनलाइन उपलब्ध रहती है। इससे जमीन खरीदने वाले लोग पहले ही जांच कर सकते हैं कि संबंधित खसरा नंबर पर कोई विवाद या न्यायालयीन प्रकरण लंबित तो नहीं है । यह व्यवस्था फर्जीवाड़े, अवैध बिक्री और धोखाधड़ी रोकने में अत्यंत प्रभावी साबित हो रही है। पहले कई लोग विवादित भूमि खरीदकर वर्षों तक न्यायालयों के चक्कर काटते रहते थे, लेकिन अब पारदर्शी ऑनलाइन रिकॉर्ड के कारण ऐसी घटनाओं में कमी आई है।तकनीक के सहारे मजबूत हुआ प्रशासनराजस्व ई-कोर्ट प्रणाली के सफल संचालन के लिए प्रदेश के राजस्व न्यायालयों में कंप्यूटर, डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली और हाई-स्पीड इंटरनेट की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। इससे न्यायालयों के कार्य निष्पादन की गति बढ़ी है और अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हुई है। डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित सर्वर में संग्रहीत होने से अब फाइलों के गुम होने, फटने या रिकॉर्ड में छेड़छाड़ जैसी समस्याएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। प्रशासनिक निगरानी भी आसान हुई है क्योंकि उच्च अधिकारी किसी भी न्यायालय की कार्यवाही ऑनलाइन मॉनिटर कर सकते हैं।“मोबाइल में कोर्ट” की दिशा में बड़ा कदमछत्तीसगढ़ की यह पहल वास्तव में “मोबाइल में कोर्ट” की अवधारणा को साकार करती दिखाई देती है। अब नागरिकों को केवल जानकारी लेने के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। आदेश की कॉपी डाउनलोड करने से लेकर केस की स्थिति जानने तक अधिकांश सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं।ई-कोर्ट व्यवस्था ने यह साबित किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और तकनीक का सही समन्वय हो, तो शासन को वास्तव में जनसुलभ बनाया जा सकता है। यह पहल “ई-गवर्नेंस” को “स्मार्ट गवर्नेंस” में बदलने का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरी है।सुशासन की दिशा में प्रभावी पहलछत्तीसगढ़ सरकार की राजस्व ई-कोर्ट परियोजना केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि आम जनता को न्याय व्यवस्था से सीधे जोड़ने का अभिनव प्रयास है। इसने प्रशासन और नागरिकों के बीच की दूरी कम की है तथा न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, त्वरित और भरोसेमंद बनाया है।डिजिटल इंडिया के इस दौर में छत्तीसगढ़ की यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है। यह परियोजना दर्शाती है कि तकनीक का उपयोग केवल सुविधाएं बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि शासन को अधिक उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए भी किया जा सकता है। राजस्व न्यायालयों की यह डिजिटल यात्रा वास्तव में “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़” के सपने को मजबूत आधार प्रदान कर रही है।जहां न्याय, पारदर्शिता और सुविधा अब लोगों की उंगलियों पर उपलब्ध है।
- -विष्णुपद छंद गीत-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)राही जीवन-पथ के सुन ले,राह नई गढ़ना ।फूल मिले या शूल तुम्हें नित ,आगे ही बढ़ना ।यत्न सतत कर लक्ष्य-प्राप्ति हो,तब तक तुम चलना ।करनी होगी कठिन साधना ,साधक तुम बनना ।अपने कदम जमा धरती पर ,ऊपर तुम चढ़ना ।।सिक्के के दोनों पहलू कोदेखो और कहो ।सुख-दुख जीवन की सच्चाई ,जीवन सार गहो ।अंतस् के कोरे कागज पर ,फूल खुशी कढ़ना ।।सत्य-झूठ की धूप-छाँव में ,सही राह चुनना ।दुविधा में जब मन डोले तो,मन की तुम सुनना ।ढाई आखर की पोथी को ,सीखो तुम पढ़ना ।।
- हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेषआलेख- डॉ. कमलेश गोगिया ( वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद)सिटी ऑफ जॉय यानी कोलकाता जिसे पूर्व में कलकत्ता (औपनिवेशिक) और कालिकता कहा जाता था, की संस्कृति में टोला, तल्ला और लेन सामाजिक पहचान की नींव है। टोला शब्द किसी खास समुदाय या पेशे की बस्ती को दर्शाता है जबकि लेन का आशय तंग गलियों और तल्ला का अर्थ छायादार वृक्ष के नीचे के स्थान से है। कोलकाता का कालू टोला मोहल्ला, 37 अमरतल्ला लेन, वही ऐतिहासिक स्थान है जहाँ से देश में हिन्दी पत्रकारिता की नींव पड़ी। 30 मई, 1826 को पं. जुगल किशोर शुक्ल ने हिन्दी के प्रथम समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड की शुरुआत की थी। यह वह दौर था जब भारत स्वतंत्र नहीं था और अंग्रेजी, उर्दू, बंगाली तथा फारसी भाषा के समाचार पत्र प्रकाशित हुआ करते थे, उस दौर में हिन्दी भाषा का सामाचार पत्र प्रकाशित करने के साहस के लिए शब्द नहीं मिलते। उदन्त मार्तण्ड जिसका अर्थ उगता हुआ सूर्य होता है, डेढ़ साल तक ही प्रकाशित हो सका। आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हुए यह पत्र दिसंबर 1827 को बंद हो गया। कारण, अंग्रेजी शासन की नीतियाँ और आर्थिक कठिनाइयाँ, फिर हिन्दी के दम पर सरकार से टकराना उस दौर में तो और भी कठिन था। हिन्दी पत्रकारिता रूकी नहीं, अंग्रेजों के शासनकाल में ही देश के विभिन्न क्षेत्रों से हिन्दी के अनेक समाचार पत्र दैनिक, साप्ताहिक और मासिक स्वरूप में प्रकाशित होने लगे। चाहें राजा राममोहन राय के बंगदूत की बात कर लें या फिर आधुनिक हिन्दी पत्रकारिता के जनक भारतेंदू हरिशंचद्र के कवि वचन सुधा, हरिशंद्र मैग्जीन और हिन्दी के प्रथम दैनिक समाचार सुधावर्षण की। देश के लिए मर-मिटने के जुनून के साथ पत्रकारिता स्वतंत्रता संग्राम का अहम हथियार थी। आजादी के बाद पत्रकारिता मिशन से व्यवसाय बन गई। फिर तकनीकी क्रांति और डिजिडलीकरण ने हिन्दी पत्रकारिता को पूरी तरह बदल कर रख दिया। समय के साथ-साथ सब कुछ बदल गया। अब तो उदन्त मार्तण्ड का कोई निशां भी बाकी नहीं रहा, जैसा कि लगभग पाँच वर्ष पूर्व राजीव कुमार झा की जागरण की रिपोर्ट से पता चलता है। रिपोर्ट के अऩुसार, “अमरतल्ला लेन आज भी मौजूद हैं, पर 37 नंबर मकान नहीं है। अमरतल्ला लेन एक से शुरू होकर 27 पर खत्म हो जाता है। वहीं, इसी से सटा अमरतल्ला स्ट्रीट एक से शुरू होकर 29 नंबर पर समाप्त हो जाता है। 37 नंबर अमरतल्ला लेन जिस जगह से यह अखबार शुरू हुआ था उस मकान के बारे में वर्तमान समय में रहने वाले वाले लोगों को भी पता नहीं है। इसी लेन व स्ट्रीट में 40-50 सालों से रहने वाले बिहार-उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषी लोगों को भी नहीं पता है कि कभी इस स्थान से हिंदी का पहला अखबार प्रकाशित हुआ था।“ कोशिश होनी चाहिए थी हिन्दी पत्रकारिता की स्थापना के इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित कर हिन्दी पत्रकारिता दिवस को हर साल भव्य रूप प्रदान करने की।परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है, लेकिन जो परिवर्तन हिन्दी पत्रकारिता में देखने को मिलता है, उसकी अपेक्षा शायद ही कभी की गई होगी। प्रिंटिंग प्रेस और टाइपराइटर से शुरू हुई हिन्दी पत्रकारिता आज वेब पोर्टल्स, यू ट्यूब और सोशल मीडिया तक पहुँच गई है। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म ने हर नागरिक को पत्रकार बना दिया। बाजारवाद और पूंजीकरण के फलस्वरूप मिशन उद्योग बन गया। पत्रकारिता की गंभीरता भी नदारद होती चली गई। भाषा और शैली भी पूरी तरह परिवर्तित हो गई। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि हिन्दी पत्राकरिता से हिन्दी मिसिंग है, हिंग्लिश ऑन एयर है। हिन्दी के समाचार पत्र हों या न्यूज चैनल अथवा पोर्टल, हिन्दी और अंग्रेजी के मिश्रण का तड़का अनिवार्य है। दीक्षांत समारोह जैसे शब्द की जह कन्वोकेशन ने ले ली है तो न्यूज रूम में एंकर को परिस्थिति की जगह सिचुएशन बोलना ज्यादा सरल लगता है। किसी कार्पोरेट कंपनी के मिनिट्स की तरह खबरों की हेडलाइन देखी जा सकती है। जैसे हेडलाइन देखिए —“सीएम का मास्टरस्ट्रोक!”“ऑपरेशन क्लीनअप ऑन!”“पॉलिटिकल टेम्परेचर हाई!”“इश्यू का डीप एनालिसिस”हालांकि इसका सकारात्मक पहलू यह है कि हिन्दी के समाचार पत्र हिन्दी भाषा को बोलचाल के अधिक करीब लाने के उद्देश्य से हिन्दी व्याकरण के साथ अंग्रेजी शब्दों को जोड़कर वाक्यों का निर्माण करते हैं जिससे क्लिष्टता कम हो जाए। फिर डिजिटल युग में सोशल मीडिया और सॉफ्टवेयर से जुड़ी खबरें छपने के कारण अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अनिवार्य सा हो गया है। जैसे, हैशटैग, ट्रोल, डाउनलोड, ड्रापडाउन, अपडेट आदि। लेकिन प्रायः क्लिष्टता को कम करने का उद्देश्य अपना मार्ग भटक जाता है। अनेक अवसरों पर जानबूझकर हेडलाइन के साथ पूरे समाचार में हिंग्लिश का प्रयोग किया जाता है, विशेष रूप से पेज-थ्री पत्रकारिता के पुलआउट पृष्ठों में। घोटाले की जगह स्कैम लिखना ज्यादा गौरवपूर्ण समझा जाता है। हिन्दी पत्रकारिता के समक्ष अंग्रेजी का प्रभाव और वर्चस्व किसी चुनौती से कम नहीं। बावजूद इसके हिन्दी के डिजिटल पाठकों की संख्या में निरंतर विस्तार हो रहा है क्योंकि दूरस्थ इलाकों में बसे लोगों तक इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुँच बढ़ गई है। हिन्दी पत्राकारिता की समृद्धि में अहम योगदान ग्रामीण पत्रकारों का है। ग्रामीण पत्रकार मुद्दे को इश्यू नहीं लिखते और न ही स्पर्धा या प्रतियोगिता को कॉम्पटिशन। वे इस तरह के वाक्यों का भी प्रयोग नहीं करते - “रेन अटैक: सिटी लाइफ आउट ऑफ कंट्रोल!” या फिर “हिन्दी हमारी प्राइड है”, “लेट्स प्रमोट हिंदी”, “हिंदी इज़ द फ्यूचर”। वे प्रायः सरल, सहज और बोलचाल की हिन्दी का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा में स्थानीय शब्द, लोकजीवन और क्षेत्रीय संवेदनाएँ शामिल होती हैं। इससे हिन्दी पत्रकारिता केवल शहरी अभिजात भाषा नहीं रहती, बल्कि जनसाधारण की भाषा बनी रहती है।हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र भले ही डेढ़ साल तक ही साँसें ले पाया, लेकिन हिन्दी पत्रकारिता रूपी जिस ज्योत को शुक्ल जी ने प्रज्जवलित किया, उसकी लौ बीते 200 वर्षों से हिन्दी के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज चैनलों और वेब पोर्टल के माध्यम से आज भी जगमगा रही है। देश की स्वतंत्रता में अहम योगदान देने वाली हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध बनाए रखना हम सभी का कर्तव्य है। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के 200 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएं...
