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गृह मंत्रालय ने 'डिजिटल अरेस्ट' से निपटने के लिए अंतर-मंत्रालयी समिति गठित की

नयी दिल्ली.  गृह मंत्रालय (एमएचए) ने उच्चतम न्यायालय को अवगत कराया है कि ''डिजिटल अरेस्ट'' की बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से प्रणालीगत खामियों को दूर करने और साइबर अपराध के पीड़ितों की सुरक्षा तत्काल सुनिश्चित करने के लिए एक उच्चस्तरीय अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी) का गठन किया गया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली एक पीठ ने 16 दिसंबर, 2025 को इस मुद्दे पर अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी के मार्गदर्शन में अंतर-विभागीय मंत्रालयी परामर्श करने का निर्देश दिया था और इसके परिणाम से अवगत कराने को कहा था। पीठ ने निर्देश दिया कि पिछले वर्ष एक दिसंबर को जारी किए गए निर्देशों के साथ-साथ न्यायमित्र द्वारा की गई सिफारिशों पर भी संबंधित पक्षों द्वारा विचार किया जाना चाहिए।
गृह मंत्रालय द्वारा 12 जनवरी को दाखिल स्थिति रिपोर्ट में बताया गया कि भोलेभाले नागरिकों से धन की ठगी के लिए जाली दस्तावेजों और 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे हथकंडों का इस्तेमाल करने वाले अंतरराष्ट्रीय गिरोहों के खात्मे के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), रिजर्व बैंक, दूरसंचार विभाग और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े प्रमुख मंत्रालयों की भागीदारी के साथ एक बहु-एजेंसी अभियान चलाया जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पीठ के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए सीबीआई ने दिल्ली के एक हाई-प्रोफाइल धोखाधड़ी मामले की जांच आधिकारिक रूप से अपने हाथ में ले ली है, जिसमें 76 साल की एक पेंशनर से कथित तौर पर "डिजिटल अरेस्ट" धोखाधड़ी के जरिये 1.64 करोड़ रुपये ठग लिये गए थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि फर्जी लोगों ने उसे जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल करके धमकाया था। सीबीआई ने अदालत को बताया कि इस तरह की ठगी अक्सर 'संगठित और अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध गिरोहों' द्वारा की जाती है और एजेंसी अब अंतरराष्ट्रीय मॉड्यूल के खात्मे के लिए इंटरपोल के माध्यमों का उपयोग कर रही है। गृह मंत्रालय ने आंतरिक सुरक्षा के विशेष सचिव की अध्यक्षता में एक अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी) का गठन किया है। समिति में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, दूरसंचार विभाग, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई), विदेश मंत्रालय तथा भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी शामिल हैं। इसमें कहा गया है कि समिति को विधायी खामियों की पहचान करने, सुधारात्मक उपाय सुझाने और बैंकिंग एवं दूरसंचार क्षेत्रों में 'समयबद्ध अनुपालन' सुनिश्चित करने का दायित्व सौंपा गया है।
इसमें कहा गया है कि दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने 'स्पूफ्ड कॉल' (विदेश से की गई ऐसी कॉल जो भारतीय नंबर के रूप में दिखाई देती हैं) पर अंकुश लगाने में उल्लेखनीय प्रगति की जानकारी दी। नव-प्रवर्तित सेंट्रल इंटरनेशनल आउट रोमर (सीआईओआर) तंत्र के माध्यम से सरकार ने अकेले अक्टूबर 2024 में लगभग 1.35 करोड़ 'स्पूफ्ड कॉल' को ब्लॉक किया, जिससे वर्तमान में इनकी संख्या घटकर करीब 1.5 लाख रह गई है। उसने कहा कि इसके अलावा, डीओटी ने बताया कि वह दूरसंचार अधिनियम, 2023 के तहत नियमों को अंतिम रूप दे रहा है, ताकि प्वाइंट-ऑफ-सेल (पीओएस) एजेंटों द्वारा सिम कार्ड जारी करने में लापरवाही, प्रति व्यक्ति नौ सिम की सीमा के अनुपालन तथा धोखेबाजों द्वारा उपयोग किए जाने वाले 'सिम बॉक्स' के नियमन से निपटा जा सके। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आईडीसी को बताया कि 23 बैंकों ने पहले ही 'म्यूलहंटर एआई' लागू कर दिया है, जो अपराधियों द्वारा चोरी की गई रकम को ठिकाने लगाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले 'म्यूल खातों' की पहचान करने का एक विशेष उपकरण है। समिति ने बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े प्रमुख सुधारों पर भी चर्चा की। इसमें धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 12एए के तहत, रकम के स्थानांतरित होने से पहले ठगी गई राशि को अग्रिम रूप से फ्रीज करने का भी उल्लेख किया गया। इसके साथ ही, बैंकों द्वारा निष्क्रिय खातों की पहचान और उन्हें बंद करने के लिए एकरूप दिशानिर्देश सुनिश्चित करने हेतु मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) बनाने पर भी चर्चा हुई। न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता एन. एस. नप्पिनई ने पीड़ित राहत में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रस्ताव रखा है और सुझाव दिया है कि सभी मामलों में अनिवार्य रूप से प्राथमिकी दर्ज किए बिना, पोर्टल पर दर्ज शिकायतों और क्षतिपूर्ति बाण्ड के आधार पर 'फ्रीज' की गई राशि पीड़ितों को जारी की जाए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि व्हाट्सऐप और टेलीग्राम जैसे मंच अज्ञात नंबरों से आने वाली वीडियो कॉल की अवधि सीमित करें, ताकि लंबे समय तक दबाव बनाकर की जाने वाली ठगी को रोका जा सके। सरकार ने सभी हितधारकों से प्राप्त सुझावों को एकत्रित करने के लिए उच्चतम न्यायालय से एक महीने का अतिरिक्त समय मांगा है।
समिति का अगला जोर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 46 के तहत 'न्यायनिर्णयन तंत्र' को सुदृढ़ करने और साइबर अपराधों के अधिनिर्णय के लिए एक राष्ट्रीय ऑनलाइन पोर्टल को अंतिम रूप देने पर होगा। स्थिति रिपोर्ट में गृह मंत्रालय ने कहा, ''उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, यह विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की जाती है कि यह माननीय न्यायालय प्रतिवादियों को कम से कम एक माह की अवधि प्रदान करने की कृपा करे, ताकि अंतर-विभागीय समिति के शेष सदस्यों से सुझाव प्राप्त किए जा सकें और उन पर आगे विचार-विमर्श करके एक समेकित और सुविचारित परिणाम इस माननीय न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।''

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