चल, कहीं और चलते हैं....
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
नेह-दिखावे की रीति यहाँ ,
झूठ-फरेब की है दुनिया ।
मिश्री की डली घुली बोली ,
क्रोध दिलों में पलते हैं ।
चल कहीं और चलते हैं....!!
फट रहा विश्वास का दामन ,
नफरतों से है भरा मन ।
टकरा रहे जाम हाथों में ,
पीछे ख़ंजर चलते हैं...।
चल कहीं और चलते हैं....!!
फूल बिछाए थे राहों में ,
काँटों को छाँटा हमने ।
घावों की पीर रहे सहते,
बातों के नश्तर चुभते हैं .....।
चल कहीं और चलते हैं....!!
रिश्तों का खारापन देखा ,
उजला - काला मन देखा ।
सोचें होगा तन मरुथल -सा ,
सीने में समंदर पलते हैं....।
चल कहीं और चलते हैं....!!
फुलवारी का विनाश देखा ,
माली को उदास देखा ।
ऐसी जगह नहीं रहना है ,
जहाँ वहशी दरिंदे...
नन्हीं कलियों को मसलते हैं....।
चल कहीं और चलते हैं.....!!










Leave A Comment