- -स्वाद, गुणवत्ता और बढ़ती मांग ने बदली हजारों किसानों की तकदीर- 7800 किसान जुड़े काजू उत्पादन से, देश के कई राज्यों तक पहुंच रही जशपुर की मिठास~आलेख-सुनील त्रिपाठी, सहायक संचालक , नूतन सिदार, सहायक संचालकरायपुर। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में जशपुर जिला खेती और बागवानी के क्षेत्र में लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। पारंपरिक खेती के साथ अब किसान नगदी एवं फल फसलों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। सेब, नाशपाती, स्ट्रॉबेरी और काजू जैसी फसलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे रही हैं। इनमें काजू उत्पादन किसानों के लिए आय का मजबूत और भरोसेमंद साधन बनकर उभरा है।जिला प्रशासन, उद्यान विभाग, रीड्स और नाबार्ड के संयुक्त प्रयासों से जिले में काजू उत्पादन का दायरा तेजी से बढ़ा है। वर्तमान में जिले के लगभग 7800 किसान करीब 7800 एकड़ भूमि पर काजू की खेती कर रहे हैं। अधिकांश किसान अपने एक-एक एकड़ खेत में काजू की खेती कर बेहतर आय अर्जित कर रहे हैं।काजू उत्पादन ने न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाई है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए अवसर भी पैदा किए हैं।जशपुर में उत्पादित काजू अपनी मिठास, गुणवत्ता और बेहतरीन स्वाद के कारण खास पहचान बना चुका है। यही वजह है कि इसकी मांग छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों के साथ-साथ झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में लगातार बढ़ रही है। व्यापारियों और उपभोक्ताओं के बीच जशपुर काजू की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। गुणवत्ता के मामले में जशपुर का काजू बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुका है।काजू किसानों के लिए एक अत्यंत लाभदायक नगदी फसल साबित हो रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ग्राफ्टेड पौधों से जल्दी फल प्राप्त होते हैं और उत्पादन भी अधिक मिलता है।रोपण के लिए अनुकूल समय और विधिवर्षा ऋतु में पौध रोपण सबसे उपयुक्त माना जाता है।पौधों के बीच लगभग 7 से 8 मीटर की दूरी रखी जाती है।गड्ढों में गोबर खाद और मिट्टी मिलाकर पौधे लगाए जाते हैं।बेहतर उत्पादन के लिए आवश्यक देखभालशुरुआती वर्षों में नियमित सिंचाई जरूरी होती है।खरपतवार नियंत्रण और समय-समय पर छंटाई से उत्पादन बेहतर होता है।पौधे 3 से 4 वर्ष बाद फल देना शुरू करते हैं।8 से 10 वर्षों में पूर्ण उत्पादन प्राप्त होता है।एक विकसित पेड़ से औसतन 8 से 15 किलोग्राम तक काजू प्राप्त किया जा सकता है।काजू से मिल रहे अनेक आर्थिक लाभकाजू का उपयोग मिठाई, नमकीन और ड्राई फ्रूट के रूप में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसके साथ ही काजू के छिलकों से औद्योगिक तेल भी तैयार किया जाता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिलता है। काजू के व्यापार और निर्यात से किसानों की आर्थिक स्थिति लगातार मजबूत हो रही है।बागवानी के क्षेत्र में नई पहचान बना रहा जशपुरजशपुर में काजू उत्पादन की यह सफलता किसानों की मेहनत, आधुनिक खेती तकनीकों और शासन की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का परिणाम है। जिले में फल एवं नगदी फसलों की बढ़ती खेती अब किसानों के जीवन में समृद्धि ला रही है और जशपुर को कृषि एवं बागवानी के क्षेत्र में नई पहचान दिला रही है।
- -कहानी-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)तुम्हें जाना, तुम्हें चाहा, तुम्हें पूजा मैंने ..बस एक यही खता थी मेरी, और खता क्या...शायद पूजा की रूह यही सवाल कर रही होगी सार्थक से और सार्थक...उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है । प्रेम क्या इतना स्वार्थी हो सकता है... किसी को पाने का इतना जुनून कि सही गलत का ध्यान ही न रहे । जिसे अपनी जान से अधिक चाहने का दावा करते हैं . उसे कैसे नुकसान पहुंचा सकते हैं ये । खोने - पाने से परे रूहानी प्रेम का दौर अब नहीं रहा...प्रेम में धोखा देना...एकतरफा प्रेम में पड़कर किसी मासूम चेहरे को तेजाब से जला देना , वर्तमान समय में प्रेम का यह कैसा वीभत्स चेहरा देखने को मिल रहा है... सार्थक को बेड़ियों में जकड़कर ले जाते हुए देखकर चारों तरफ आज यही चर्चा हो रही थी ।सार्थक और पूजा आठ वर्षों से एक - दूसरे को जानते थे, उनके घर आस- पास तो थे ही, स्कूल, कॉलेज की पढ़ाई भी उन्होंने एक साथ की । दोस्ती और अधिक लम्बे साथ ने कब उनके रिश्ते को प्रगाढ़ कर दिया था , इस बात का उन्हें पता ही नहीं चला । कॉलेज की पिकनिक हो या किसी दोस्त की जन्मदिन की पार्टी , सार्थक के साथ होने पर अपने - आपको सुरक्षित महसूस करती थी पूजा और उसके मम्मी - पापा भी उसके साथ कहीं भी भेजने में हिचकिचाते नहीं थे ।उनकी आँखों में सुनहरे भविष्य के ख्वाब सजने लगे थे...दिलों के तार में प्रेम की रागिनियाँ अंगड़ाई लेने लगी थी... दुनिया की हर शै खूबसूरत लगने लगी थी...यह वय ही ऐसी होती है कि अपने प्रिय की हर बात सुहाने लगती है...कमियाँ तो दिखती ही नहीं या उनकी आँखें देखना ही नहीं चाहती ।उन्होंने अपने प्रेम की दुनिया बसाने का निर्णय कर लिया था ।पढ़ाई के बाद नौकरी के लिए दोनों प्रयास कर रहे थे, कई बार निराशा के दौर आये पर दोनों एक - दूसरे की हिम्मत बने रहे । एक - दूसरे के सुख - दुःख में साथ निभाने का वादा किया था उन्होंने । अपने लक्ष्य को पाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे वे दोनों और उनके परिश्रम का सुखद फल भी उन्हें मिल गया । दोनों को एक ही विभाग में नौकरी मिल गई थी । अब तो कोई बाधा नहीं थी , बस दोनों परिवारों की सहमति चाहिए थी और उन दोनों की वर्षों की दोस्ती को रिश्ते में बदलने में कोई कठिनाई नजर नहीं आ रही थी । कई बार राहों में आने वाले रोड़े नजर नहीं आते पर उनकी वजह से हमें ठोकर लग जाती है और कदम लड़खड़ा जाते हैं । ऐसा ही कुछ उनके साथ हुआ ।सार्थक का जो अटेंशन पूजा को सुखद अनुभूतियों से भर देता था , वही अब उसे बन्धन लगने लगा था...इतना अधिक पसेसिवनेस... कभी - कभी पूजा को अजीब लगने लगता था । नौकरी करने के साथ प्राथमिकताएं स्वाभाविक रूप से बदल जाती हैं परन्तु सार्थक को उससे शिकायतें रहने लगी थी । जीवनसाथी बनने के निर्णय ने शायद उसे अधिक अपनेपन और अधिकार का एहसास कराया था कि वह पूजा को एक मिनट के लिए भी अपनी नज़रों से ओझल नहीं होने देना चाहता था ।पूजा ने महसूस किया कि सार्थक स्वयं तो आजाद पंछी की तरह उड़ना चाहता है परन्तु उस पर कई तरह की पाबन्दियाँ लगाता है । प्रेम तो मुक्त करता है , किसी को बाँधता नहीं ....उसने कभी भी सार्थक को बाँधने की कोशिश नहीं की । उसे अपने प्यार पर विश्वास था और जहाँ विश्वास है वहाँ किस बात का डर ? कॉलेज में एकदम स्वतंत्र व्यवहार रखनेवाला सार्थक आज पूजा को अपने सहयोगियों से घुलने - मिलने पर टोकने लगा था । शादी से पहले ही उसका पागलपन देखकर भयभीत हो गई थी पूजा और अब वह इस रिश्ते से बच रही थी... वह चाहती थी कि सार्थक उसकी भावनाओं को समझे और शादी के बाद भी वे अच्छे दोस्त बने रहें ...लेकिन अभी वह इस रिश्ते में नहीं बंधना चाहती ।सार्थक उसके इस निर्णय से तिलमिला उठा था..उसे अब किसी भी कीमत पर पूजा से अलग रहना गवारा नहीं था । उस दिन खूब लड़कर गया था सार्थक उससे और पूजा का दर्द इन शब्दों में उभर आया था...काश ! मैं जिंदा न होती...जब भी आँखों को बंद करती हूँ ,गहरा अंधेरा देखती हूँ...मैं अपने तमाम डर के ,बोझ तले दब गई हूँ...यहाँ रहने से डरती हूँ ,हम कभी साथ में खिलौनों से खेलते थे..और अब खुद खिलौना बन गए हैं ,सच में लड़के तो लड़के ही होते हैं...और हम लड़कियाँ अपनी बात कह भी नहीं पाती ।।उस दिन पूजा सार्थक से अपने मन की बात कहने गई थी इन्हीं कुछ शब्दों में.... और वह बर्दाश्त न करसका था... क्रोध और आवेश दिग्भ्रमित कर देता है... क्यों पूजा ...आखिर क्यों , यह प्रश्न पूछ्ते हुए अचानक उसकी हथेलियाँ पूजा के गले पर कसती गई...इतना कि पूजा अनुत्तरित रह गई । जब तक वह होश में आता पूजा उसे छोड़कर जा चुकी थी...हमेशा के लिए । हाँ.. यह प्रश्न छोड़कर कि क्या इस प्रेम कहानी का यही अंत होना था ।
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कल्पना कीजिए, आप एक खूबसूरत सफर पर हैं। चारों तरफ फैली खुली शानदार सड़क, रफ्तार पकड़ती गाड़ी और गुनगुनाता सुहाना मौसम। सब कुछ एकदम मुकम्मल लगता है। लेकिन अचानक, अगले ही मोड़ पर कोई अनहोनी हो जाए...। कई बार हाइवे पर हुआ एक अनचाहा हादसा पल भर में जिंदगी की खुशियों को मातम में बदल देता है। ऐसे किसी अनजान और सुनसान सफर पर, जहां दूर-दूर तक कोई अस्पताल या मदद नजर नहीं आती, वहां मोबाइल की स्क्रीन पर चमकता एक नंबर उम्मीद की सबसे बड़ी किरण बनकर उभरता है- 1033। आज देश के राष्ट्रीय राजमार्गों पर यह चार अंकों का नंबर महज एक हेल्पलाइन नहीं, बल्कि हजारों-लाखों मुसाफिरों के लिए संजीवनी साबित हो रहा है।हाइवे पर दुर्घटना होने के बाद जो सबसे पहला घंटा होता है, उसे चिकित्सा विज्ञान में गोल्डन ऑवर (Golden Hour) कहा जाता है। इस एक घंटे के भीतर अगर घायल को सही इलाज मिल जाए, तो उसकी जान बचने की संभावना 80 फीसदी तक बढ़ जाती है। 1033 इसी गोल्डन ऑवर का रक्षक है।जैसे ही कोई इस नंबर पर डायल करता है, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) का कॉल सेंटर तुरंत हरकत में आ जाता है। जीपीएस (GPS) ट्रैकिंग के जरिए हादसे की सटीक लोकेशन ट्रेस की जाती है और चंद मिनटों के भीतर एम्बुलेंस मौके पर पहुंचती है। घायलों को नजदीकी ट्रॉमा सेंटर या अस्पताल पहुंचाया जाता है। साथ ही रास्ता साफ करने के लिए क्रेन और पेट्रोलिंग गाड़ियां तैनात हो जाती हैं।एनएचएआई के 1033 सेवा का लाभ लेने वाले श्री नितिन वर्मा बताते हैं, "मैं रायपुर से बिलासपुर राष्ट्रीय राजमार्ग में सफ़र कर रहा था। दोपहर 2 बजे के करीब हाइवे पर मेरी गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ, मोबाइल में नेटवर्क भी कम था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कहां हूं? मैंने 1033 लगाया, और महज 7 से 10 मिनट में एम्बुलेंस मेरे सामने थी। वो नंबर नहीं, मेरे लिए संजीवनी से कम नहीं था।"आमतौर पर लोग सोचते हैं कि यह नंबर सिर्फ एक्सीडेंट के समय काम आता है, लेकिन असल में यह हाइवे पर आपका सबसे भरोसेमंद साथी है। आप कई विपरीत स्थितियों में भी इसकी मदद ले सकते हैं। रात के सन्नाटे में अगर गाड़ी का टायर पंचर हो जाए या इंजन फेल हो जाए, हाइवे पर कोई पेड़ गिर गया हो, मवेशी आ गए हों या कोई भारी मलबा पड़ा हो, यात्रा के दौरान अगर अचानक किसी सहयात्री की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ जाए, टोल प्लाजा या फास्टैग संबंधी कोई समस्या हो या हाइवे पर असुरक्षा महसूस हो रही हो... तो भी 1033 सेवा का लाभ लिया जा सकता है।ट्रक ड्राइवर श्री गुरदीप सिंह अपने अनुभव साझा करते हैं, "बात रात के करीब 09:45 बजे की है। मैं अपना भारी-भरकम ट्रक लेकर रायपुर से बिलासपुर की ओर बढ़ रहे था। अचानक एक जोरदार आवाज के साथ ट्रक का टायर फट गया। भारी वाहन और ऊपर से रात का सन्नाटा... ऐसी स्थिति में हाइवे के किनारे ट्रक खड़ा करना और मदद ढूंढना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। मैने बिना वक्त गंवाए 1033 पर कॉल किया। एनएचएआई की टीम ने तुरंत मेरी लोकेशन ट्रेस की और हाईवे पेट्रोलिंग टीम मौके पर पहुंच गई। टीम ने न सिर्फ क्रेन और तकनीकी मदद का इंतजाम किया, बल्कि जब तक काम पूरा नहीं हुआ, वहां सुरक्षा सुनिश्चित की, ताकि कोई और बड़ा हादसा न हो।"बिलासपुर-नागपुर रूट के मुसाफिर श्री एस.पी. चौबे ने बताया, "हम अपनी कार से सफर कर रहे थे कि अचानक गाड़ी पंचर हो गई। जब स्टेपनी बदलने की बारी आई, तो एक नई मुसीबत खड़ी हो गई। बहुत दिनों से पहिया खुला नहीं था, इसलिए वह बुरी तरह जाम हो चुका था। मेरा ड्राइवर पसीने से तर-बतर होकर उसे खोलने की नाकाम कोशिश कर रहा था, लेकिन वह टस से मस नहीं हो रहा था। हाइवे के किनारे खड़ी हमारी गाड़ी और ड्राइवर की जद्दोजहद को वहां से गुजर रही 1033 की रूट पेट्रोलिंग व्हीकल (RPV) टीम ने खुद देख लिया।टीम के जवान तुरंत हमारे पास रुके। उन्होंने न सिर्फ अपनी गाड़ी से जरूरी हैवी टूल्स (औजार) निकाले, बल्कि खुद आगे बढ़कर जाम हो चुके चक्के को खोला, टायर बदला और हमारी गाड़ी को रवाना किया। उनके इस अपनेपन और मुस्तैदी ने हमारा दिल जीत लिया।हाइवे पर सुरक्षा सिर्फ छोटे वाहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारी-भरकम कमर्शियल वाहनों के लिए भी 1033 एक सुरक्षा कवच है। ऐसा ही एक मामला बिलासपुर से महासमुंद की ओर जा रहे विशाल ट्रेलर के ड्राइवर श्री शिवम यादव के साथ हुआ। उनके ट्रेलर का ब्रेक अचानक जाम हो गया और गाड़ी में जरूरी एयर प्रेशर नहीं बन पा रहा था। बीच हाइवे पर इतने बड़े वाहन का इस तरह रुकना बेहद खतरनाक था।सूचना मिलते ही 1033 की टीम तुरंत मौके पर पहुंची। भारी ट्रेलर के पीछे से आ रही तेज रफ्तार गाड़ियों को सचेत करने के लिए टीम ने सेफ्टी कोन और चेवरॉन साइन बोर्ड लगाए, ताकि एक सुरक्षित बफर जोन बन सके। इस हाई-प्रोफेशनल ट्रैफिक मैनेजमेंट की वजह से न तो हाइवे पर जाम लगा और न ही कोई दुर्घटना हुई। ट्रेलर को सुरक्षित तरीके से सुधरवाने की व्यवस्था की गई।1033 की सबसे खास बात इसकी सरलता और गति है। यह सेवा 24 घंटे, सातों दिन काम करती है। इसमें भाषा की कोई दीवार नहीं है। स्थानीय भाषाओं से लेकर हिंदी और अंग्रेजी, हर भाषा में यहां मदद मिलती है। टोल-फ्री होने के कारण मोबाइल में बैलेंस न होने पर भी इस पर कॉल की जा सकती है।बदलते भारत के साथ हमारे हाइवे आधुनिक और हाई-स्पीड हो रहे हैं, लेकिन रफ्तार के इस दौर में सुरक्षा सबसे अहम है। अगली बार जब आप किसी लंबे सफर पर निकलें, तो अपनी गाड़ी की डिक्की चेक करने के साथ-साथ अपने दिमाग और मोबाइल की स्पीड डायल लिस्ट में 1033 को जरूर सेव कर लें। क्योंकि जब हाइवे पर मुश्किलें रास्ता रोकती हैं, तो यही चार अंक संजीवनी बनकर जिंदगी की रफ्तार को थमने नहीं देते। - -जैव विविधता, जल संरक्षण और जनभागीदारी का अनूठा संगमआलेख-धनंजय राठौर , (संयुक्त संचालक), अशोक कुमार चंद्रवंशी (सहायक जनसंपर्क अधिकारी)छत्तीसगढ़ का पहला रामसर स्थल कोपरा जलाशय आज पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता संवर्धन और सामुदायिक सहभागिता का प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभर रहा है। “जैव विविधता के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस 2026” की थीम “स्थानीय स्तर पर कार्य, वैश्विक प्रभाव” को यह जलाशय वास्तविक रूप में साकार कर रहा है।सुबह के शांत वातावरण में प्रवासी पक्षियों की मधुर आवाजें और जलाशय के आसपास आजीविका से जुड़े ग्रामीणों की गतिविधियां प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंध को दर्शाती हैं। कोपरा जलाशय वर्षों से क्षेत्र के लोगों के लिए जल, मत्स्य पालन, कृषि और पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा जैव विविधता संरक्षण, आर्द्रभूमि विकास और पर्यावरण संतुलन को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जल स्रोतों के संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्यजीव सुरक्षा और सामुदायिक भागीदारी से जुड़े कई अभियान प्रदेश में संचालित किए जा रहे हैं, जिनका सकारात्मक प्रभाव कोपरा जलाशय जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है।वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप ने कहा है कि छत्तीसगढ़ की जैव विविधता राज्य की अमूल्य धरोहर है और इसके संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि कोपरा जलाशय यह संदेश देता है कि जब शासन और समाज मिलकर प्रकृति संरक्षण का संकल्प लेते हैं, तब पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित होता है।कोपरा जलाशय हजारों प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन चुका है। हर वर्ष विभिन्न देशों और राज्यों से आने वाले पक्षी यहां भोजन और विश्राम प्राप्त करते हैं। इसके साथ ही यह जलाशय जलीय जीवों, मछलियों, वनस्पतियों और अनेक सूक्ष्म जीवों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास प्रदान करता है। इसी विशेषता के कारण इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता मिली है।स्थानीय ग्रामीणों, महिला स्व-सहायता समूहों, युवाओं और विद्यालयों की सक्रिय भागीदारी से यहां स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण, पक्षी संरक्षण और बायो-फेंसिंग जैसे कार्य लगातार किए जा रहे हैं। इन प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिलने के साथ लोगों में प्रकृति के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित हो रही है।विशेषज्ञों के अनुसार आर्द्रभूमियां प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती हैं। वे बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, जल शुद्धिकरण और कार्बन अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसे में कोपरा जलाशय का संरक्षण जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में भी बेहद उपयोगी साबित हो रहा है।कोपरा जलाशय आज यह संदेश दे रहा है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की साझा जिम्मेदारी है। स्थानीय स्तर पर किए गए छोटे-छोटे प्रयास ही वैश्विक स्तर पर बड़े बदलाव की नींव बनते हैं। छत्तीसगढ़ का यह पहला रामसर स्थल आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और सामुदायिक सहभागिता का राष्ट्रीय मॉडल बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि प्रकृति का संरक्षण हमारी साझा जिम्मेदारी है। इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण और इसके वैश्विक महत्व पर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने राज्य के नागरिकों और संरक्षण टीम की सराहना करते हुए अपना संदेश दिया है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि कोपरा जलाशय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रामसर स्थल की मान्यता मिलना पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है। हमारी सरकार जैव विविधता संरक्षण, आर्द्रभूमि के विकास और पर्यावरण संतुलन को मजबूत करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है। कोपरा जलाशय इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जब शासन की नीतियां और समाज का संकल्प एक साथ मिलते हैं, तो स्थानीय स्तर पर किए गए छोटे प्रयास भी वैश्विक स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकते हैं। हमारी समृद्ध प्रकृति ही हमारी आने वाली पीढ़ियों का सुरक्षित भविष्य है।
- -कम समय में घने जंगल तैयार कर पर्यावरण संरक्षण को मिल रही नई दिशा-धनंजय राठौर , संयुक्त संचालक ,अशोक कुमार चंद्रवंशी , सहायक जनसंपर्क अधिकारीवन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावाकी तकनीक एक बेहद प्रभावी और लोकप्रिय विधि बन गई है। जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित यह तकनीक केवल 2-3 वर्षों में बंजर भूमि को घने, आत्मनिर्भर सूक्ष्म वनों में बदल देती है। पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में यह विधि 10 गुना तेजी से बढ़ती है और 30 गुना अधिक घने जंगल बनाती है, जो शहरी क्षेत्रों के लिए आदर्श है।छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण और वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए मियावकी वन तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है। राज्य में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग तथा छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड द्वारा इस तकनीक के जरिए शहरी क्षेत्रों, औद्योगिक क्षेत्रों और खनन प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर हरियाली विकसित की जा रही है। मियावकी पद्धति में स्थानीय प्रजातियों के पौधों को अधिक घनत्व में लगाया जाता है, जिससे मात्र 3 से 5 वर्षों में घना जंगल तैयार हो जाता है।राज्य में तेजी से बढ़ रहा सघन वनीकरणछत्तीसगढ़ में वर्ष 2022 से मियावकी पद्धति के तहत लगातार वृक्षारोपण किया जा रहा है। वर्ष 2022 में कोटा मण्डल में एनटीपीसी लिमिटेड के सहयोग से 1 हेक्टेयर क्षेत्र में 23 हजार पौधे तथा 0.3 हेक्टेयर में 7 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2023 में कोटा के भिल्मी क्षेत्र में 6.4 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधों का रोपण किया गया। वहीं गेवरा क्षेत्र में 2 हेक्टेयर भूमि पर 20 हजार पौधे लगाए गए। वर्ष 2024 में कोटा के उच्चभट्टी क्षेत्र में 3.2 हेक्टेयर में 32 हजार पौधे लगाए गए। इसके अलावा रायगढ़ मण्डल के तिलईपाली और छाल क्षेत्रों में कुल 3.75 हेक्टेयर भूमि पर 37 हजार 500 पौधों का सफल रोपण किया गया।वर्ष 2025 में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं जारीवर्तमान में राज्य के कई क्षेत्रों में वृक्षारोपण कार्य तेजी से जारी है। बारनवापारा मण्डल में ‘हरियर छत्तीसगढ़’ योजना के तहत 6 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। कोरबा और रायगढ़ क्षेत्रों में साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड के सहयोग से 4 हेक्टेयर क्षेत्र में 40 हजार पौधों का रोपण किया जा रहा है। वहीं विशेष परियोजनाओं के अंतर्गत महानदीकोलफील्ड लिमिटेड द्वारा 1.9 हेक्टेयर भूमि पर 64 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही अरपा नदी के किनारे भी बड़े पैमाने पर पौधारोपण कर हरित क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा है।पर्यावरण संरक्षण में मिल रहे बहुआयामी लाभविशेषज्ञों के अनुसार मियावकी वन सामान्य जंगलों की तुलना में अधिक कार्बन अवशोषित करते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। यह तकनीक वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने, भू-जल स्तर सुधारने और मिट्टी संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन वनों की शुरुआती वर्षों में देखभाल की जाती है, जिसके बाद ये जंगल स्वतः विकसित होने लगते हैं। इससे रखरखाव की लागत कम होती है और लंबे समय तक पर्यावरणीय लाभ मिलता है।बंजर डंप क्षेत्र से हरित जंगल बनने की ओर गेवरा की प्रेरक पहलछत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनूठी पहल करते हुए कोरबा जिले के गेवरा क्षेत्र के 12.45 हेक्टेयर डंप क्षेत्र में 33 हजार 935 मिश्रित प्रजातियों के पौधों का सफल रोपण किया है। वन मंत्री केदार कश्यप ने इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि राज्य सरकार पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए लगातार प्रभावी कदम उठा रही है।जहां हरियाली संभव नहीं थी, वहां तैयार हो रहा जंगलकोयला खनन के बाद डंप क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी नीचे दब जाती है और ऊपर पत्थर, कोयला अवशेष तथा अनुपजाऊ मिट्टी रह जाती है। ऐसे क्षेत्रों में पौधों का उगना बेहद कठिन माना जाता है। लेकिन वैज्ञानिक पद्धति और सतत प्रयासों से इस बंजर भूमि को अब हरियाली में बदला जा रहा है।वैज्ञानिक तरीके से किया गया पौधारोपणडंप क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट, नीमखली और डीएपी का उपयोग किया गया। जीपीएस सर्वे और सीमांकन के बाद व्यवस्थित गड्ढे तैयार किए गए तथा 3 से 4 फीट ऊंचाई वाले स्वस्थ पौधों का रोपण किया गया। इस क्षेत्र में नीम, शीशम, सिरस, कचनार, करंज, आंवला, बांस, महोगनी, महुआ और बेल जैसी विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इससे आने वाले समय में यह क्षेत्र पक्षियों और अन्य वन्य जीवों के लिए भी उपयुक्त आवास बन सकेगा।निरंतर देखभाल से मिल रही सफलताशुरुआती 2-3 वर्षों की देखभाल के बाद, यह वन पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाता है और इसे किसी उर्वरक या पानी की आवश्यकता नहीं होती है। रोपण के बाद पौधों की नियमित सिंचाई, खाद, निंदाई-गुड़ाई, घास कटाई और सुरक्षा का कार्य लगातार किया जा रहा है। मृत पौधों का समय पर प्रतिस्थापन भी सुनिश्चित किया जा रहा है। वर्ष 2025 से 2029 तक पांच वर्षों तक रखरखाव के बाद इस विकसित हरित क्षेत्र को साउथ इस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड गेवरा को सौंपा जाएगा।हरित भविष्य की ओर मजबूत पहलकम जगह में घने जंगल बनाकर शहरों में प्रदूषण (धूल और ध्वनि) को कम करने में सहायक होते हैं। ये वन पारंपरिक वनों की तुलना में 30 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं। गेवरा की यह पहल दर्शाती है कि सही योजना, वैज्ञानिक तकनीक और निरंतर प्रयासों से बंजर और पत्थरीली भूमि को भी घने जंगल में बदला जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र सघन हरित वन और जैव विविधता से भरपूर मानव निर्मित जंगल के रूप में विकसित होगा, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रेरणादायक उदाहरण बनेगा।
- विशेष लेख -धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, , सुनील त्रिपाठी, सहायक संचालकरायपुर / छत्तीसगढ़ सरकार की मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 बीपीएल, घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं के लिए एक राहत पहल है। इसके तहत पुराने बकाये पर सरचार्ज में छूट मिल रही है। बकाया बिजली बिल पर लगने वाला पूरा सरचार्ज (ब्याज) माफ या मूल बकाया राशि एकमुश्त या किस्तों में जमा करने की सुविधा। यह योजना बीपीएल, सामान्य घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं को लंबे समय से लंबित बिजली बिलों के बोझ से मुक्ति दिलाने के लिए लाई गई है।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार प्रदेशवासियों को आर्थिक राहत प्रदान करने और उनकी दैनिक जीवन से जुड़ी समस्याओं का व्यावहारिक समाधान देने के लिए लगातार जनहितकारी निर्णय ले रही है। इसी कड़ी में शुरू की गई मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 लाखों बिजली उपभोक्ताओं के लिए राहत का बड़ा माध्यम बनकर उभरी है। यह योजना विशेष रूप से उन परिवारों के लिए उपयोगी है जो पुराने बकाया बिजली बिल और बढ़ते सरचार्ज के कारण आर्थिक दबाव में थे।क्या है मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 राज्य सरकार की एक विशेष पहल है, जिसका उद्देश्य उपभोक्ताओं के पुराने और लंबित बिजली बिलों का सरल समाधान उपलब्ध कराना है। योजना के तहत बकाया बिजली बिलों पर लगने वाले सरचार्ज को पूरी तरह माफ किया जा रहा है। इसके साथ ही उपभोक्ताओं को शेष राशि का भुगतान एकमुश्त या आसान किस्तों में करने की सुविधा भी दी गई है। पात्र श्रेणियों के उपभोक्ताओं को मूल बकाया राशि पर भी विशेष छूट का लाभ मिल रहा है।28 लाख से अधिक उपभोक्ताओं को मिल चुकी है राहतराज्य शासन के अनुसार इस योजना के माध्यम से अब तक प्रदेश के 28 लाख से अधिक उपभोक्ताओं को 757 करोड़ रुपए से अधिक के सरचार्ज माफ होंगे। यह आंकड़ा दर्शाता है कि योजना न केवल व्यापक स्तर पर लागू की गई है, बल्कि लाखों परिवारों के लिए वास्तविक आर्थिक सहायता का माध्यम भी बनी है।किन उपभोक्ताओं को मिलेगा लाभइस योजना का लाभ मुख्य रूप से बीपीएल परिवारों, सामान्य घरेलू उपभोक्ताओं और कृषि उपभोक्ताओं को दिया जा रहा है। ऐसे उपभोक्ता जिनके बिजली बिल लंबे समय से बकाया हैं और जो एकमुश्त भुगतान करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं, वे इस योजना के माध्यम से अपने बकाया का समाधान कर सकते हैं।योजना से होने वाले प्रमुख फायदेसरचार्ज की पूरी माफी, पुराने बकाया बिलों पर लगने वाला सरचार्ज अक्सर मूल राशि से भी अधिक हो जाता है। इस योजना के तहत सरचार्ज की पूर्ण माफी से उपभोक्ताओं को तत्काल बड़ी राहत मिलती है।आसान किस्तों में भुगतानबड़ी राशि एक साथ जमा करने की बाध्यता समाप्त हो जाती है। उपभोक्ता अपनी सुविधा और आर्थिक क्षमता के अनुसार किस्तों में भुगतान कर सकते हैं। घरेलू बजट पर कम दबाव और सरचार्ज माफी और किस्त सुविधा से परिवारों को अपने मासिक खर्चों का बेहतर प्रबंधन करने में मदद मिलती है।बिजली विच्छेदन का खतरा कमबकाया राशि के कारण बिजली कटने की आशंका रहती है। योजना का लाभ लेने से उपभोक्ता नियमित भुगतान व्यवस्था में लौट सकते हैं। इससे किसानों को सीधा लाभ हो रहा है। कृषि उपभोक्ताओं को बकाया बिजली बिल के बोझ से राहत मिलती है, जिससे सिंचाई और खेती का कार्य निर्बाध रूप से जारी रह सकता है।मानसिक तनाव से राहतलंबित बिलों की चिंता से मुक्ति मिलने पर परिवार आर्थिक रूप से अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। जो उपभोक्ता लंबे समय से भुगतान नहीं कर पा रहे थे, उन्हें फिर से नियमित भुगतान प्रणाली से जुड़ने का अवसर मिलता है।योजना का लाभ कैसे प्राप्त करेंयोजना का लाभ लेने के लिए उपभोक्ता अपने नजदीकी बिजली कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त टोल फ्री नंबर 1912 पर जानकारी प्राप्त की जा सकती है। विस्तृत जानकारी और आवश्यक दिशा-निर्देशों के लिए छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड की आधिकारिक वेबसाइट का उपयोग किया जा सकता है।योजना की अवधिमुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 1 जनवरी 2026 से 31 दिसंबर 2026 तक प्रभावशील रहेगी। राज्य सरकार ने उपभोक्ताओं से समय रहते योजना का लाभ लेने की अपील की है।जनहित और सुशासन का प्रभावी उदाहरणमुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 राज्य सरकार की संवेदनशील और जनोन्मुखी सोच का उदाहरण है। यह योजना केवल बकाया बिलों के समाधान तक सीमित नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों को आर्थिक राहत, मानसिक संतोष और बेहतर वित्तीय प्रबंधन का अवसर भी प्रदान करती है।मुख्यमंत्री बिजली बिल भुगतान समाधान योजना 2026 उन उपभोक्ताओं के लिए अत्यंत लाभकारी है जो पुराने बिजली बिलों के बोझ से परेशान हैं। सरचार्ज माफी, मूल राशि पर छूट और आसान किस्तों जैसी सुविधाएं इसे एक प्रभावी और जनहितकारी योजना बनाती हैं। यह योजना आम नागरिकों को राहत देने के साथ-साथ उन्हें नियमित भुगतान व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। प्रदेशवासियों के लिए यह एक सुनहरा अवसर है कि वे इस योजना का लाभ उठाकर अपने लंबित बिजली बिलों का समाधान करें और आर्थिक राहत प्राप्त करें।
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आर्टिकल- पुलेला गोपीचंद
दो चिंतन शिविरों का हिस्सा बनने का अवसर प्राप्त करने के बाद, मैं भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि यह आज भारतीय खेल जगत की सबसे सामयिक और असरदार पहलों में से एक है। हम अपने राष्ट्र की खेल यात्रा के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं, एक ऐसा मोड़ जहाँ इरादा, निवेश और प्रेरणा अभूतपूर्व रूप से एक साथ मिल रहे हैं।पिछले एक दशक में, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भारत में खेल हाशिये से मुख्यधारा में आ गया है। इसके महत्व के प्रति भी साफ तौर पर राष्ट्रीय जागरूकता देखी जा सकती है, न केवल एक प्रतिस्पर्धी गतिविधि के रूप में, बल्कि स्वास्थ्य, अनुशासन और राष्ट्रीय गौरव के साधन के रूप में भी। आज, हम एक विशाल और विविध तंत्र देख रहे हैं, जहां राज्य सरकारें, गैर-सरकारी संगठन, निगम, संघ और ज़मीनी स्तर के संस्थान सभी मिलकर खेलों के विकास में सक्रिय रूप से योगदान दे रहे हैं।चिंतन शिविर की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सभी हितधारकों को एक साझा मंच पर लाता है। खेल अपने आप में कई क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है, जिनमें विनिर्माण, मनोरंजन, फिटनेस, मीडिया और शिक्षा शामिल हैं। यह शिविर इन सभी क्षेत्रों को एक साथ लाने में मदद करता है, जिससे एक साझा दृष्टिकोण बनता है, जो दीर्घकालिक सफलता के लिए बेहद ज़रुरी है। यह देश के सामूहिक दृष्टिकोण को सामने लाता है और साथ ही विभिन्न राज्यों की सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रदर्शित करता है, जिससे अनुकरण और नवाचार को भी प्रोत्साहन मिलता है।चिंतन शिविर महज एक सम्मेलन से कहीं बढ़कर, एक शिक्षण तंत्र है। यह इसमें शामिल होने वाले लोगों को विचारों का आदान-प्रदान करने, चुनौतियों को समझने और मिलकर समाधान विकसित करने का अवसर देता है। यह एक शक्तिशाली प्रेरक के रूप में भी काम करता है, सफलता की तमाम कहानियों को सामने लाता है और इस विचार को और पुख्ता करता है कि भारत में खेल महज़ विशिष्ट पदकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भागीदारी, समावेशिता और राष्ट्र निर्माण भी शामिल है।फिट इंडिया मूवमेंट जैसी पहल, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन और साइक्लिंग प्रतियोगिताओं जैसी सामुदायिक गतिविधियों ने खेल के प्रति हमारे नज़रिए को नया रूप दिया है। आज के वक्त में जोर "सभी के लिए खेल" के साथ-साथ, उच्चतम स्तर पर उत्कृष्टता पर है। पदक जीतने की आकांक्षाएं और व्यापक भागीदारी अब अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं, बल्कि वे एक ही प्रक्रिया का हिस्सा हैं।श्रीनगर में शिविर का आयोजन करने से इसका महत्व और भी बढ़ गया है। इस शहर की शांत सुंदरता न केवल खेलों की विचारधारा के लिए एक मनोरम पृष्ठभूमि प्रदान करती है, बल्कि शांत चिंतन का भाव भी देती है, जो सार्थक संवाद के लिए बेहद ज़रुरी है।इस चिंतन शिविर का एक अहम केंद्र बिंदु श्रीनगर खेल संकल्प को अपनाना था। यह संकल्प महज़ एक आशय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि यह एक एकीकृत ढांचा है, जो भारतीय खेल जगत के सभी हितधारकों की आकांक्षाओं को एक साथ बांधता है। साझा लक्ष्यों, प्राथमिकताओं और जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करके, यह एक ऐसा रोडमैप तैयार करता है, जो विखंडन के बजाय सहयोग को प्रोत्साहित करता है।श्रीनगर खेल संकल्प की असली ताकत विभिन्न भागीदारों—सरकारों, संघों, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज को एक मंच पर लाने की क्षमता में निहित है। यह इस विचारधारा को और पुख्ता करता है कि भारत के खेल जगत का उत्थान अलग-थलग प्रयासों से नहीं हो सकता। इसके बजाय, इसे एक समन्वित, सहयोगात्मक दृष्टिकोण से संचालित किया जाना चाहिए, जहां संसाधनों, ज्ञान और विशेषज्ञता को एक साथ लाया जाए।भारत को 2036 तक ओलंपिक खेलों में शीर्ष 10 देशों में शामिल होने की अपनी दीर्घकालिक महत्वाकांक्षा को प्राप्त करने के लिए यह समन्वय बेहद महत्वपूर्ण है। विश्व स्तरीय एथलीट तैयार करने के लिए न केवल प्रतिभा की ज़रुरत होती है, बल्कि एक सुचारू तंत्र की भी आवश्यकता होती है, जिसमें जमीनी स्तर पर पहचान, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचा, उत्कृष्ट कोचिंग, प्रतिस्पर्धा का अनुभव और निरंतर वित्तीय एवं संस्थागत समर्थन शामिल हैं। संकल्प वही रणनीतिक कड़ी है, जो इन सभी तत्वों को एक सुसंगत प्रणाली में जोड़ सकता है।इन वार्ताओं से जो बात सबसे अधिक उभरकर सामने आई है, वह है इस व्यवस्था में मौजूद आशावाद। सभी का यह मानना है कि भारत का खेल भविष्य उज्ज्वल है और सहयोग से हम एक सशक्त, समावेशी और उच्च प्रदर्शन वाली खेल संस्कृति का निर्माण कर सकते हैं।चिंतन शिविर कई मायनों में एक अनूठा प्रयोग है, लेकिन यह पहले से ही सफल साबित हो रहा है। यह संवाद, समन्वय और आपसी समझ के महत्व को दर्शाता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए, ऐसे मंच न केवल लाभकारी हैं, बल्कि आवश्यक भी हैं।अगर हम वैश्विक खेल मंच पर अपनी महत्वाकांक्षाओं को सही मायने में साकार करना चाहते हैं, तो इन संवादों का जारी रहना और इन्हें सामूहिक कार्रवाई से मदद मिलना भी ज़रुरी है। श्रीनगर खेल संकल्प हमें वह दिशा प्रदान करता है। चिंतन शिविर हमें वह मंच प्रदान करता है। ये दोनों मिलकर भारत को अपनी खेल संबंधी आकांक्षाओं को स्थायी ओलंपिक सफलता में बदलने के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करते हैं।(लेखक भारतीय राष्ट्रीय बैडमिंटन टीम के मुख्य राष्ट्रीय कोच हैं) -
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)दीप जलाने से हो जाता, जगमग घर का आँगन।
माँ का होना कर देता है, घर को सुंदर कानन।।
रहे व्यवस्थित सारी चीजें, स्वच्छ रहे हर कोना।
साँझ ढले तुलसी को दीपक, पूजन-अर्चन पावन ।।
त्यौहारों की रौनक माँ से, पकवानों की खुशबू।
रीति-रस्म संस्कार सिखाती, महके घर ज्यों चंदन।।
थकित व्यथित अंतस् को लगती, मरहम माँ की ममता।
संबल संयम धैर्य हौसला, आशा दे अपनापन।।
सबकी उलझन सुलझाती है, पीर रखे निज मन में।
संघर्षों में तपकर निखरी, माँ होती है कंचन।।
आँचल है ममता का सागर, देवपगा सुरसरिता।
माँ धीरज में धरणी जैसी, नभ-सम विस्तृत दामन।। - -हरा सोना, नई उड़ान: वनोपज से आत्मनिर्भरता की ओर छत्तीसगढ़- धनंजय राठौर , संयुक्त संचालक,- अशोक कुमार चंद्रवंशी ,सहायक जनसंपर्क अधिकारीछत्तीसगढ़, जिसे हर्बल स्टेट के रूप में जाना जाता है, आज अपनी समृद्ध वन संपदा और दूरदर्शी शासकीय नीतियों के बल पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दे रहा है। यहाँ के वनों से प्राप्त होने वाला ग्रीन गोल्ड अब केवल स्थानीय उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक बाज़ारों में अपनी चमक बिखेर रहा है। छत्तीसगढ़ की यह पहल न केवल वनों का संरक्षण कर रही है, बल्कि ग्रामीण समाज में स्वावलंबन, आत्मविश्वास और आर्थिक सुरक्षा की एक नई चेतना का संचार कर रही है।‘ग्रीन गोल्ड’ (हरा सोना) वनों की असली पूँजी छत्तीसगढ़ में वनोपज को श्हरा सोनाश् कहा जाता है, जो राज्य की आर्थिक रीढ़ है। तेंदूपत्ता एवं बांस बहुमुखी उपयोगिता के कारण इन्हें प्रमुखता से श्हरा सोनाश् माना जाता है। लाख, शहद और दुर्लभ औषधीय पौधों के साथ-साथ सागौन, साल, बीजा और शीशम जैसे कीमती वृक्ष यहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। आधुनिक प्रसंस्करण के माध्यम से इन कच्चे माल को उच्च मूल्य के उत्पादों में बदला जा रहा है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और वन मंत्री श्री केदार कश्यप द्वारा लोकार्पित यह इकाई वनोपज आधारित अर्थव्यवस्था का पावरहाउस है। आंवला, बेल, गिलोय और अश्वगंधा जैसे उत्पादों को जूस, कैंडी और हर्बल पाउडर में परिवर्तित किया जाता है। वैज्ञानिक भंडारण यहाँ 20 हजार मीट्रिक टन क्षमता वाले अत्याधुनिक गोदाम हैं, जो उपज को सुरक्षित रखते हुए संग्राहकों को बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाते हैं।छत्तीसगढ़ हर्बल्स स्थानीय से वैश्विक तक राज्य सरकार का यह आधिकारिक ब्रांड शुद्धता और प्राकृतिक उत्पादों का पर्याय बन चुका है। संजीवनी स्टोरों की संख्या 30 से बढ़कर अब 1,500 से अधिक हो गई है। ई-कॉमर्स अब ये उत्पाद अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी उपलब्ध हैं। प्रमुख उत्पाद भृंगराज तेल, नीम तेल, च्यवनप्राश, शुद्ध शहद, महुआ उत्पाद, बेल शर्बत और विभिन्न आयुर्वेदिक चूर्ण।इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में महिला स्व-सहायता समूह हैं। दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों की महिलाएं मशीन संचालन, गुणवत्ता परीक्षण और पैकेजिंग का कार्य संभाल रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन में कमी आई है और परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह मॉडल आदिवासी महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्तश् बनाने का सफल उदाहरण है।हर्बल एक्सट्रैक्शन यूनिट (2025) भविष्य की राह को देखते हुए वर्ष 2025 में स्थापित इस यूनिट ने छत्तीसगढ़ को हर्बल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित कर दिया है। यहाँ औषधीय पौधों से उच्च गुणवत्ता वाले अर्क तैयार किए जाते हैं, जिनकी भारी मांग अंतर्राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल और वेलनेस इंडस्ट्री में है। राज्य अब केवल कच्चा माल देने वाला क्षेत्र नहीं, बल्कि परिष्कृत उत्पादों का निर्माता बन गया है।
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विशेष लेख - नितेश चक्रधारी (सहायक जनसंपर्क अधिकारी)
रायपुर / छत्तीसगढ़ में शासन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में “सेवा सेतु” एक गेम-चेंजर पहल साबित हो रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार प्रशासनिक सेवाओं को नागरिकों की उंगलियों तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी विजन का परिणाम है कि आज आय, जाति, निवास प्रमाण-पत्र से लेकर राशन कार्ड और भू-नक़ल तक की 441 से अधिक सेवाएं एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं। डिजिटल युग में सुशासन का असली अर्थ है सेवाओं का सरलीकरण और समयबद्धता। “सेवा सेतु” इसी सोच को साकार कर रहा है, जो छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक पहचान को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार है।डिजिटल सुशासन- कार्यालयों के चक्करों से मिली मुक्तिएक समय था जब नागरिकों को प्रमाण-पत्र बनवाने जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए अलग-अलग सरकारी कार्यालयों की दौड़ लगानी पड़ती थी। इसमें न केवल समय और श्रम की बर्बादी होती थी, बल्कि बिचौलियों का डर भी बना रहता था। “सेवा सेतु” ने इस पारंपरिक ढर्रे को बदलते हुए “वन स्टॉप सॉल्यूशन” पेश किया है। अब नागरिक घर बैठे या नजदीकी लोक सेवा केंद्र से ऑनलाइन आवेदन कर निर्धारित समय-सीमा में सेवाओं का लाभ ले रहे हैं। तकनीकी उन्नयन की दिशा में राज्य ने लंबी छलांग लगाई है। छत्तीसगढ़ के पुराने ई-डिस्ट्रिक्ट पोर्टल पर जहाँ केवल 86 सेवाएं उपलब्ध थीं, वहीं नए और उन्नत “सेवा सेतु” प्लेटफॉर्म पर अब 441 सेवाएं लाइव हैं।इस पोर्टल पर 30 से अधिक विभागों को एक साथ जोड़ा गया हैइस नई सेवा में 54 नई सेवाओं के साथ विभिन्न विभागों की 329 री-डायरेक्ट सेवाओं का सफल एकीकरण किया गया है, जिससे नागरिकों को अलग-अलग पोर्टल्स पर भटकना नहीं पड़ता। छत्तीसगढ़ लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत समय-सीमा में सेवा देना अब केवल कागजी नियम नहीं, बल्कि हकीकत है। पिछले 28 महीनों के आंकड़े इसकी सफलता की कहानी बयां करते हैं। कुल 75 लाख 70 हजार से अधिक आवेदनों में से 68 लाख 41 हजार से अधिक मामले का निराकरण किया जा चुका है। इस प्रकार 95 प्रतिशत से अधिक आवेदनों का निपटारा तय समय-सीमा के भीतर किया गया।प्रमाण-पत्रों की डिजिटल सुलभताआंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक मांग बुनियादी प्रमाण-पत्रों की रही है। चिप्स (ब्भ्पच्ै) कार्यालय के मुताबिक आय प्रमाण-पत्ररू 32 लाख से अधिक आवेदन, मूल निवास, जाति प्रमाण-पत्र, विवाह पंजीयन और भू-नक़ल सेवाओं का भी बड़े पैमाने पर डिजिटल उपयोग हुआ है।व्हाट्सएप और डिजिटल ट्रांजेक्शन- पहुँच हुई और भी आसानतकनीक को जन-जन तक पहुँचाने के लिए अब “सेवा सेतु” को व्हाट्सएप से भी जोड़ दिया गया है। डिजिटल इंडिया की अवधारणा को धरातल पर उतारते हुए इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से अब तक 3.3 करोड़ से अधिक डिजिटल ट्रांजेक्शन किए जा चुके हैं।पारदर्शिता और विश्वास का नया मॉडल“सेवा सेतु” केवल एक तकनीकी पोर्टल नहीं, बल्कि सरकार और जनता के बीच विश्वास का सेतु है। इलेक्ट्रॉनिक वर्कफ्लो प्रणाली के कारण अब हर आवेदन की रीयल-टाइम निगरानी संभव है, जिससे अनावश्यक देरी और भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म हुई है। यदि इसी गति से सुधार जारी रहा, तो छत्तीसगढ़ का यह मॉडल भविष्य में देश के अन्य राज्यों के लिए प्रेरणा बन सकता है। -
विशेष लेख : धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक
अशोक कुमार चन्द्रवंशी, सहायक जनसंपर्क अधिकारीरायपुर । मन की बात' से राष्ट्रीय क्षितिज तक का सफर- प्रायः सभी प्रकृति प्रेमियों का मानना है कि प्रकृति कभी भी अपना ऋण नहीं भूलती। यदि मनुष्य पूरी ईमानदारी से उसके संरक्षण की ओर एक कदम बढ़ाता है, तो प्रकृति उसे अपनी भव्यता से कई गुना वापस लौटाती है। छत्तीसगढ़ की पावन धरा, जो सदियों से अपनी नैसर्गिक संपदा और सघन वन क्षेत्रों के लिए विख्यात रही है, आज वन्यजीव संरक्षण के एक नए स्वर्णिम युग की ओर बढ़ रही है।छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में स्थित बारनवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य (लगभग 245 वर्ग किमी) में काले हिरणों (ब्लैकबक) का सफलतापूर्वक पुनरुद्धार हुआ है, जहाँ इनकी संख्या अब 200 के करीब पहुँच गई है। 1970 के दशक में विलुप्त हो चुके इन हिरणों को 2018 की पुनरुद्धार योजना और 2026 तक के वैज्ञानिक प्रयासों से वापस लाया गया। हाल ही में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम “मन की बात” में जब बारनवापारा अभ्यारण्य के काले हिरणों की सफल वापसी का उल्लेख किया, तो यह केवल एक राज्य की उपलब्धि नहीं रही, बल्कि भारत के पर्यावरण मानचित्र पर वन्यजीव संरक्षण का एक नया अध्याय बन गई।विजन भरा नेतृत्व और प्रतिबद्धता- इस गौरवमयी उपलब्धि के सूत्रधार छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय हैं। उन्होंने इस सफलता को राज्य की समृद्ध जैव विविधता और पर्यावरण के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का प्रतिफल बताया है। मुख्यमंत्री श्री साय का मानना है कि प्रधानमंत्री की सराहना केवल एक प्रशंसा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के वन विभाग और वहां के स्थानीय समुदायों के कठिन परिश्रम पर लगी राष्ट्रीय मुहर है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ आज विकास और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के बीच उस दुर्लभ संतुलन को साध रहा है, जिसकी आज पूरे विश्व को आवश्यकता है।वैज्ञानिक रणनीति: विलुप्ति से पुनर्वास तक- बारनवापारा अभ्यारण्य में काले हिरणों (Blackbucks) का दिखाई देना एक समय दुर्लभ हो गया था। लेकिन वन मंत्री श्री केदार कश्यप के कुशल मार्गदर्शन और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) श्री अरुण कुमार पाण्डेय के रणनीतिक निर्देशन ने इस असंभव लक्ष्य को वास्तविकता में बदल दिया। फरवरी 2026 का महीना छत्तीसगढ़ के वन इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ, जब विशेषज्ञों की कड़ी निगरानी में 30 काले हिरणों को उनके प्राकृतिक आवास में 'सॉफ्ट रिलीज' पद्धति से मुक्त किया गया। यह प्रक्रिया केवल उन्हें जंगल में छोड़ने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि वे नए वातावरण में बिना किसी तनाव (Stress-free) के रच-बस सकें। ब्लैकबक कंजर्वेशन सेंटर में बेहतर पोषण और वैज्ञानिक देखभाल से इनकी संख्या में वृद्धि हुई।प्रशासनिक इच्छाशक्ति और मैदानी संघर्ष- इस महाअभियान के पीछे उन जांबाज अधिकारियों और मैदानी अमले की मेहनत है, जिन्होंने दिन-रात एक कर दिया। मुख्य वन संरक्षक (रायपुर) श्रीमती सतोविशा समाजदार और वनमंडलाधिकारी (बलौदाबाजार) श्री धम्मशील गणवीर के नेतृत्व में फील्ड स्टाफ, जीव वैज्ञानिकों और पशु चिकित्सकों की एक समर्पित टीम ने एक ढाल की तरह काम किया। वर्तमान में इन हिरणों की सुरक्षा के लिए हाई-टेक निगरानी प्रणाली, जीपीएस ट्रैकिंग और नियमित पेट्रोलिंग का उपयोग किया जा रहा है, जो छत्तीसगढ़ वन विभाग की तकनीकी दक्षता का प्रमाण है।रामपुर ग्रासलैंड:- एक सुरक्षित भविष्य का पालना बारनवापारा अभ्यारण्य का यह मॉडल आज देश के अन्य राज्यों के लिए एक 'केस स्टडी' बन सकता है। यहाँ केवल काले हिरण की प्रजाति का पुनर्वास नहीं हुआ, बल्कि उनके लिए एक संपूर्ण आवास तंत्र विकसित किया गया। रामपुर ग्रासलैंड का वैज्ञानिक प्रबंधन, प्राकृतिक जल स्रोतों का जीर्णोद्धार और घास की स्थानीय प्रजातियों का संवर्धन वे मुख्य कारक हैं, जिन्होंने काले हिरणों को वहां फलने-फूलने के लिए प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त, स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी ने मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की एक अनूठी मिसाल पेश की है। काला हिरण (ब्लैकबक) भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला एक संकटग्रस्त मृग है। नर काले हिरण का रंग गहरा भूरा से काला होता है, उसके लंबे सर्पिलाकार सींग होते हैं और शरीर का निचला भाग सफेद होता है। मादा काले हिरण हल्के भूरे रंग की होती हैं और सामान्यतः उनके सींग नहीं होते। यह प्रजाति खुले घास के मैदानों में पाई जाती है और दिन के समय सक्रिय रहती है। इसका मुख्य आहार घास और छोटे पौधे होते हैं। इनकी ऊंचाई लगभग 74 से 84 सेंटीमीटर होती है। नर का वजन 20 से 57 किलोग्राम के बीच और मादाओं का 20 से 33 किलोग्राम तक होता है। नर काले हिरण की सर्पिलाकार सींगें, जो लगभग 75 सेंटीमीटर तक लंबी हो सकती हैं, इन्हें आसानी से पहचानने योग्य बनाती हैं।भविष्य की राह और राष्ट्रीय संदेश- बारनवापारा अभ्यारण्य में गूंजती काले हिरणों की चहल-कदमी और उनकी कुलाचें इस बात का जीवंत साक्ष्य हैं कि यदि इंसान प्रकृति के प्रति अपनी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी समझ ले, तो खोई हुई धरोहर को फिर से लौटाया जा सकता है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक 'लिविंग लैबोरेटरी' (जीवंत प्रयोगशाला) के रूप में कार्य करेगी, जहाँ वे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना सीख सकेंगी।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय का मानना है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की 'मन की बात' ने हमारे नवाचारों को एक वैश्विक मंच प्रदान किया है। छत्तीसगढ़ सरकार पर्यावरण संवर्धन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जोड़कर एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर रही है, जहाँ मनुष्य और वन्यजीव दोनों सुरक्षित हों।आज जब हम बारनवापारा अभ्यारण्य की खुली वादियों में कुलाचें भरते काले हिरणों को देखते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति स्वयं मुस्कुराते हुए छत्तीसगढ़ के इस सराहनीय प्रयास को अपना आशीर्वाद दे रही है। यह छत्तीसगढ़ के गौरव का वह उत्कर्ष है, जिसकी चमक अब पूरे देश को प्रेरित कर रही है। - -डबल इंजन की रफ्तार, योजनाओं की बौछार- किसान, आदिवासी, महिला और युवा बने केंद्र में-(एल.डी.मानिकपुरी, सहायक जनसंपर्क अधिकारी, कोरिया)छत्तीसगढ़ में बीते लगभग ढाई वर्षों में शासन की कार्यशैली को लेकर एक नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश दिखाई देती है। विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने 'सुशासन' को केवल एक नारा नहीं, बल्कि जमीनी क्रियान्वयन का आधार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सीमित समयावधि करीब 2 वर्ष 4 माह 17 दिन में ही सरकार ने विकास का जो खाका तैयार किया है, उसे भविष्य की बड़ी तस्वीर के रूप में देखा जा रहा है।प्रदेश की पहचान ‘धान का कटोरा’ के रूप में रही है, लेकिन इस पहचान को सम्मान देने का काम हालिया नीतिगत निर्णयों में स्पष्ट दिखता है। किसानों से प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान की खरीदी और 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर तय करना केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि अन्नदाताओं के आत्मविश्वास को मजबूत करने की पहल भी है। इसके साथ ही, तेंदूपत्ता संग्राहकों जिन्हें ‘हरा सोना’ से जुड़ा श्रमिक वर्ग कहा जाता है, के लिए पारिश्रमिक दर को 5500 रुपये करना और चरण पादुका वितरण जैसे निर्णयों ने आदिवासी क्षेत्रों में राहत पहुंचाई है।मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही लगभग 18 लाख प्रधानमंत्री आवासों की स्वीकृति देना सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। बेघर और जरूरतमंद परिवारों को छत उपलब्ध कराना सुशासन की पहली सीढ़ी के रूप में देखा गया।राज्य सरकार ने 70 लाख से अधिक विवाहित महिलाओं के खातों में प्रतिमाह 1000 रुपये की सहायता राशि देने की पहल की। यह राशि भले सीमित लगे, लेकिन ग्रामीण और जरूरतमंद परिवारों के लिए यह आर्थिक संबल का काम कर रही है। यह कदम महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक भागीदारी को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।लंबे समय तक नक्सलवाद से प्रभावित रहे बस्तर क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में केंद्र और राज्य के संयुक्त प्रयासों ने असर दिखाया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री श्री अमित शाह की रणनीति और संकल्प के साथ 31 मार्च 2026 तक नक्सलमुक्ति का लक्ष्य एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। इससे विकास कार्यों को गति मिलने की उम्मीद बढ़ी है।विष्णु देव साय सरकार ने युवाओं के लिए पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 'छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग' से जुड़े मामलों में जांच कराना सरकार के जवाबदेही वाले दृष्टिकोण को दर्शाता है। साथ ही, खेल गतिविधियों विशेषकर बस्तर व सरगुजा ओलंपिक जैसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय प्रतिभाओं को मंच प्रदान किया गया है।विगत वर्ष आयोजित ‘सुशासन तिहार’ को इस वर्ष भी 1 मई से 10 जून तक आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य योजनाओं की जमीनी हकीकत को परखना, नागरिकों की समस्याओं का त्वरित समाधान करना और प्रशासन को सीधे जनता से जोड़ना है। श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और राज्य के समन्वय को 'डबल इंजन सरकार' के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। राज्य सरकार का मानना है कि इस समन्वय से विकास योजनाओं को गति मिली है और इसका लाभ प्रदेश के लगभग तीन करोड़ नागरिकों तक पहुंच रहा है।‘बगिया के विष्णु’ के रूप में पहचाने जाने वाले मुख्यमंत्री साय ने प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों ईब से इंद्रावती तक विकास का जो रोडमैप तैयार किया है, वह समावेशी विकास की अवधारणा को दर्शाता है। लक्ष्य स्पष्ट है, अंतिम छोर के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना।छत्तीसगढ़ में सुशासन की यह यात्रा अभी 'प्रारंभिक चरण' में है, लेकिन दिशा स्पष्ट दिखाई देती है। सरकार की प्राथमिकताओं में किसान, महिला, आदिवासी, युवा और ग्रामीण समाज केंद्र में हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये नीतियां किस तरह स्थायी बदलाव का रूप लेती हैं, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि विकास की यह कहानी गति पकड़ चुकी है।
- - धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक जनसंपर्करायपुर /आज के दौर में टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना समय की मांग है। रसायनों के बोझ तले दबती मिट्टी को राहत देने के लिए हरी खाद एक बेहतरीन समाधान बनकर उभरी है। यह न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जमीन की उर्वरता को भी सुरक्षित रखती है। मिट्टी बचेगी, तो किसान बचेगा और किसान बचेगा, तो देश समृद्ध होगा।कृषि विभाग द्वारा किसानों को खेती में हरी खाद के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और उत्पादन में सुधार लाने में मदद मिल सके। विभाग के अनुसार धान के खेतों में लगातार रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग से मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्म जीवों की गतिविधियां कम हो रही हैं और मिट्टी की संरचना भी प्रभावित हो रही है।हरी खाद वह सहायक फसल है जिसे मुख्य फसल बोने से पहले खेत में उगाया जाता है और फूल आने की अवस्था में ही उसे हल चलाकर मिट्टी में दबा दिया जाता है। ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग और उड़द जैसी फसलें हरी खाद के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती हैं। हरी खाद के तहत कई फसलों का उपयोग किया जाता है जिनमें दलहनी और बिना दलहनी फसलें शामिल होती हैं। हरी खाद के लिए झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियों, टहनियों को भी उपयोग में ला सकते हैं, लेकिन इसके लिए विशेष रूप से ढैंचा फसलों का उपयोग किया जाता है। इन फसलों को खेतों में लगाकर भूमि में सुधार किया जाता है।हरी खाद का सबसे बड़ा प्रभाव मिट्टी की भौतिक और रासायनिक संरचना पर पड़ता है। यह मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों (ह्यूमस) की मात्रा को तेजी से बढ़ाती है। हरी खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाती है, जिससे हवा का संचार बढ़ता है और पौधों की जड़ें गहराई तक जा पाती हैं। इसके उपयोग से मिट्टी की पानी सोखने की शक्ति बढ़ जाती है, जो सूखे के समय फसलों के लिए जीवन रक्षक साबित होती है।जब मिट्टी स्वस्थ होती है, तो उत्पादन का बढ़ना निश्चित है। हरी खाद के प्रयोग से पैदावार में 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। यूरिया और अन्य रासायनिक खादों पर निर्भरता कम हो जाती है, जिससे किसान की फसल की लागत घटती है। मित्र कीटों से फसल का संरक्षण करता है। यह जमीन के भीतर लाभकारी सूक्ष्मजीवों और केंचुओं की संख्या बढ़ाने में मदद करती है।क्षेत्र की जलवायु के अनुसार सनई या ढैंचा का चुनाव करें। बुवाई का समय मानसून की शुरुआत (जून-जुलाई) इसके लिए सबसे उपयुक्त है। जब फसल लगभग 40-50 दिन की हो जाए और उसमें फूल आने लगें, तब उसे पाटा लगाकर या रोटावेटर की मदद से मिट्टी में मिला दें। पलटने के बाद 10-15 दिनों तक खेत में नमी बनाए रखें ताकि खाद अच्छी तरह सड़कर मिट्टी का हिस्सा बन जाए।हरी खाद केवल एक उर्वरक नहीं है, बल्कि यह मिट्टी का उपचार है। यदि किसान हर दूसरे या तीसरे साल अपने खेत में हरी खाद का प्रयोग करें, तो न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि हम समाज को रसायनों से मुक्त, शुद्ध और पौष्टिक अनाज भी उपलब्ध करा पाएंगे। हरी खाद का उपयोग कृषि के लिए एक ष्वरदानष् के समान है। वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है, ऐसे में हरी खाद (ळतममद डंदनतम) प्राकृतिक तरीके से मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सुलभ विकल्प है।कृषि विभाग द्वारा खरीफ फसल से पूर्व हरी खाद के बीज उपलब्ध कराने की भी पहल की जा रही है। इसके लिए क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से किसानों से मांग लेकर बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।
- -डॉ. दानेश्वरी संभाकर, उप संचालक (जनसंपर्क)रायपुर /देश का भविष्य जिन नन्हे कदमों से आगे बढ़ता है, वे आज आंगनबाड़ी केंद्रों में नई ऊर्जा, आत्मविश्वास और मुस्कान के साथ संवर रहे हैं। आंगनबाड़ी केंद्र कभी केवल पोषण और देखभाल तक सीमित माने जाते थे, वे अब प्रारंभिक शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरूकता और ग्रामीण रोजगार के समन्वित मॉडल के रूप में विकसित हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ के जशपुर, सूरजपुर, रायगढ़, महासमुंद, धमतरी, मुंगेली और नारायणपुर जैसे जिलें में दिख रहा यह सकारात्मक बदलाव अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रेरणास्रोत बन रहा है।महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) और महिला एवं बाल विकास विभाग के समन्वय से निर्मित आधुनिक आंगनबाड़ी भवनों ने Building as Learning Aid (BALA) की अवधारणा को साकार रूप दिया है। लगभग 11.69 लाख रुपए की लागत से बने इन भवनों में दीवारों, फर्श, सीढ़ियों और खुले स्थानों को शिक्षण सामग्री के रूप में विकसित किया गया है।रंग-बिरंगी चित्रकारी के माध्यम से बच्चों को हिंदी-अंग्रेजी वर्णमाला, अंक, आकृतियाँ, दिशाएँ, जीव-जंतु और स्थानीय परिवेश की जानकारी सहजता से मिल रही है। अब हर दीवारें बोलती हैं, हर कोना सिखाता है आंगनबाड़ी स्वयं एक जीवंत पाठशाला बन गई है।धमतरी जिले में बाला मॉडल ने प्रारंभिक बाल शिक्षा को रोचक और प्रभावी बनाने की दिशा में उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। मनरेगा, आईसीडीएस और 15वें वित्त आयोग के सहयोग से 81 आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ, जिनमें से 51 पूर्ण हो चुके हैं।ग्राम उड़ेंना का केंद्र इस बदलाव की जीवंत तस्वीर है, जहाँ विशेष पिछड़ी जनजाति कमार वर्ग के बच्चे खेल-खेल में सीख रहे हैं। दीवारों पर स्थानीय संस्कृति, गणितीय अवधारणाएँ और भाषा चार्ट, फर्श पर रंग और आकार तथा सीढ़ियों पर गिनती जैसे नवाचार बच्चों में जिज्ञासा और सीखने की रुचि को बढ़ा रहे हैं।मनरेगा के तहत आंगनबाड़ी भवनों के निर्माण ने दोहरा लाभ दिया है। एक ओर गुणवत्तापूर्ण अधोसंरचना विकसित हुई है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार के अवसर मिले हैं। इससे परिवारों की आय में वृद्धि हुई है और ग्रामीणों के पलायन में कमी आई है।इस प्रकार आंगनबाड़ी केवल बच्चों के विकास का केंद्र नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का माध्यम भी बन गया है।महासमुंद के शहरी क्षेत्रों से लेकर नारायणपुर के दूरस्थ वनांचल तक, आंगनबाड़ी केंद्रों में नया वातावरण साफ दिखाई देता है। आकर्षक दीवारें, शैक्षणिक चार्ट, कविताएँ और खेल सामग्री ने इन्हें आधुनिक प्ले-स्कूल जैसा रूप दे दिया है। बच्चे अब उत्साह के साथ केंद्र आते हैं और भाषा, गणित व व्यवहारिक ज्ञान को आनंदपूर्वक सीखते हैं।आंगनबाड़ी केंद्र अब बच्चों के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और किशोरियों के लिए भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके हैं। यहाँ पोषण, पूरक पोषण आहार टीकाकरण, स्वास्थ्य परीक्षण और परामर्श सेवाएँ नियमित रूप से उपलब्ध कराई जा रही हैं। दीवारों पर लिखे संदेश “जितनी बेहतर वजन रेखा, उतना स्वस्थ बच्चा” और “लड़का-लड़की एक समान” सामाजिक परिवर्तन का संदेश भी दे रही हैं।आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना, मुख्यमंत्री बाल संदर्भ योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, नोनी सुरक्षा योजना और महतारी वंदन योजना जैसी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो रहा है। इससे माताओं और बालिकाओं को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा मिल रही है।आरओ जल, स्वच्छ रसोई, सुरक्षित खेलघर और नियमित साफ-सफाई ने केंद्रों को बाल-अनुकूल बनाया है। महतारी समितियों की सक्रिय भागीदारी से बच्चों की उपस्थिति और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।आंगनबाड़ी केंद्रों का यह परिवर्तन राष्ट्रीय शिक्षा नीति और पोषण अभियान के लक्ष्यों को जमीनी स्तर पर साकार कर रहा है। 11.69 लाख रुपए की लागत से निर्मित प्रत्येक केंद्र अब बच्चों के सर्वांगीण विकास, महिलाओं के सशक्तिकरण और ग्रामीण रोजगार का समन्वित मॉडल बन चुका है। आज आंगनबाड़ी केंद्र वास्तव में “बच्चों की पहली पाठशाला” बन गए हैं, जहाँ शिक्षा, पोषण, सुरक्षा और रोजगार मिलकर एक सशक्त, समावेशी और विकसित भारत की नींव रख रहे हैं।
- -सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रभावी पहलविशेष लेख : डॉ. दानेश्वरी संभाकर, उप संचालक (जनसंपर्क)रायपुर। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान, सुरक्षा और समग्र कल्याण को सर्वाेच्च प्राथमिकता दी जा रही है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने वृद्धजनों के लिए एक मजबूत और संवेदनशील सामाजिक सुरक्षा तंत्र विकसित किया है, वहीं समाज कल्याण मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के मार्गदर्शन में विभागीय योजनाएँ प्रभावी रूप से धरातल पर क्रियान्वित हो रही हैं। इन प्रयासों से वरिष्ठ नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से सशक्त बनाया जा रहा है।सरल प्रक्रिया, सहज लाभराज्य में वरिष्ठ नागरिकों को योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए किसी अलग “सीनियर सिटीजन कार्ड” की आवश्यकता नहीं है। आधार कार्ड एवं अन्य वैध दस्तावेजों के माध्यम से आयु और पात्रता का सत्यापन कर सीधे लाभ प्रदान किया जा रहा है, इससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, सरल और सुलभ बनी है।वृद्धाश्रम :- सम्मानजनक जीवन का आधारप्रदेश के राजधानी रायपुर सहित विभिन्न जिलों में संचालित 27 वृद्धाश्रम निराश्रित एवं असहाय वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षित आश्रय बनकर उभरे हैं। वर्तमान में यहां 675 वृद्धजन लाभान्वित हो रहे हैं। यहाँ निःशुल्क आवास, पौष्टिक भोजन, वस्त्र और अन्य आवश्यक सुविधाएँ नियमित रूप से उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर मिल रहा है।पैलिएटिव केयर (प्रशामक गृह) :- विशेष देखभाल की व्यवस्थागंभीर रूप से बीमार एवं बिस्तर पर आश्रित वृद्धजनों के लिए राज्य में 13 प्रशामक गृह संचालित हैं। वर्तमान में रायपुर, कबीरधाम, दुर्ग, बालोद, रायगढ़ एवं बेमेतरा में 140 वरिष्ठ नागरिक लाभान्वित हो रहे हैं। इन केंद्रों में निरंतर देखभाल, उपचार सहयोग और आवश्यक सेवाएँ प्रदान की जाती हैं, जिससे संवेदनशील स्थिति में भी उन्हें मानवीय और सम्मानजनक जीवन मिल सके।वृद्धावस्था पेंशन :- आर्थिक संबल का आधारसामाजिक सुरक्षा के तहत पात्र वृद्धजनों को नियमित पेंशन दी जा रही है। बीपीएल एवं एसईसीसी वंचन समूह के वृद्धजनों को 500 रुपए प्रतिमाह तथा 80 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों को 680 रुपए प्रतिमाह पेंशन प्रदान की जा रही है। यह सहायता उनके दैनिक जीवन में आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान को मजबूती देती है।सहायक उपकरण और तीर्थ यात्रा :- नई ऊर्जा का संचारवरिष्ठ नागरिक को सहायक उपकरण प्रदाय योजना के अंतर्गत राज्य शासन द्वारा गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के निराश्रित वृद्धजनों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इस योजना के तहत चिकित्सकीय परामर्श के आधार पर अधिकतम 6900 रुपए तक के उपकरण जैसे व्हीलचेयर, वॉकर, बैसाखी, छड़ी, श्रवण यंत्र, चश्मा, ट्राइसाइकिल सहित अन्य आवश्यक सामग्री प्रदान की जाती है, जिससे उनका जीवन अधिक सहज बन सके।19 प्रमुख तीर्थ स्थलों की तीर्थ यात्रा योजना के माध्यम से उन्हें आध्यात्मिक और मानसिक संतुलन का अवसर मिल रहा है, जो उनके जीवन में नई ऊर्जा का संचार करता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 14 यात्राओं के माध्यम से 10 हजार 694 हितग्राहियों को लाभान्वित किया गया है।समग्र कल्याण की दिशा में निरंतर प्रयासछत्तीसगढ़ शासन का लक्ष्य केवल सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि वरिष्ठ नागरिकों को समाज की मुख्यधारा में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना है। पेंशन, स्वास्थ्य देखभाल, आवास, सहायक सुविधाओं और सामाजिक जुड़ाव के माध्यम से राज्य अपने वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक सशक्त, संवेदनशील और समग्र सामाजिक सुरक्षा तंत्र स्थापित कर रहा है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय और मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में यह प्रयास आने वाले समय में और अधिक प्रभावी रूप से वृद्धजनों के जीवन को गरिमामय बनाने की दिशा में आगे बढ़ते रहेंगे।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)आया मधुमास प्रिय न आए, नैन नीर हैं छलकाते ।बिन माली की देखभाल के, प्रीति-पुष्प अब मुरझाते ।।दहक रहा मन अनल विरह का, नैनों का सरवर सूखा ।रुचिर नहीं लगता है भोजन , प्रिय-दर्शन का मन भूखा ।।तड़पूँ जैसे जल बिन मछली, नीर बिना वह मरती है ।सुंदर छवि चितचोर तुम्हारी, साँस-साँस में बसती है ।।चाँद खिला अंबर में जैसे, सुधियों में तुम जब आते ।।प्रियतम नीरव निस्तब्ध रात ,विगत बात स्मरण कराती ।लिपट वृक्ष से ललिता लतिका, उर को मेरे नहीं सुहाती ।शीत पवन के निर्मम झोंके , विरह व्यथा को भड़काती ।आँसू की स्याही से लिखती, पीड़ा भरी तुम्हें पाती ।साँस-साँस बन बैठे बैरी, मधुर मिलन के गीत सुनाते।।खिला हुआ गुलमोहर कहता , सहना धूप ताप सीखो ।विषम परिस्थितियों में जीना, रहना विनत आप सीखो ।धूप छाँव में शहर गाँव में, जहाँ रहें तृण मुस्काएँ ।आँधी बारिश तूफानों के, आगे भी वे अड़ जाएँ।सीख लिया समझौता करना , कठिन राह वे चल पाते ।।
- आलेख -डॉ. पी टी ऊषालेखिका राज्यसभा सांसद, भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष और राष्ट्रमंडल खेल संघ, भारत की अध्यक्ष हैं।)मैंने अपना पूरा जीवन भागदौड़ में ही बिताया है, पहले केरल की कच्ची सड़कों पर, फिर वैश्विक मंचों पर और अब सार्वजनिक जीवन के गलियारों में। हर कदम पर मुझे कई मुश्किलो का सामना करना पड़ा है, कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अनकही बाधाओं का भी, जिन्होंने महिलाओं को यह बताया कि उनका यहाँ कोई स्थान नहीं है। मैंने यह भी देखा है कि जब ये बाधाएं टूटने लगती हैं तो क्या होता है। अवसर परिणामों को बदल देता है और इससे भी ज़रुरी बात यह है कि यह लोगों की सोच को बदल देता है।यही कारण है कि संविधान (एक सौ अट्ठाईसवाँ संशोधन) विधेयक, 2023—नारी शक्ति वंदन अधिनियम—केवल एक विधायी उपलब्धि नहीं है। यह एक लंबे समय से प्रतीक्षित संरचनात्मक सुधार है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना न तो कोई रियायत है और न ही दिखावा। यह अधिक प्रतिनिधि और प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में एक ज़रुरी कदम है।खेलों ने हमें क्या सिखाया हैजब मैंने 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में हिस्सा लिया और कुछ ही सेकंड के अंतर से पदक से चूक गई, तब बहुत कम भारतीय लड़कियां थीं, जो वैश्विक मंच पर खुद को देख पाती थीं। लेकिन पिछले कई दशकों में यह स्थिति बदली है। प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और पहचान तक पहुंच में सुधार के साथ, भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता हासिल करने लगीं है।पी.वी. सिंधु, मीराबाई चानू, विनेश फोगाट और मैरी कॉम जैसी एथलीटें अकेले नहीं उभरीं। वे एक ऐसी व्यवस्था का परिणाम हैं, जिसने धीरे-धीरे ही सही, पहुंच को व्यापक बनाना शुरू किया। प्रतिनिधित्व आकांक्षाएं पैदा करता है और आकांक्षा, जब समर्थित होती है, तो उपलब्धि दिलाती है।सबक साफ है। जब महिलाओं को स्थान दिया जाता है, तो वे व्यवस्था में केवल भाग नहीं लेतीं, वे शानदार प्रदर्शन भी कर दिखाती हैं।हर भारतीय के लिए बेहतर शासनभारत में जमीनी स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व का प्रभाव पहले ही देखा जा चुका है। 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किए जाने के बाद से, विभिन्न राज्यों में किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि महिला प्रतिनिधियों के नेतृत्व वाले क्षेत्रों में पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार हुआ है।ये महज़ "महिलाओं के मुद्दे" नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्रीय प्राथमिकताएं हैं। महिला नेता अक्सर सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, सुचारू रूप से चलने वाले स्कूल, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी शासन से जुड़ी उन रोजमर्रा की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जो परिवारों और समुदायों को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं।इस प्रतिनिधित्व को राज्य विधानसभाओं और संसद तक विस्तारित करना केवल निष्पक्षता की बात नहीं है। यह शासन की गुणवत्ता में सुधार से जुड़ा है।प्रतिनिधित्व का आर्थिक महत्वभारत में महिला श्रम बल की भागीदारी विश्व में सबसे कम है, जो लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है। यह केवल एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि एक आर्थिक समस्या भी है।विधानसभाओं में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व उन नीतियों को प्राथमिकता देने में मदद कर सकता है, जो इस अप्रयुक्त क्षमता को उजागर करती हैं, जैसे किफायती बाल देखभाल, सुरक्षित कार्यस्थल, ऋण तक पहुंच और महिला उद्यमियों के लिए समर्थन। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि लैंगिक समानता को बढ़ावा देने से भारत की जीडीपी में 700 बिलियन डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है।अधिक समावेशी संसद न केवल एक लोकतांत्रिक आवश्यकता है, बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता भी है।सुरक्षा, गरिमा और भागीदारीभारत भर में लाखों महिलाओं के लिए, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी अभी भी सुरक्षा, भेदभाव और असमान पहुंच की चिंताओं से प्रभावित है। चाहे खेल हो, शिक्षा हो या कार्यस्थल, ये समस्याएं हमारे समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं।संसद में अधिक महिलाओं का मतलब है कि कानून और नीतियां महज़ समझ से नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की हकीकत से आकार लेती हैं। इसका मतलब है प्रवर्तन के लिए मजबूत वकालत, सहायता प्रणालियों के लिए संसाधनों का बेहतर आवंटन और एक न्याय ढांचा, जो उत्तरदायी और सुलभ हो।शासन तभी अधिक प्रभावी होता है, जब वह उन लोगों के अनुभवों को दर्शाता है, जिनकी वह सेवा करता है।प्रतिनिधित्व और आकांक्षाओं की शक्तिभारत में सत्ता की छवि लंबे समय से मुख्य रूप से पुरुष प्रधान रही है। उस छवि को बदलना केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह एक बदलावकारी प्रक्रिया है।जब मणिपुर, झारखंड, राजस्थान या भारत के किसी भी हिस्से की कोई युवती अपने जैसी दिखने वाली, अपने जैसी बोलने वाली और समान पृष्ठभूमि से आने वाली किसी महिला को देश के कानूनों को आकार देते हुए देखती है, तो यह सिर्फ प्रेरणा ही नहीं देता, बल्कि यह संभावनाओं के प्रति उसके विश्वास को भी बदल देती है।आकांक्षा ही सामाजिक परिवर्तन का आधार है। विधानसभाओं में आरक्षण से स्तर कम नहीं होता, बल्कि अवसरों का दायरा बढ़ता है।भारत की महिलाओं ने खेल जगत, सशस्त्र बलों, विमानन और व्यावसायिक पदों पर पहले ही कई बाधाओं को पार कर लिया है। विधायी प्रतिनिधित्व इस यात्रा का स्वाभाविक अगला कदम है।अब है कार्यवाही का वक्तराज्यसभा में सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करने के बाद, मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि कैसे विविध दृष्टिकोण बहस और निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं। फिर भी, आज लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 15 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हो चुका है। अब बस इसे पूरी तरह, निष्ठापूर्वक और बिना देर किए लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रुरत है।भारत अपनी आधी आबादी को सर्वोच्च निर्णय लेने वाले निकायों में कम प्रतिनिधित्व देते हुए, विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा नहीं रख सकता। आधी प्रतिभा को दरकिनार करके विकसित भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता, न ही आधी आवाज़ पर सच्चा लोकतंत्र फल-फूल सकता है।आगे का रास्ता साफ है। सवाल यह है कि क्या हम उस पर चलने का दृढ़ संकल्प रखते हैं।
- आलेख- अश्विनी वैष्णव (लेखक, भारत सरकार के रेल, सूचना एवं प्रसारण, इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री हैंभारत में हर दिन 25,000 से अधिक ट्रेनें चलती हैं। वे प्रतिदिन 2 करोड़ से अधिक यात्रियों को ले जाती हैं और कोयला, लौह अयस्क, अनाज, स्टील, सीमेंट तथा अन्य वस्तुओं की बड़ी मात्रा को 1,37,000 किलोमीटर से अधिक लंबे रेल नेटवर्क पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती हैं।पूरी व्यवस्था जिस आधार पर काम करती है, वह रेल पटरी है। जब पटरी अच्छी स्थिति में होती है, तब ट्रेनें सुरक्षित रूप से अधिक गति से चलती हैं। लेकिन जब पटरी खराब होती है, तो इसके परिणाम गति पर रोक, देरी और सुरक्षा संबंधी जोखिम के रूप में सामने आते हैं। रेल की पटरी में दरार, कोई ढीला पुर्जा या गिट्टी की परत में रुकावट, इनमें से कोई भी चीज ट्रेन की चाल को प्रभावित कर सकती है।रेल पटरियों के महत्व को ध्यान में रखते हुए, भारतीय रेलवे ने एक दशक से अधिक समय पहले व्यापक आधुनिकीकरण कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्य में आधुनिक मशीनों से पटरियों का नवीनीकरण, उन्नत तरीकों से जांच और निरीक्षण, मशीनीकृत रखरखाव, सुरक्षा बाड़बंदी आदि शामिल थे। इन सभी प्रयासों ने मिलकर रेल नेटवर्क की स्थिति को स्पष्ट रूप से बदल दिया है।2014 से अब तक लगभग 55,000 किलोमीटर पटरियों का नवीनीकरण किया गया है, जिससे सुरक्षा और यात्रा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है तथा बार-बार मरम्मत की आवश्यकता कम हुई है। लगभग 44,000 ट्रैक किलोमीटर में 260 मीटर लंबे रेल पैनल बिछाए गए हैं। लंबे पैनलों का अर्थ है कम जोड़, जिससे ट्रेनों की आवाजाही अधिक सुगम और सुरक्षित होती है। अब 80,000 ट्रैक किलोमीटर से अधिक हिस्से में मजबूत 60 किलोग्राम वाली रेल पटरियों का उपयोग हो रहा है, जो अधिक भार और तेज गति का समर्थन करती हैं।मजबूत रेल पटरी बिछाना जरूरी है, लेकिन समय रहते खराबी पकड़ना भी उतना ही जरूरी है। छिपी हुई दरारों को खोजने के लिए अल्ट्रासोनिक जांच की गई है। इसके तहत करीब 36.2 लाख ट्रैक किलोमीटर और 2.25 करोड़ वेल्ड की जांच हुई। इससे रेल और वेल्ड टूटने की घटनाएं करीब 90 प्रतिशत तक कम हो गई हैं। यानी अब खराबी होने के बाद उसे ठीक करने के बजाय पहले ही पकड़कर रोक लिया जाता है।अब रेलवे में दूसरी आधुनिक जांच तकनीकें भी इस्तेमाल हो रही हैं। नई वेल्ड की जांच के लिए चुंबकीय जांच, फ्लैश-बट वेल्ड की जांच के लिए नई मशीनें और जीपीएस से जुड़ी ऐसी व्यवस्था लगाई गई है, जो ट्रेन की यात्रा की गुणवत्ता मापती है और पटरी के खराब हिस्से की सही जगह बता देती है।भारतीय रेलवे की ट्रैक मशीनों की संख्या 2014 में 748 थी, जो 2026 में बढ़कर 1,785 हो गई है। ये मशीनें पटरी को ठीक करने, गिट्टी साफ करने और रेल को घिसकर बराबर करने का काम हाथ से होने वाले काम की तुलना में ज्यादा तेज, बेहतर और एक समान तरीके से करती हैं।पटरी के नीचे बिछी गिट्टी की परत को साफ करने में मशीनों ने बड़ा फर्क पैदा किया है। यही गिट्टी पानी निकालने, कंपन कम करने और पटरी को मजबूत बनाए रखने का काम करती है। लेकिन समय के साथ ट्रेनों के लगातार वजन और कंपन से ये पत्थर टूटकर पाउडर जैसे हो जाते हैं। इससे गिट्टी की परत जाम हो जाती है और वह ठीक से काम नहीं कर पाती।इसलिए गिट्टी की सफाई की जाती है, ताकि पटरी फिर से सही हालत में आ जाए। यह काम एक लाख किलोमीटर से ज्यादा रेल पटरियों पर किया जा चुका है और ज्यादातर काम मशीनों से हुआ है। इसी तरह पटरी की ऊपरी सतह की खराबी दूर करने के लिए भी एक लाख किलोमीटर से ज्यादा रेल की ग्राइंडिंग की गई है। इससे ट्रेन का सफर ज्यादा आरामदायक और सुरक्षित हुआ है।हर साल ट्रेनों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए ट्रेनों के बीच रखरखाव के लिए मिलने वाला समय कम होता जा रहा है। ऐसे में मशीनों की मदद से कम समय में ज्यादा काम हो जाता है और ट्रेन सेवाएं भी प्रभावित नहीं होतीं। लेकिन सुरक्षा सिर्फ पटरी पर नहीं, बल्कि वहां भी जरूरी है जहां ट्रेनें लाइन बदलती हैं। इसलिए भारतीय रेलवे ने पटरी बदलने के साथ कई दूसरे सुधार भी किए हैं। करीब 17,500 किलोमीटर तक सुरक्षा के लिए बाड़ लगाई गई है, खासकर उन जगहों पर जहां ट्रेनें 110 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा रफ्तार से चलती हैं। इससे लोगों और जानवरों के पटरी पर आने की घटनाएं कम होती हैं।जहां ट्रेनें एक लाइन से दूसरी लाइन पर जाती हैं, वहां 36,000 नए और मजबूत स्विच लगाए गए हैं और 7,500 खास तरह के क्रॉसिंग लगाए गए हैं। ये ज्यादा समय तक चलते हैं और ट्रेन को बिना झटके के गुजरने देते हैं। 2019 से चौड़े और भारी स्लीपर लगाए जा रहे हैं, जिससे पटरी ज्यादा मजबूत रहती है, खासकर गर्मियों में। पुलों पर भी मजबूत स्लीपर लगाए गए हैं और यार्ड के अंदर लंबी वेल्ड वाली पटरियां बिछाई गई हैं। इससे पूरा रेलवे नेटवर्क और मजबूत हुआ है।रेल पटरियों के आधुनिकीकरण का सबसे साफ असर ट्रेनों की रफ्तार बढ़ने की क्षमता के रूप में दिखाई देता है।130 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा रफ्तार के लिए तैयार रेल पटरी का हिस्सा पहले सिर्फ 6 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर करीब 23 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह 110 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा रफ्तार वाली पटरी पहले करीब 40 प्रतिशत थी, जो अब 80 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इससे सफर का समय कम हुआ है, ट्रेनें ज्यादा समय पर चल रही हैं और वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी तेज ट्रेनें चलाना आसान हुआ है।इन सुधारों का असर सुरक्षा पर भी दिखा है। 2014-15 में 135 बड़े रेल हादसे हुए थे, लेकिन 2025-26 में यह संख्या घटकर सिर्फ 16 रह गई। यानी हादसे लगभग 89 प्रतिशत कम हो गए। हर 10 लाख किलोमीटर चलने वाली ट्रेनों पर हादसों की दर भी 0.11 से घटकर 0.01 हो गई है। यह लगभग 90 प्रतिशत सुधार है। खास बात यह है कि ट्रेनों और यात्रियों की संख्या बढ़ने के बावजूद हादसे कम हुए हैं।अब रेलवे ने एक नई ऑनलाइन व्यवस्था भी शुरू की है, जिसे ट्रैक मैनेजमेंट सिस्टम(टीएमएस) कहा जाता है। इसमें पटरी की जांच, ट्रेन के सफर की गुणवत्ता और पटरी की हालत से जुड़ी सारी जानकारी एक जगह मिल जाती है। इससे रेलवे को जल्दी समझ आ जाता है कि कहां काम करने की जरूरत है और समय रहते सुधार किया जा सकता है।बारह साल पहले भारत की 60 प्रतिशत रेल पटरियां 110 किलोमीटर प्रति घंटे से कम रफ्तार तक ही सीमित थीं। रेल पटरी टूटने की घटनाएं आम थीं और ज्यादातर रखरखाव हाथ से किया जाता था। आज स्थिति बदल चुकी है। अब करीब 80 प्रतिशत रेल नेटवर्क 110 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा रफ्तार संभाल सकता है। रेल और वेल्ड टूटने की घटनाएं 90 प्रतिशत तक कम हो गई हैं और करीब 1,800 ट्रैक मशीनें काम कर रही हैं।लाखों यात्रियों और रेल माल ढुलाई पर निर्भर कारोबारों के लिए इन बदलावों का बड़ा असर पड़ा है। अब सफर ज्यादा आरामदायक हुआ है, यात्रा का समय कम हुआ है और रेलवे नेटवर्क पहले से ज्यादा भरोसेमंद बना है। काम अभी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन अब तक हुई प्रगति यह दिखाती है कि लगातार मेहनत और निवेश से कितना बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)कहिथें वेद पुरान, हवय शुभ मुहुरत अक्ती।करना चाही दान, बढ़य सतयुग के शक्ती।।पावन तीज तिहार, बिहावँय पुतरी पुतरा।सुग्घर साज-सँवार, नवा पहिरावँय लुगरा।।भरे सकोरा टाँग दव, घाम मा पंछी मरथें ।मिटय भूख अउ प्यास हर, खा लँय दाना जी भर के।।करसी भर के राख, पी लँय प्यासा पानी।बइठ जुड़ा लँय छाँव, पुन्न मिलय हर दानी।।गर्मी भर बइसाख, भोंभरा अब्बड़ तीपय।कान तिपावय झाँझ, लपट जब आगी झींपय।बेटी दुखिया होय ता, कर दव आज बिहाव जी।भुँखहा ला कौरा खवा, लेही तोरे नाव जी ।।अवतारी भगवान, परशुराम ल कहिथे जी।शुक्ल पक्ष बैशाख, तीज बड़ पावन रहिथे जी ।लिये अवतरण खास, विष्णु के रूप जनाथे।अक्षय मिलथे पुण्य, काज मंगल करवाथे।शुभ तिथि लेके आय हे, अक्ती सुघर तिहार हा।मुहुरत बने बिहाव के, माड़े शुभ संस्कार गा।।होही गंगा स्नान, दीन के आँसू पोंछव।सफल जिंदगी मान, मदद ला तीरथ सोंचव।।भेदभाव सब मेट, भाव समता के जागय।होय दरिद्रता दूर, शोक दुख जग ले भागय।।करज चुका माटी सबो, कारज जग-कल्यान कर।झोली मा भर दे खुशी, मरत जीव मा प्रान भर।।
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मेरी जापान डायरी- 2 : डॉ. अभया जोगलेकर
जापान ने अपने राष्ट्र निर्माण के दौरान बहुत सी लड़ाइयां देखी हैं, मेइजी शासन से लेकर, ताइशो, शोवा काल में जापान के लोगों ने बहुत सहन किया है। सन् 1886 में मेइजी के पुनः स्थापना के बाद यहां आधुनिकीकरण हुआ। साथ ही सैन्यवाद का उदय भी। जापान के लोग मूलतः सैनिक प्रवृति के ही हैं कर्मठ। यह गुण उन्हें सबसे अलग बनाता है। इनका जुझारूपन इनके दैनिक क्रियाकलापों में दिखता है, यही बात जब आप कभी जापान घूमने जाएंगे, तो आप भी महसूस करेंगे।
जापान के लोगों की जिस बात ने मेरे मन पर सबसे गहरी छाप छोड़ी, वह है वहां की अनुशासित जीवनशैली और स्वच्छता की संस्कृति। जापान में नियम केवल कागजों पर नहीं, बल्कि लोगों के स्वभाव में रचे-बसे हैं।
1. जीवन का मूल मंत्र: अनुशासन
जापान में रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अनुशासन का पालन करना उतना ही स्वाभाविक क्रिया है, जितना सांस लेना। दुकान में सामान खरीदते समय, बिल पेमेंट करते समय, मेट्रो स्टेशनों पर कतारों में अपनी बारी का शांति से इंतज़ार करना हो या सार्वजनिक स्थानों पर दूसरों की सुविधा का ध्यान रखते हुए धीमी आवाज़ में बात करना, यह सब जापानी सभ्यता का अभिन्न हिस्सा है।
2. नियमों का पालन : एक राष्ट्रीय चरित्र
जापान के लोगों को देखकर मैंने यह स्पष्ट समझा कि संस्कार घर से ही प्रारंभ होते हैं। इसी सामूहिक सोच के कारण वहां का हर नागरिक अपने आसपास के वातावरण को साफ़ और स्वच्छ रखता है। उनका मानना है कि साफ़ और व्यवस्थित वातावरण रखना, उनकी भी जिम्मेदारी है क्योंकि ये पूरे समाज की साझा संपत्ति है। विदेशों में बगीचों, पब्लिक टॉयलेट्स में और सार्वजनिक स्थानों पर सफाई कर्मचारी नहीं होते क्योंकि लोग कचरा करना अपनी नैतिकता के विरुद्ध मानते हैं। यह जन- जागरूकता का वह उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां हर व्यक्ति देश को बेहतर बनाए रखना अपनी जिम्मेदारी समझता है।
हर बार की यात्राओं के समान इस यात्रा ने मुझे फिर याद दिलाया कि अनुशासन का अर्थ केवल सख़्त पाबंदियां नहीं समझें, बल्कि इसे परस्पर सम्मान, आत्म-नियंत्रण और राष्ट्र के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझें। - -हमारी जनगणना–हमारा विकास’ के संकल्प के साथ छत्तीसगढ़ तैयारआर्टिकल-रमेश जायभाये, उपनिदेशक, पत्र सूचना कार्यालयक्या आपने कभी सोचा है कि आपके घर की छोटी-सी जानकारी—जैसे पानी, बिजली या परिवार के सदस्यों का विवरण—देश के विकास में कितना बड़ा योगदान दे सकती है? दरअसल, हर नागरिक की दी गई जानकारी मिलकर ही भारत के भविष्य की दिशा तय करती है।इसी कड़ी में वर्ष 2027 की जनगणना एक खास पड़ाव बनने जा रही है। यह केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि बदलते भारत की एक नई कहानी है—एक ऐसी कहानी जिसमें हर नागरिक की भागीदारी है। इस बार जनगणना पूरी तरह डिजिटल अंदाज़ में होगी, जो इसे पहले की सभी जनगणनाओं से अलग और अधिक आधुनिक बनाती है।छत्तीसगढ़ में इस महाअभियान को लेकर तैयारियाँ तेज़ी से पूरी की जा रही हैं। वातावरण ऐसा है मानो कोई बड़ा जनउत्सव आने वाला हो—और वास्तव में, यह एक ऐसा अभियान है जिसमें हर व्यक्ति की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है।कहानी शुरू होती है इतिहास से…भारत में जनगणना की शुरुआत 1872 में हुई थी और 1881 से इसे पूरे देश में व्यवस्थित रूप से लागू किया गया। स्वतंत्रता के बाद 1951 में पहली जनगणना आयोजित हुई, जिसने देश के विकास की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई।अब वर्ष 2027 की जनगणना इस ऐतिहासिक यात्रा का आधुनिक रूप है। यह न केवल देश की वर्तमान स्थिति का आकलन करेगी, बल्कि भविष्य की योजनाओं की नींव भी तैयार करेगी।छत्तीसगढ़ में यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होगी—पहला चरण अप्रैल-मई 2026 में और दूसरा फरवरी-मार्च 2027 में आयोजित किया जाएगा।राज्य के लिए संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 (रात 12 बजे) निर्धारित की गई है, जिसके आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की गणना की जाएगी।अब आपकी बारी: खुद करें अपनी जनगणना!इस बार जनगणना की सबसे रोचक और उपयोगी सुविधा है—स्व-गणना (Self-Enumeration)।अब आप स्वयं अपने घर और परिवार की जानकारी ऑनलाइन भर सकते हैं। 16 अप्रैल से 30 अप्रैल 2026 के बीच???? https://se.census.gov.inपोर्टल पर जाकर मोबाइल नंबर और OTP के माध्यम से लॉगिन कर यह प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।आपसे परिवार के सदस्यों की संख्या, उनकी आयु, शिक्षा, व्यवसाय और घर की सुविधाओं से जुड़े कुछ सरल प्रश्न पूछे जाएंगे। पूरी जानकारी भरने के बाद आपको एक SE ID प्राप्त होगी।जब प्रगणक आपके घर आएंगे, तो केवल यह ID दिखानी होगी और आपकी जानकारी सत्यापित कर ली जाएगी—यानी बार-बार जानकारी देने की आवश्यकता नहीं होगी।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनगणना के दौरान किसी भी प्रकार के दस्तावेज़ दिखाने की आवश्यकता नहीं होती। आप जो जानकारी देंगे, वही दर्ज की जाएगी।स्व-गणना के प्रति लोगों का रुझान भी तेजी से बढ़ रहा है—देशभर में लाखों परिवार इस सुविधा का उपयोग कर चुके हैं, जो इस डिजिटल पहल की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।स्मार्ट तकनीक, सटीक आंकड़े और भरोसेमंद प्रक्रियाइस बार जनगणना पूरी तरह तकनीक के सहारे संचालित होगी। प्रगणक मोबाइल ऐप के माध्यम से डेटा दर्ज करेंगे, जिससे काम तेज़ और अधिक सटीक होगा।साथ ही, आधुनिक GIS आधारित डिजिटल मैपिंग का उपयोग कर हर क्षेत्र और गणना ब्लॉक को स्पष्ट रूप से चिन्हित किया जा रहा है, ताकि कोई भी घर या व्यक्ति छूट न जाए।डेटा के बेहतर प्रबंधन और निगरानी के लिए उन्नत डिजिटल सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है, जिससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और व्यवस्थित बनी रहती है।एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में, इस बार जाति संबंधी आंकड़ों का भी समावेश किया जाएगा, जो दशकों बाद समाज की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करेगा।जनगणना में समाज के हर वर्ग को शामिल करने का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसी के तहत बेघर व्यक्तियों की गणना भी अलग से, विशेष अभियान के माध्यम से की जाती है, ताकि कोई भी नागरिक इस प्रक्रिया से वंचित न रह जाए।और जहाँ तक आपकी जानकारी की सुरक्षा का सवाल है—यह पूरी तरह गोपनीय रहती है। इसे किसी अन्य विभाग या एजेंसी के साथ साझा नहीं किया जाता।छत्तीसगढ़ तैयार, अब आपकी भागीदारी जरूरीछत्तीसगढ़ में इस अभियान के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियाँ की गई हैं। शहरों से लेकर गाँवों तक, हर क्षेत्र में जनगणना टीम सक्रिय रहेगी, ताकि कोई भी परिवार छूट न जाए।नागरिकों की सुविधा के लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1855 भी जारी किया गया है, जहाँ किसी भी प्रकार की जानकारी या सहायता प्राप्त की जा सकती है।लेकिन इस पूरे अभियान की असली ताकत है—आपकी भागीदारी।जब आप सही जानकारी देते हैं, तो आप केवल एक फॉर्म नहीं भरते, बल्कि अपने क्षेत्र के विकास में योगदान देते हैं। आपकी दी गई जानकारी से ही तय होता है कि कहाँ नई सड़क बनेगी, कहाँ स्कूल खुलेगा और कहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है।आखिर में एक छोटी-सी बात…जनगणना एक आईना है, जिसमें देश खुद को देखता है।इस बार यह आईना डिजिटल है—तेज़, सटीक और आधुनिक।और इसमें जो तस्वीर दिखेगी, उसे बनाने में आपका भी योगदान होगा। तो आइए, इस जनगणना अभियान का हिस्सा बनें—स्व-गणना करें, सही जानकारी दें और देश के विकास की कहानी में अपनी भूमिका निभाएं।
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यादें-आशा भोंसले
आलेख- मंजूषा शर्मादिग्गज गायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अपनी आवाज से हिंदी ही नहीं बल्कि कई भाषाओं के गानों को अमर बना दिया। उनके निधन की खबर लगते ही आज सोशल मीडिया के हर प्लेटफार्म पर उनके ही गाये गाने सुनाई दे रहे हैं। आज हम उनके गाये एक गाने की चर्र्चा कर रहे हैं, जो मेरा भी पसंदीदा है- गाने के बोल हैं- मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है। यह फिल्म इजाज़त में शामिल किया गया था, जो वर्ष 1987 में प्रदर्शित हुई थीं। इस फिल्म के लिए आशा भोंसले को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।गाने के बोल सुनकर साफ पता चल जाता है कि ऐसा गाना और कोई नहीं, सिर्फ गुलजार साहब ही लिख सकते हैं। दरअसल यह एक नज़्म है। इस गाने के लिए गुलजार साहब को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।पूरा गाना है-मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा हैंसावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैंऔर मेरे एक ख़त में लिपटी रात पडी हैंवो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दोपतझड़ हैं कुछ, हैं ना ...पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहटकानों में एक बार पहन के लौटाई थीपतझड़ की वो शांख अभी तक कांप रही हैंवो शांख गिरा दो, मेरा वो सामान लौटा दोएक अकेली छतरी में जब आधे आधे भीग रहे थेआधे सूखे, आधे गिले, सुखा तो मैं ले आई थीगिला मन शायद, बिस्तर के पास पडा होवो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दोएक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिलगीली मेहंदी की खुशबू, झूठमूठ के शिकवे कुछझूठमूठ के वादे भी, सब याद करा दोसब भिजवा दो, मेरा वो सामन लौटा दोएक इजाजत दे दो बसजब इस को दफऩाऊंगीमैं भी वही सो जाऊंगी.....गुलजार साहब इतनी सादगी और सरलता से हर बात कह देते हैं कि लगता है , जैसे कोई अपनी ही कहानी बयां कर रहा है। उनकी लेखन की यह सादगी जैसे रूह को छू लेती है। गुलजार साहब द्वारा कही हुई सीधी सी बात भी आंखों में एक सपना बुन देती है ..जिस सहजता व सरलता से वे कहते हैं वो गीत की इन पंक्तियों में दिखाई देती है।फिल्म इजाजत का गाना मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास है, आशा भोसले का सबसे पसंदीदा गाना हुआ करता था। एक इंटरव्यू में आशा भोसले ने कहा था कि ये गाना पंचम (आर. डी . बर्मन) के साथ उनके खूबसूरत रिश्ते की एक बानगी है।। आशा ताई बताती थींं कि जब ये गाना गुलजार साहब ने लिखा था, तो पंचम दा ने कहा था कि पहली बार ऐसा होगा कि कोई गाना अपने बोल की वजह से अखबार की सुर्खियां बनेगा।गुलज़ार साहब और पंचम दा की जोड़ी ने एक से बढक़र एक गीत दिए हैं। जब गुलज़ार साहब - मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है.. नज्म को लिखकर पंचम दा के पास लेकर गए और बोले इस पर गाना बनाना है तो पंचम दा ने कहा यार कल से टाइम्स ऑफ़ इंडिया लेकर आ जाना और बोलना इस न्यूज़ पर भी गाना बनाओ । पहले तुम्हारा गाना तो समझ आए। लेकिन उन्होंने गाने की रुह को समझा और एक प्यारी सी धुन भी बना दी। यह गाना सुनकर ऐसा लगता है जैसे जि़न्दगी से जि़न्दगी कुछ कहना चाहती है या अपना दिया कुछ उधार वापस चाहती है, जैसे कुछ कहीं फिर से छूट गया है और एक कसक तथा कुछ पाने की एक उम्मीद शब्दों में ढल जाती है।शायद उस वक्त का यह पहला ऐसा गाना था, जिसमें कोई तुकबंदी नहीं थी । सही मायने में यह नॉन रिमिंग लिरिक्स था। गाने के पाश्र्व में बजता म्यूजिक सॉफ्ट है। इसमें संतूर का इस्तेमाल हुआ है जिसे उल्हास बापट ने बजाया है। उल्लास , वर्ष 1978 से पंचम दा की म्यूजिक टीम से जुड़ गए और 1942 टु लव स्टोरी फिल्म तक साथ रहे। इजाजत के गाने में उल्लास बापट ने कमाल का संतूर वादन किया है। गाने में पंचम दा का ट्रेंड साफ झलकता है। कुछ इसी प्रकार का म्यूजिक फिल्म मौसम में मदन मोहन साहब ने भी तैयार किया था।फिल्म इजाजत सुबोध घोष की लिखी बांगला कहानी पर आधारित है जिसकी पटकथा गुलजार ने लिखी और निर्देशन भी उन्हीं का था। इसमें नसीरुद्दीन शाह, रेखा, अनुराधा पटेल के अलावा शशि कपूर ने भी काम किया। इस गाने में रेखा और नसीर नजर आते हैं। नसीर, माया(अनुराधा पटे) का लिखा खत पढक़र पत्नी रेखा को सुनाते हैं-एक दफा वो याद है तुमको, बिन बत्ती जब साईकिल का चालान हुआ थाहमने कैसे भूखे प्यासे बेचारों सी एक्टिंग की थी,हवलदार ने उल्टा एक अठन्नी दे कर भेज दिया थाएक चवन्नी मेरी थी, वो भिजवा दो....इसके बाद यह गाना पाश्र्व में बजता है और अनुराधा पटेल गाते हुए अपने प्रेमी से कहती हैं- कि उसने भले ही उसका भौतिक सामान लौटा दिया है, लेकिन अब वह उसके तमाम वो अहसास भी वापस कर दें, जो उसके साथ बिताए क्षणों के साक्षी रहे हंै। यह गाना एक प्रकार से फिल्म की पूरी कहानी का ही निचोड़ है। गाने के अंत में माया कहती हैं-एक इजाजत दे दो बसजब इस को दफऩाऊंगीमैं भी वही सो जाऊंगी.....पूरी कहानी नसीर-रेखा और अनुराधा पटेल के बीच घूमती है। अनुराधा पटेल यानी माया अपने नाम के अनुरूप एक माया है, जो नसीर की प्रेमिका रहती है, लेकिन नसीर और रेखा की शादी हो जाती है। दोनों की खुशहाल शादीशुदा जिदंगी है। जब भी माया उनकी जिदंगी के बीच आती है, पारिवारिक जीवन में तनाव आ जाता है। आखिरकार एक दिन रेखा, नसीर को छोडक़र चली जाती है और दूसरी शादी कर लेती है। उधर , माया यानी अनुराधा भी आत्महत्या करने का प्रयास करती है और एक दिन हादसे में उसकी मौत हो जाती है। यह फिल्म सामान्तर फिल्म जगत का हिस्सा थी और एक खास वर्ग ने ही उसे पसंद किया था।मेरा कुछ सामान, नाम से गुलजार साहब ने बाद में अपने गानों का एक अलबम भी निकाला जिसे वर्ष 2005 में सारेगामा कंपनी ने रिलीज किया था। वहीं आशा भोंसले के 75 जन्मदिन पर भी इसी कंपनी ने जो अलबम जारी किया था, उसका नाम भी मेरा कुछ सामान, रखा गया था जिसमें यह गाना शामिल था। मई 2011 में गुलजार की कहानियों पर आधारित जिन नाटकों का मंचन मुंबई और दिल्ली में हुआ था, उस श्रृंखला का नाम भी मेरा कुछ सामान- रखा गया था।






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